Avyakt murli du lundi 14 janvier 1980
Enregistrement en cours..
Vous pouvez maintenant lire ce murli sans internet.
Vous pouvez lire ce murli sans internet.
pour pouvoir le lire sans internet.
Le murli français n'est pas disponible.
> 14-01-1980 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
"रूहानी सेनानियों से रूहानी कमाण्डर की मुलाकात"
आज विशेष कौन-सा संगठन है? इस संगठन को, अपने डबल सेवाधारी बच्चों को, जो हरेक डबल सेवाधारी वा डबल नॉलेंजफुल हैं, ऐसे ग्रुप को देख आज वतन में एक विशेष संवाद चला
ब्रह्मा बाप बोले - `ये विशेष मेरी भुजायें हैं।'शिव बाप बोले - `यह मेरी रूद्र माला है'। रूद्र माला में विशेष मणके हैं। ऐसी चिटचैट चलते हुए शिवबाबा ने पूछा ब्रह्मा बाप से कि आप की यह सब भुजायें राइट हैण्डस हैं या लेफ्ट हैण्डस भी हैं। राइट हैण्ड अर्थात् सदा समान, स्वच्छ और सत्यवादी। तो सब राइट हैण्डस हैं?तो ब्रह्मा बाप मुस्कराये,और मुस्कराते हुए बोले कि हरेक का पोतामेल तो आपके पास है ही। जब पोतामेल देखने की बात आई, हरेक बच्चे का पोतामेल सामने इमर्ज हुआ। कैसे इमर्ज हुआ? एक घड़ी के रूप में। जिसमें हरेक की चार सबजेक्ट्स के चार भाग थे। जैसे यहाँ सृष्टि चक्र का चित्र बनाते हो। हर भाग में अलग-अलग काँटे लगे हुए थे जो हरेक के चारों ही सबजेक्ट्स की परसेन्टेज बता रहे थे। सबके पोतामेल स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। पोतामेल देखते हुए बाप-दादा आपस में बोले - समय की घड़ी और बच्चों के पुरूषार्थ की घड़ी दोनों को देखते हुए क्या दिखाई दिया। समय की घड़ी फास्ट है और बच्चों के पुरूषार्थ की घड़ी मैजॉरटी की दो भाग अर्थात् दो सबजेक्ट्स की रिजल्ट 75% फिर भी ठीक थी। लेकिन दो सबजेक्ट्स के परसेन्टेज की रिजल्ट बहुत कम थी। तो बाप-दादा बोले - इस रिजल्ट के प्रमाण एवररेडी ग्रुप कहेंगे। जैसे विनाश का बटन दबाने की देरी है, सेकण्ड की बाजी पर बात बनी हुई है, ऐसे स्थापना के निमित्त बने हुए बच्चे एक सेकण्ड में तैयार हो जाएँ ऐसा स्मृति का समर्थ बटन तैयार है? जो संकल्प किया और अशरीरी हुए। संकल्प किया और सर्व के विश्व-कल्याणकारी ऊँची स्टेज पर स्थित हो गए और उसी स्टेज पर स्थित हो साक्षी दृष्टा हो विनाश लीला देख सकें। देह के सर्व आकर्षण अर्थात् सम्बन्ध, पदार्थ,संस्कार इन सबकी आकर्षण से परे, प्रकृति की हलचल की आकर्षण से परे,फरिश्ता बन ऊपर की स्टेज पर स्थित हो शान्ति और शक्ति की किरणें सर्व आत्माओं के प्रति दे सकें - ऐसे स्मृति का समर्थ बटन तैयार है?