Mamma's Murli - gyan-sitar-53

८.९.६३

धर्मराज का रूप आफीशल है, उसमें कोई रियायत नहीं

ज्ञानेश्वर बाबा और योगेश्वर बाबा अब खुद ज्ञान योग सिखाने आये हैं। अपना और अपनी सारी रचना का परिचय देने आये हैं। कहते हैं मैं ही तुम्हारा बाप, टीचर, गुरु हूँ। मैं तुम्हारा मात-पिता बन्धु-सखा हूँ। तो एक बार तुम मेरे हो जाओ। कई कहते हैं - सब कुछ तो शिवबाबा का है ना। परन्तु ऐसा सिर्फ दिल में नहीं समझना है, एक्ट में भी लाना है। उनके डायरेक्शन पर चलना है। बाप खुद कहते हैं अब जो कुछ तुम्हारे पास है सो पूरा पोतामेल मेरे आगे रखो फिर मेरे डायरेक्शन पर हर कर्म करो तब तुम्हारी जिम्मेवारी हट जायेगी, क्योंकि मैं तो धर्मराज भी हूँ। याद रखना मैं रांग कर्म नहीं करा सकता। यह है जीते जी मरना अर्थात् मरजीवा बनना जिससे सतयुग में अमर पद पाना । जो कुछ करना है, मेरे प्रति करो। एक बार तुमको मेरे प्रति मरना है और मेरे संग अपनी जीवन बितानी है। कर्मों का लेखा ठीक रखो, बिगड़े को सुधारना है। फिर तो जो हिसाब-किताब है वो साथ में जायेगा। अब बाप हूँ तो कुछ रियायत कर दूंगा बाकी जब धर्मराज हूँ तब तो आफीशल रूप में हूँ। अगर ज्ञान में आकर कुछ विकर्म किया होगा तो १० गुणा सजा दूंगा। वहाँ रियायत चल नहीं सकती। बाप कहते हैं – अभी तो मैं बाप, टीचर और गुरु के रूप में उपस्थित हूँ। जो मेरी गोद का बच्चा बनेगे, उनकी जिम्मेवारी भी मैं उठाऊंगा। अब जीते जी मरना है अर्थात् देह सहित देह के सब सम्बन्धों से बुद्धियोग तोड़ मन-वचन-कर्म से मेरे से संबंध जोड़ना है। पूरा नष्टोमोहा बनना है। बाकी यहाँ लोक-लाज रखने का ख्याल किया तो खलास। इस सृष्टि की सब मर्यादायें विकारी हैं वहाँ तो निर्विकारिता का संबंध था। भल बच्चे आदि पैदा होते थे परन्तु योगबल से। कोई कहे हम यहाँ ही पवित्र पति-पत्नी बन बैठ जाते हैं। नहीं, वो ताकत योगबल की तो प्रालब्ध में है जबकि पवित्र प्रवृत्ति है। निर्विकारी मर्यादा प्रधान है। बाकी यहाँ नाता जोड़कर नहीं बैठना है। यहाँ तो एकदम पुराना खाता खत्म करके ही चलना है। अच्छा।