Mamma's Murli - gyan-sitar-46

२८.६.६३

बाप की मत पर आचरण करने वाले सच्चे-सच्चे ब्राह्मण बनो

गीत- जाग सजनियां जाग… ।

ओम शान्ति । बाप ने हम बच्चों को अर्थात् हम सजनियों को आकर जगाया है। माया की निद्रा में सोये पड़े थे, अब जागे हैं। तो जागकर प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करना है। अभी बुद्धि में है कि यह पुरानी दुनिया बीती । हम उसे देखकर नहीं जीते हैं। अब हमारा पुरानी दुनिया से संबंध नहीं रहा है। बाप हमें स्वदर्शन-चक्र देता है कि माया के गले को काटो यानी रावण के १० शीश काटो । चक्र बुद्धि में घुमाने से चक्रवर्ती राजा बनेंगे। अभी हम सभी जन्मों का चक्र जानते हैं। पहले हम अशरीरी (नंगे) थे, फिर नाटक हुआ तो नाटक का वेष पहना। फिर अपने धाम जाना है तो फिर बुद्धि-बल से अशरीरी बनना है। देह का सब कुछ यहाँ खत्म करना है। कीचड़ को साफ करना है। अब वापस जाने का ख्याल रखो। घर में जाना है, तो दुनिया की कोई भी चीज अथवा पदार्थ में मोह न रखो ।

अब पुराने खाते को बंद करना है और नया बनाना है। पुराने को आगे बढ़ायेंगे तो सजाओं से चुक्तू करना पड़ेगा क्योंकि यहाँ अब विकर्म ही बनेगा। तो मुसीबत क्यों बढ़ायें ? अभी तुम जान चुके हो कि दुःख का कारण यह है। तो पुरुषार्थ है सारा बुद्धि-बल का । शरीर निर्वाह करते भी ईश्वर का होकर रहेंगे तो जवाबदारी उनकी है। परमात्मा का बनने से सेफ रहेंगे। परमात्मा की मत पर ही रहना है। मनुष्य बहुत हैं तो मतें भी बहुत हैं। बाबा तो है एक, तो मत भी एक है। तो ऐसी मत पर चलने वाले चाहिएं। परन्तु कोटों में कोई ही चलते हैं। क्योंकि सब एक जैसा पुरुषार्थ नहीं करते हैं। तो तुम्हें अपने को बहुत सम्भालना है। सब बातों में परहेज चाहिए। पूजा आदि में ब्राह्मणों को ही मंगाते हैं। तो उन्होंने हमारा नाम अपने ऊपर रख दिया है ।

अब हमको वल्लभाचारी बनना है। वल्लभ माना बाप। उसकी मत पर आचरण करने वाला। हमारा कुल कितना ऊंचा है ? कहते हैं – देवता भी इच्छा रखते हैं कि इस जन्म में आयें। तो ब्राह्मण हो गये देवताओं से भी ऊंचे । बलिहारी ब्राह्मणों की है। तो अब अपना आक्यूपेशन समझकर चलना है। हम ऊंचे कुल के हैं, पहली रचना हैं। तो चाल-चलन भी ऐसी ही चलनी चाहिए। कोई देखे तो समझे कि यह साधारण लोग नहीं हैं, फरिश्ते हैं। यह एक ही जन्म है ब्राह्मणों का, सो भी छोटा-सा है। इसमें खानदान का नाम बाला करना है। तो ब्राह्मण कुल की खुशबू भी आयेगी। तो यह है अपनी परहेज । कोई भी विकारी के हाथ का नहीं खाना है। ब्राह्मणों को और ही ज्यादा परहेज रखनी है। फिर हठ भी नहीं करना है। अपना है जीतना, हठ से नहीं मारना है। बलिहारी जीतने की है । हमको बाप रॉयल तरीका सिखाते हैं। खाना अपने हाथ से बनाना है। लाचारी हालत में कोई विधवा वा कन्या से बनवा सकते हैं। फिर भी योगयुक्त की बात अलग है। लाचारी में दूध है, फल आदि हैं, वह ले सकते हो । एक दिन व्रत भी रखा तो क्या हुआ। बाकी चने आदि खा लेने से कोई पेट तो खराब नहीं हो जायेगा ।

मुख्य है क्रोध, लोभ, मोह की परहेज । उसे कहते हैं वल्लभाचारी । ब्रह्मचर्य का भी अर्थ है। ब्रह्मा द्वारा सिखाया हुआ आचरण - यह है सतोगुणी पवित्रता । सन्यासियों की पवित्रता रजोगुणी है। परहेज रखने से मुरझाइस आदि नहीं आयेगी। नहीं तो, एक दिन कैसा, दूसरे दिन कैसा ! तुम सांवधान नहीं होंगे तो माया थप्पड़ मारेगी । बाकी ऐसे नहीं - थोड़ा पुरुषार्थ किया वह भी अच्छा । यह कोई बाप पर मेहरबानी थोड़ेही करनी है। कोई को ऐसे भी नहीं कहो कि पूजा-पाठ छोड़ दो। न से तो यह भक्ति भी अच्छी है। पहले तो विकारों को छोड़ने की बात है। नहीं तो उल्टा गिर जायेगा। ज्ञान समझाने की भी युक्ति चाहिए। पहले नब्ज देखनी है। कभी डॉक्टर भी नब्ज ठीक नहीं पकड़ पाते हैं तो भूल होने से मरीज मर जाते हैं। तो बड़ी जवाबदारी का काम है। धारणा भी बहुत अच्छी चाहिए। अच्छा । गुडमार्निन्ग ।