जब दोनोंबटन तैयार हों तब तो समाप्ति हो। इस ग्रुप को देखकर वतन में पोतामेल इमर्ज हुआ। जैसे बाहुबल वाली सेना में भी वैराइटी प्रकार के सैनिक होते हैं। कोई बॉर्डर पर जाने वाले, युद्ध के मैदान पर जाने वाले अर्थात् डायरेक्ट वार करने वाले और दूसरे उनकी पालना करने वाले पीछे होते हैं। डायरेक्टर तो बैकबोन होते हैं। ऐसे ही यह जो ग्रुप है वह मैदान पर सेवा करने वाला ग्रुप है। मैदान में आने वाली सेना के आधार पर ही विजय अथवा हार की बात होती है। अगर मैदान में आने वाले कमज़ोर,शस्त्रहीन,डरपोक होते हैं तो कभी भी डायरेक्टर की विजय नहीं हो सकती हैं। विश्व-कल्याण के मैदान पर यह सेवाधारी ग्रुप है। यह ग्रुप बहादुर है। सामना करने की शक्ति अर्थात् अनुभव कराने की शक्ति, सभी को श्रेष्ठ चरित्र द्वारा बाप-दादा का चित्र दिखाने की शक्ति - ऐसे शस्त्रधारी हैं? क्या समझते हो - ऐसे शक्ति स्वरूप ग्रुप है? चारों ही सबजेक्ट्स के चारों ही अलंकारधारी हों?दो भुजा वाले शक्ति स्वरूप हो या चार भुजा वाले हो? यह चार अलंकार चार सबजेक्ट्स की निशानी हैं। तो सभी अलंकार धारण किए हैं? या किसी ने दो धारण किए हैं, किसी ने तीन किये हैं या एक धारण करते हैं तो दूसरा छूट जाता हैं? तो इस ग्रुप का महत्व समझा।
श्रीमत का काँटा ठीक तो तराज़ू के दोनों पलड़े बराबर रहेंगे
सेवा के मैदान पर आने वाला ग्रुप है अर्थात् विजय के आधारमूर्त ग्रुप है। आधारमूर्त, मजबूत हो ना? आधार हिलने वाले तो नहीं हैं ना। जैसे ज्ञान और सेवा इन दो सबजेक्ट्स के ऊपर रिजल्ट 75% देखी। वैसे याद और धारणा इन दो सबजेक्ट्स पर भी ज्यादा अटेन्शन दे चारों ही अलंकारधारी बनो, नहीं तो सृष्टि की आत्माओं को सम्पूर्ण साक्षात्कार करा नहीं सकेंगे। इसलिए इन दो अलंकारों को धारण करने के लिए विशेष क्या अटेन्शन रखेंगे, डबल सेवाधारी हो?लौकिक और ईश्वरीय। शरीर निर्वाह अर्थ और आत्म निर्वाह अर्थ डबल सेवा मिली हुई है। और दोनों ही सेवा बाप-दादा के डायरेक्शन प्रमाण मिली हुई हैं, लेकिन दोनों ही सेवाओं में समय का, शक्तियों का समान अटेन्शन देते हो? तराज़ू के दोनों तरफ समान रखते हो?काँटा ठीक रखते हो कि बिना काँटे के तराज़ू रखते हो?