Mamma's Murli - gyan-sitar-21
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२५.८.५९
डायरेक्ट परमात्म मुख-वंशावली ही सर्वोत्तम जीवन्मुक्ति के अधिकारी हैं
गीत:- दुःखियों पर कुछ रहम करो…।
ओम् शान्ति । रहमदिल तो परमात्मा को ही कहेंगे और दुःखी ही उनसे रहम मांगते हैं। जो सदा सुखी हैं वह तो नहीं मांगेंगे। रहम का मतलब है कि उनसे सुख की मांग करते हैं। यह मांग परमात्मा से ही करते हैं क्योंकि सबका पिता वह है। सबको सुखी करने वाला भी वह है। इसलिए हर एक की नज़र उनके तरफ जाती है । उनको ही कहते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे । अब भल बच्चे तो सब उनके हैं लेकिन एक हैं सगे, दूसरे हैं लगे । सगे बच्चे वह हैं जो डायरेक्ट मुख-वंशावली है, जिन्हों का अविनाशी ज्ञान से यह प्योर संबंध जुटता है। यह हैं मुख-वंशावली । बाकी तो सारी दुनिया है लगे बच्चे । सगे और लगे के अर्थ को भी समझना है, तो मुक्ति और जीवन्मुक्ति को भी समझना है। जो उनकी मुख-वंशावली बनते हैं उन्हों को तो जीवनमुक्त बनाते हैं। बाकी सब बच्चों को पार्ट से मुक्त कर देते हैं। ऐसे तो जो भी आत्मायें नीचे उतरती हैं, तो पहले सब जीवन्मुक्त हैं क्योंकि कोई विकर्मों का हिसाब-किताब नहीं है। लेकिन जीवन्मुक्ति की भी स्टेजेस हैं-- सतो-रजो-तमो ।
परमात्मा ने अपने मुख-वंशावली ब्राह्मणों को जो जीवन्मुक्ति दी. वह है सर्वोत्तम जीवन्मुक्ति, सतोप्रधान जिसमें सम्पूर्ण सुख-शान्ति-पवित्रता कायम है। पीछे द्वापर से तो पवित्रता की बात रहती नहीं । लेकिन आत्मायें जो आती हैं उन्हों का कोई कर्मों का हिसाब-किताब नहीं, इसलिए आधा समय सुख- शान्ति में रहती हैं। उसको कहेंगे रजोगुणी जीवन्मुक्ति । जो एकदम कलियुग में उतरते हैं उन्हों की सुख-शान्ति भी इतनी रहती है, इसलिए वह है तमोगुणी जीवन्मुक्ति । क्योंकि आत्मायें नम्बरवार आती हैं, तो जितना देरी से आती हैं उतना कम स्टेज वाली होती । तो जब पहले आदि सनातन धर्म स्थापन होता है, तो उस समय सर्वोत्तम जीवन्मुक्ति है। फिर नम्बरवार स्टेज अनुसार आत्मायें आती जाती हैं। हर चीज की स्टेज तो जरुर होती है। बाकी मुक्ति तो सबको मिलती है। लेकिन वहाँ भी नम्बरवार सेक्शन हैं। जितनी प्योर उतनी बाप के समीप निवास करती हैं। बाप तो सबसे ऊंच है। बाकी सब आत्माएं नम्बरवार हैं। उन्हों में भी पहले हैं अव्यक्त देवतायें ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, फिर साकार लक्ष्मी-नारायण इत्यादि । मुख-वंशावली ब्राह्मण देवता धर्म, फिर नम्बरवार और धर्म । जैसे नम्बरवार ताकत अनुसार यहाँ पार्ट बजाने उतरते हैं, वैसे वहाँ भी नम्बरवार निवास करते हैं। यह भी बना बनाया ड्रामा है, इसमें कुछ चेंज हो नहीं सकती ।
