Mamma's Murli - gyan-sitar-50

३१.७.६३

पुरानी दुनिया से वापस चलना है, इसलिए इससे दिल हटा लो

ओम् शान्ति। परमात्मा है परमधाम निवासी। हम आत्मायें भी असुल परमधाम की निवासी हैं। अभी यहाँ आये हैं पार्ट बजाने के लिए । पार्ट बजाते-बजाते पार्ट ही बिगड़ गया है। अब फिर बाप आया है ले चलने के लिए। फिर वहाँ जो अपना असली पार्ट था, सुख का संबंध था, उसमें आयेंगे । बिगड़ी को संवारने वाला परमात्मा ही है। दूरदेश का मुसाफिर - यह भी परमात्मा की महिमा है। वह परे ते परे देश के निवासी हैं, अब मुसाफिर बनकर आये हैं थोड़ी देर के लिए। ले चलने के लिए उनको आना है। सर्व समर्थ चाहिए ना जो आकर माया के बंधन से छुड़ावे। हम कर्म के बंधायमानी में बंध गये हैं। अब उनसे निकालते हैं। विकर्म के खाते को दग्ध करना - यह है उस सर्वशक्तिवान का काम । उनकी पॉवर के सिवाए हम माया के बंधन से छूट नहीं सकते । मनुष्य, मनुष्य को बंधनमुक्त कर न सके। कर्मों को ऊंच बनाने वाला, बंधनों को काटने वाला वही है। अथॉरिटी वह है जो हमारे कर्मों को ऊंच बनाने का तरीका बताते हैं। वह ताकत देते हैं। इस चीज की अथॉरिटी एक के ही पास है।

मनुष्य तो कर्म के चक्र में आने वाले हुए। इस चक्र से अलग वह है, इसलिए बंधनमुक्त बनाने की पॉवर भी उनके पास है। वह भी कराते हमसे ही हैं। तो अब हम वहाँ से आये हैं, वहाँ ही फिर जाना है। फिर बंधनमुक्त हो सुख के संबंध में आना है। अब वापस चलने का ही ख्याल करना है। वापस कहाँ से होना है ? पुरानी दुनिया से। नई दुनिया जब है तब वापस जाने की बात नहीं, तब तो दुनिया को चलना है। पुरानी दुनिया के अन्त समय वापस होना पड़ता है। पुरानी दुनिया से वापस जाना है तो उससे दिल हटाई जाती है। अब खेल ही पूरा होता है। सर्व आत्माओं को वापस जाना है। जबरदस्ती भी जाना है, धर्मराज के डन्डे खाकर भी जाना है। तो क्यों न इज्जत से जायें । अब दुनिया बदलनी है तो पुरुषार्थ कर स्वर्ग में भी आगे नम्बर में आना है, सतोप्रधान का पूर्ण सुख पाना है। तो अपने खाते को भी सम्भालना है। अनेक जन्मों का खाता जो बना है उसको सुधारना है। अच्छा ।