काँटा है -`श्रीमत'। अगर श्रीमत का काँटा ठीक है तो दोनों साइड समान होंगी। अर्थात् तराज़ू का बैलेन्स ठीक होगा। अगर काँटा ही ठीक नहीं है तो बैलेन्स रह नहीं सकता। कोई-कोई बच्चे एक तरफ का वजन ज्यादा रखते हैं। कैसे? लौकिक ज़िम्मेवारियाँ निभानी ही हैं,ऐसे समझते हैं और ईश्वरीय ज़िम्मेवारीयाँ निभानी तो हैं,ऐसे कहते हैं। वह निभानी ही हैं और वह निभानी तो है। इसलिए एक तरफ का वजन ज्यादा हो जाता है और रिजल्ट क्या होती है? बोझ उनको ही नीचे ले आता है। ऊपर नहीं उठ सकते। बोझ वाला साइड सदा नीचे धरती पर लग जाता है और हल्का ऊपर उठ जाता है। और समान वाला भी ऊँचा उठता, नीचे धरती पर नहीं लगेगा। धरती पर लगने के कारण धरती के आकर्षण वश हो जाते हैं। बोझ के कारण ईश्वरीय सेवा के मैदान पर हल्के होकर सदा सफलता मूर्त नहीं बन सकते। कर्म बन्धन के, लोकलाज के बोझ नीचे ले आते हैं। जिस लोक को छोड़ चुके उस लोक की लाज रखते हैं और जिस संगमयुग वा संगम लोक के बन चुके, उस लोक की लाज रखना भूल जाते हैं। जो लोक भस्म होने वाला है उस लोक की लाज सदा स्मृति में रखते और जो लोक अविनाशी है और इसी लोक से भविष्य लोक बनना है उस लोक की स्मृति दिलाते भी कभी-कभी स्मृति स्वरूप बनते हैं। गृहस्थ व्यवहार और ईश्वरीय व्यवहार दोनों में समानता रखना अर्थात् सदा दोनों में हल्के और सफल होना।
गृहस्थ व्यवहार नहीं, ट्रस्ट व्यवहार
वास्तव में गृहस्थ व्यवहार शब्द चेन्ज करो। गृहस्थ शब्द बोलते ही गृहस्थी बन जाते हो। इसलिए गृहस्थी नहीं हो, ट्रस्टी हो। गृहस्थ व्यवहार नहीं,ट्रस्ट व्यवहार है। गृहस्थी बनते हैं तो क्या करते हैं?गृहस्थियों का कौन-सा खेल है? गृहस्थी बनते हो तो बहाने बाजी बहुत करते हो। ऐसे और वैसे की भाषा बहुत बोलते हो। ऐसे हैं ना, वैसे हैं ना। बात को भी बढ़ाने लग जाते हैं। यह तो आप जानते हो करना ही पड़ेगा, यह तो ऐसे ही है,वैसे ही है - यह पाठ बाप को भी पढ़ाने लग जाते हो। ट्रस्टी बन जाओ तो बहाने बाजी खत्म हो चढ़ती कला की बाजी शुरू हो जायेगी। तो आज से अपने को गृहस्थ व्यवहार वाले नहीं समझना। ट्रस्ट व्यवहार है। जिम्मेवार और है, निमित्त आप हो। जब ऐसे संकल्प में परिवर्तन करेंगे तो बोल और कर्म में परिवर्तन हो ही जाएगा। तो यही ग्रुप एक-एक बहुत कमाल कर सकते हैं। कर्मयोगी, सहजयोगी का हरेक सैम्पल अनेक आत्माओं को श्रेष्ठ सौदा करने के निमित्त बना सकते हैं। और जो भी हद के गुरू होते हैं उनका एक गद्दी नशीन शिष्य अपने गुरू का नाम बाला करता हैं और यहाँ सतगुरू के इतने सब तख्त नशीन बच्चे हो - एक-एक बच्चा कितना श्रेष्ठ कार्य कर सकते हैं!