कोई कहे -- अब यह सम्पूर्ण सुख का पार्ट दूसरे धर्म को क्यों नहीं मिलता ? लेकिन नहीं, सबको अपना अनादि पार्ट मिला हुआ है। ऐसे भी नहीं हो सकता जो क्राइस्ट का पार्ट बुद्ध को मिले, बुद्ध का क्राइस्ट को मिले । सबको अपने धर्म की स्थापना कर फिर उनकी पालना भी उनको ही करनी है। क्योंकि जो धर्म स्थापन करते हैं वह जैसे अपने धर्म का पिता हो गया। तो उनको अपने बच्चों की पालना भी करनी है। इसलिए अपने धर्म के गुरु बनते आते हैं। पालना भी तो यहाँ ही करेंगे। इसलिए वापस तो कोई जा नहीं सकते । सब यहाँ ही आते रहते हैं। अन्त में सब आकर इक्ट्ठे होते हैं। जब सारा वृक्ष निकल अन्त में पहुँचता है तब बीज आकर सबको वापस ले जाते हैं। ऐसे नहीं, हर एक धर्म जैसे अलग-अलग आते हैं वैसे अलग-अलग टाइम पर जायेंगे । नहीं जाने का टाइम सबका एक है और एक ही बार परमात्मा आकर सबको वापस ले जाते हैं। वहाँ से ही फिर अपने समय पर आते हैं।
इब्राहिम, बुद्ध आदि को मैसेन्जर भी कहते हैं। लेकिन बाप अपना दैवी धर्म स्थापन करने के लिए कोई मैसेन्जर को नहीं भेजते। यह टाइम तो उनके आने का है। तो वही आकर यह दैवी धर्म स्थापन करते हैं। इसको आर्य धर्म भी कह सकते हैं क्योंकि सबसे सुधरे हुए तो देवतायें हैं। अभी तो अनेकानेक धर्म हैं। उन सबकी भी अन्तिम स्टेज आ गई है। इसलिए कोई में ताकत नहीं रही है। अब तो सब इतने दुःखी हुए हैं जो समझते हैं - इस पार्ट में आवें ही नहीं। तो उन्हों की भी आश पूर्ण करते हैं। भारतवासी फिर जीवन्मुक्ति मांगते हैं। कहते हैं हमको बैकुण्ठवासी बनाओ। कोई मरता है तो कहते हैं कि स्वर्गवास हुआ। तो उन्हों के लिए स्वर्ग स्थापन करते हैं। अब ही सचमुच स्वर्गवासी हो सकते हैं। बाकी तो जन्म - जन्मान्तर नर्कवासी होते आये हैं। हेल-हेवन यहाँ इसी स्टेज पर है।
अब अन्तिम समय बहुत दुःख का टाइम है। लेकिन दुःख बहुत समय तो नहीं चलेगा, इसका भी विनाश होगा। विनाश से थोड़ा समय पहले बाप आते हैं। विनाश तो होना ही है। यह जो बाम्बस बने हैं, वह सब काम में आयेंगे। यहाँ भारत में जब आपस में लड़ेंगे तब क्या हालत होगी ? जब पाकिस्तान हुआ तब कितने मनुष्य दुःखी हुए ! उसकी भेंट में जब इतनी विनाश की आग भड़केगी तो मनुष्य कितने दुःखी होंगे ! इसलिए इस दुःख से बचाने के लिए थोड़ा समय पहले आते हैं। जब परमात्मा द्वारा पवित्र बनें तब सुख-शान्तिमय राज्य भोगने की पॉवर भी मिले। सुख-शान्ति भोगना भल आत्माओं का काम है लेकिन देना तो उनका काम है। आत्मायें तो सब ५ विकारों के वश दुःखी हो आपस में लड़ती - झगड़ती रहती हैं। अब तो कैसे एक दो का विनाश करने को तैयार हो गये हैं ! तो बच्चों को शान्त कराना - यह बाप का काम है ना। इसकी युक्ति यही है जो सबको मुक्ति-जीवन्मुक्ति में ले जाते हैं। इस समय बाप खुद भी हाजिर है तब तो डायरेक्ट कहते हैं - बच्चे, मुझ एक को याद करो, बाकी सब भूलो ।