Mamma's Murli - gyan-sitar-51

२९.८.६३

सबको बल देने वाले समर्थ बाप को सर्व संबंधों से याद करो

गीत:- तुम्हीं हो माता-पिता ।

ओम् शान्ति । अपनी बुद्धि में एक परमात्मा की ही याद है, दूसरे कोई को याद करने की दरकार नहीं है। उनका फरमान है कि मैं ही सर्व संबंधों का तुम्हें साथ देता हूँ। वह है सर्वशक्तिवान, इसलिए और किसके याद की आवश्यकता ही नहीं रहती है। मनुष्य आत्माओं की याद में तो ऐसे नहीं हो सकता। वह तो सर्व समर्थ है फिर और किसकी याद का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं है। सर्व सहारे देने वाला समर्थ वह है, वह खुद अपनी एक्ट कर रहे हैं। अपना संबंध है ही उनसे, जिससे और कोई सहारा लेने की फिर बात ही नहीं रहती । सभी का सहारा वह एक ही है, करनकरावनहार भी वह है। स्थापना, पालना, विनाश कराने वाला भी वह एक हुआ ना। उससे सर्व प्राप्तियां हो जाती हैं, इसलिए उनको बाप, टीचर, सतगुरु कहते हैं । वही सब कुछ कर और करा सकते हैं। अब अपना संबंध ही उनके साथ है। और तरफ बुद्धि जाती ही नहीं है। वही नॉलेजफुल ज्ञान का सागर है। उनका अब फरमान है कि मुझे याद करने से तुमको बल की प्राप्ति होगी जिससे पुराना खाता विनाश करना और नया जोड़ना है । तुम मात-पिता… भी उनको कहते हो। सर्व संबंधों का सहारा, सबको बल देने वाला वह एक ही है। और किसी देवता आदि को यह महिमा नहीं दे सकते । वह समर्थ ही इस महिमा अथवा इस कर्तव्य के लायक है। मनुष्य तो जानते नहीं हैं। वह तो हो गई भावना। यह तो प्रैक्टिकल बात है। ऐसा कर्तव्य उस समर्थ सर्व शक्तिवान से ही हो सकता है। ऐसे नहीं कि हम कोई को भी परमात्मा कह दें। परमात्मा तो अपने नाम, रुप, कर्तव्य वाला अलग होगा ना । जो जिसके लायक है उनको ही कहने में आता है। प्रैक्टिकल बात चाहिए ना। ऐसे ही सिर्फ महिमा नहीं करनी है। भावना से प्राप्ति होती है। वह हुई भावना । बाकी प्रैक्टिकल जिसने कर्तव्य किया, वह तो बात ही अलग है। तो अपनी बुद्धि में एक की ही याद है। अच्छा ।