बाप-दादा सभी बच्चों को ऐसे सर्विसएबुल, विश्व में नाम बाला करने वाले विश्व-कल्याणकारी बच्चा समझते हैं। जब एक दीपक दीप माला बना देता है तो आप एक-एक दीपक सारे विश्व में दीपावली कर देंगे। समझा
इस ग्रुप को क्या करना है। वैराइटी ग्रुप को वैराइटी वर्ग वाली आत्माओं के सेवाधारी बन सर्व की सद्गति वा श्रेष्ठ जीवन बनाने का आधारमूर्त बनना है। जैसे डबल विदेशी हैं वैसे यह डबल नॉलेजफुल हैं, डबल सर्विसएबुल हैं। रिजल्ट भी डबल निकालनी है।
ऐसे सदा सर्व बन्धन-मुक्त, सदा जीवनमुक्त,विश्व शो केस के विशेष शो पीस, विश्व-परिवर्तन करने के आधार मूर्त, सदा श्रीमत के आधार पर स्व-उद्धार और विश्व-उद्धार करने वाले, ऐसे सदा विश्व-सेवाधारियों को, बेहद के सेवाधारि यों को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।
अलग-अलग ग्रुप से अव्यक्त बाप-दादा की मधुर मुलाकात
डॉक्टर्स के प्रति - डबल डॉक्टर्स ग्रुप हैं ना। जैसे सभी डॉक्टर्स अपने हद की डॉक्टरी के स्पेशालिस्ट होते हैं वैसे रूहानी डॉक्टरी में विशेष किस सेवा के निमित्त बने हुए हो? जैसे हद की डॉक्टरी में कोई आँखों का, कोई विशेष गले का,कोई सर्जन,कोई सिर्फ दवाईयाँ देने वाला होता है। तो इस रूहानी डॉक्टरी में क्या विशेषतायें हैं? एक सेकेण्ड में किसी के पुराने संस्कार रूपी बीमारी को नयनों की दृष्टि द्वारा समाप्त कर दें अर्थात् उस समय उस बीमारी से उसको भुला दें,ऐसी विशेषता वाले डॉक्टर्स हो?जैसे वह आँखें ठीक कर देते हो, ऐसे अपनी दृष्टि द्वारा किसी के पुराने संस्कार को पहले दवा दें फिर समाप्त करा दें, उस समय शान्त कर दें, ऐसी विशेषता वाले डॉक्टर्स हो। यह हुआ आँखों का डॉक्टर जो दृष्टि से परिवर्तन कर दें। जैसे डॉक्टर गोली देकर थोड़े समय के लिए दर्द को दबा देते हैं ऐसे आँखों के डॉक्टर हो जो दृष्टि से उसको सन्तुष्ट कर दो। हद के नहीं, रूहानी। रूहानी आँखों के डॉक्टर अर्थात् रूहानी दृष्टि से शफा देने वाले।
2. ऑपरेशन वाले डॉक्टर,जैसे वह औजारों से ऑपरेशन करते हो वैसे अपने में जो शक्तियाँ हैं,यह शक्तियाँ ही यन्त्र हो जायें, जिन यन्त्रों द्वारा उनकी कमज़ोरियाँ समाप्त हो जायेंगी। जैसे अपने ही थियेटर के यन्त्रों द्वारा ऑपरेशन करते हो, पेशेन्ट के यन्त्र तो नहीं यूज़ करते हो ना, ऐसे अपनी शक्तियों के यन्त्र द्वारा बीमारी को ठीक कर दो, कामी को निष्कामी और क्रोधी को निक्रोधी बना दो। इसके लिए सहनशक्ति का यन्त्र यूज़ करना पड़े। तो ऐसे ऑपरेशन वाले डॉक्टर हो? जैसे उसमें आँख, नाक सबके अलग-अलग स्पेशालिस्ट होते हैं ऐसे यहाँ भी अलग-अलग विशेषतायें हैं। यहाँ भी जितनी कोई डिग्री लेना चाहे तो ले सकता है। जो सर्व विशेषताओं में ऑलराउन्डर हो जाते हैं वे नामीग्रामी हो जाते हैं।
