Mamma's Murli - gyan-sitar-26

१०.९.५९

परमात्मा का कर्त्तव्य और उसकी रचना का भेद

हम परमात्मा की मुख-वंशावली अच्छी तरह से जान चुके हैं कि हमारी मंजिल कहाँ है और किस ठिकाने से आकर पार्ट बजाना है। अब इस पुरानी दुनिया से लौटने का टाइम है क्योंकि यह पुरानी दुनिया विनाश होनी ही है। खुद-ब-खुद किनारे हो जाने वाले हैं। तो क्यों न पहले से हम किनारा कर लें जिससे हमारी प्रालब्ध बने ? परमात्मा अब इस सूखी दुनिया से लौटा रहे हैं और नया घर बना रहे हैं। पुराने घर में रहकर नया बनाना होगा ना। बेघर होकर तो नहीं बनायेंगे। हाँ, वह प्रालब्ध सम्पूर्ण बना देंगे तो यह पुराना घर विनाश हो जायेगा। यह पुरानी दुनिया ऐसे ही नज़र में है- यह बस, छोड़ना ही है। बाकी इसमें थोड़े समय के लिए हैं जब तक अपना घर बना लें। तो हम जान सकते हैं कि हमारी मंजिल, ठिकाना कहाँ हैं ? उसके लिए तैयारी कर रहे हैं। हर एक को अपनी इन्डीविज्युअल तैयारी करनी है। बाकी सारी दुनिया के लिए परमात्मा कार्य करा रहे हैं।

यह तो समझते हैं -- जो चीज स्थापन होती है उसकी पालना भी होती है। बाप घर बनाते हैं तो पालना के लिए भी रेसपान्सिबल रहते हैं। बेहद का बाप भी रेसपान्सिबल है। लेकिन यह पुरानी दुनिया तो परमात्मा ने स्थापन नहीं की है, न इसकी पालना के लिए रेसपान्सिबल है। यह ५ भूतों ने स्थापन की है, वही पालना कर रहे हैं। अगर परमात्मा पालना करते तो दुःख-अशान्ति नहीं होती। परमात्मा जो स्थापना हमारे द्वारा कराते हैं उसकी पालना भी कराते हैं। ऐसी पॉवर दे देते हैं कि सुखमय पालना करते रहो, जो २१ जन्मों तक यह पालना चलती है जिसमें फिर परमात्मा की आवश्यकता ही नहीं रहती। बाकी पुरानी दुनिया की पालना नहीं करते। हाँ, पुरानी दुनिया के विनाश के लिए परमात्मा निमित्त बनते हैं। परमात्मा की रचना का भेद जो है वह समझाते हैं। दुनिया तो समझती कि सब कुछ परमात्मा करा रहे हैं। लेकिन उनको भूल हम जो विकर्म करते आये हैं उनकी भोगना हमको भोगनी पड़ती है। अब हमारी बुद्धि को ठिकाना मिल गया है। दुनिया तो भटकती रहती है। हम मूंझे हुए नहीं हैं। कहाँ मंजिल है, क्या करना है- हमको पता है। तो शौक होता है औरों को भी बतावें। हमारी