डॉक्टर्स तो बहुत सेवा कर सकते हैं - क्यों? क्योंकि पेशेन्ट उस समय बिल्कुल भिखारी के रूप में आते हैं। अगर उस समय डाक्टर उन्हें झूठी दवाई भी दे देते, पानी भी दे देते तो भी भावना के कारण वह ठीक हो जाते हैं। उन्हें खुशी की खुराक मिल जाती, जिससे वह ठीक हो जाते, दवाई से ठीक नहीं होते,खुशी से ठीक हो जाते। तो डॉक्टर्स के पास भिखारी के रूप में आते हैं, दो घड़ी के लिए भी दर्द मिटाओ,उन्हें आप उस समय क्या भी सुनाओ तो सुनने के लिए तैयार हो जाते हैं। तो जैसे इन्जेक्शन लगाकर सेकेण्ड में उसके दर्द की सुधबुध भुला देते हो, ऐसे ज्ञान का इंजेक्शन भी लगाओ जो पुराने संस्कारों की सुधबुध भूल जाएँ। ऐसा इन्जेक्शन आप सबके पास है ना? जो पहले अपने को इन्जेक्शन लगाकर संस्कारों को भूला सकते हैं, वह अनुभव के आधार से औरों को भी लगा सकेंगे। तो डबल डॉक्टर्स की कोई तो विशेषता होनी चाहिए ना! अभी कोई भी आयेगा तो आपके पास भेजेंगे, ऐसे नहीं केस वापस चला जाए। बहुत अच्छा चान्स है सेवा में आगे बढ़ने का। डॉक्टर्स तो एक दिन में काफी प्रजा बना सकते हैं,रोज प्रजा बनी-बनाई आपके पास आती है,ढूँढने नहीं जाना पड़ता है। वैसे मेले प्रदर्शनी में कितना खर्चा करके बुलाते हैं,आपको तो बहुत सहज है। जितनों को सम्पर्क में लायेंगे उतनी प्रजा बनती जायेगी। अगर सम्बन्ध में लाया तो बच्चे भी बन सकते हैं। कोई-कोई अच्छा- अच्छा कहकर चले भी जायेंगे लेकिन वह अन्त में हलचल के समय इच्छुक होकर महसूसता शक्ति के साथ-साथ आयेंगे। इसलिए सेवा करते रहना चाहिए। फिर भी आपको इष्ट मानेंगे जरूर। और कुछ नहीं तो कम-से-कम आपके भक्त तो बन जायेंगे। अगर अन्त में यह भी कहा कि इन्होंने संदेश अच्छा दिया, संदेशी थे, पैगम्बर थे, यह भी सोचा तो भक्त बन जायेंगे। लास्ट स्टेज भक्त है, वह भी तो चाहिए।
अभी जो आते हैं वह 7दिन के कोर्स से, अपनी हिम्मत से चलने वाले कम हैं,लास्ट पूर है ना। लास्ट पूर में ताकत नहीं होती। इसलिए अभी की आत्माओं को स्वयं के शक्तियों के सहयोग द्वारा आगे बढ़ाने का समय है। आपके भेंट में अभी की आत्मायें टू लेट हो गई,क्योंकि लास्ट पूर हो गया इसलिए स्वयं का हुल्लास देकर उनको चलाना है। आपको महादानी,वरदानी बनना पड़े। वह अपने आधार पर नही चल सकते। तो ऐसा पावरफुल यंत्र निकालो जो एक सेकेण्ड में अनुभव कराने वाला हो। अब अपने हमजिन्स की संख्या को बढ़ाओ। अभी ऐसा इन्जेक्शन तैयार करो जो लगाओ और सुधबुध भूल जाए। उस दुनिया से बेहोश हो इस दुनिया में आ जाए। ऐसा इन्जेक्शन तैयार करना पड़े। अब देखेंगे 80 के वर्ष में अपनी संख्या कितनी बढ़ाते हो। कम-से-कम आपके हमजिन्स उलाहना तो न दें कि हमको बताया ही नहीं,अगर हम नहीं जागते थे तो जगाना तो फर्ज था, यह भी उलाहना देंगे। एक बार निमंत्रण दे दिया, पर्चा भेज दिया तो कैसे जागेंगे?जो कुम्भकरण की नींद में सोया हुआ हो उसे एक बार आवाज दे दो - ऐ, जाग जाओ, तो कैसे जागेगा?इसलिए बार-बार जगाना पड़े।
इन्जीनियर्स -इन्जीनियर अर्थात् प्लैनिंग बुद्धि। इन्जीनियर सदा प्लैन सेट कर कार्य को आगे बढ़ाते हैं। तो इन्जीनियर ग्रुप अर्थात् रूहानी प्लैनिंग बुद्धि ग्रुप, ऐसे हो? इस रूहानी सेवा में भी प्लैनिंग बुद्धि बन सेवा का प्लैन बनाते हो? नया प्लैन बनाते हो या बने हुए प्लैन को प्रैक्टिकल में लाते हो?प्लैनिंग बुद्धि तो प्लैन बनाने के बिना रह न सकें। जिसका जो काम होता वह न चाहते भी उसी कार्य में सदा बिजी रहते हैं। तो सदा जैसे उस डिपार्टमेंट का अटेन्शन रहता है ना - क्या करें, कैसे करें, कैसे सफल बनायें,किस विधि से वृद्धि करें,यही इन्जीनियर्स का काम है ना तो रूहानी इन्जीनियर्स को ईश्वरीय सेवा की विधि पूर्वक वृद्धि कैसे हो - उसका प्लैन बनाना पड़े। अगर सभी अपना नया प्लैन तैयार करें तो इतने सारे प्लैन से नई दुनिया तो जल्दी ही आ जायेगी। अभी ऐसा प्लैन बनाओ जो कम खर्च और अधिक सफलता वाला हो। जैसे सेक्रीन की एक भी बूँद बहुत काम करती है ऐसे ही प्लैन पावरफुल हो लेकिन एकॉनामी वाला हो। आजकल के समय अनुसार एकॉनामी भी चाहिए और पॉवरफुल भी चाहिए। रूहानी गर्वन्मेंट के इन्जीनियर्स ऐसा प्लैन तैयार करो। जैसे आजकल एक इन्डस्ट्री के द्वारा अनेकों को काम देने का प्लैन सोचते हैं तो यहाँ भी प्लैन एकानामी का हो,सन्देश अनेकों को मिल जाए। जैसे वहाँ सोचते हैं कि अनेकों को रोजी मिल जाए तो यहाँ भी अनेकों को सन्देश मिल जाए। यहाँ इन्जीनियर्स बहुत चाहिए। क्योंकि सतयुग में इन्जीनियर्स कम समय में और सुन्दर चीजें तैयार करेंगे तो यहाँ से ही संस्कार चाहिए ना। तब तो ऐसा प्लैन बनायेंगे। आप राजा बनेंगे तो भी बनवायेंगे तो ना। आइडिया देंगे। तो नई दुनिया का प्लैन बनाने के लिए और सेवा की सफलता पाने के लिए भी इन्जीनियर्स चाहिए। तो आपका कितना महत्व है। ऐसा महत्व समझते हुए चलते हो?हरेक को समझना चाहिए मुझे सफलता का सबूत देना है। हरेक नया प्लैन बनाकर पहले अपने-अपने जोन में प्रैक्टिकल में लाओ फिर सारा विश्व आपको कॉपी करे। प्लैन पास न होने का कारण होता है कि एकॉनामी नहीं होती, अगर एकॉनामी और सफलता का प्लैन हो तो सभी पास करेंगे। तो 60इन्जीनियर्स अगर 60प्लैन निकाले तो 80 में ही समाप्ति हो जाए। तो 80में समाप्ति करेंगे या आगे। हलचल तो शुरू करो जो सभी क्यू में आ जाएँ। समाप्ति भी एक सेकण्ड में नहीं होगी, धीरे-धीरे परिवर्तन होगा। लेकन शुरू हो जाए और सबके दिल से यह आवाज निकले कि अब नई दुनिया आने वाली है। जैसे साइन्स वालों ने चन्द्रमा पर जाकर थोड़ी झलक दिखाई तो सबने प्लॉट खरीदने की तैयारी शुरू कर दी,तो कम से कम साईलेन्स की शक्ति वाले नई दुनिया में प्लाट खरीदने की तैयारी तो करा दो। बुकिंग तो करा लें। जैसे साइन्स की कोई भी इन्वेन्शन पहले प्रयोगशाला में लाकर अनाउन्स करते हैं, ऐसे आप लोग भी पहले अपनी एरिया की प्रयोगशाला में प्लैन का प्रयोग करो। फिर सब मानेंगे। प्लैन की प्रैक्टिकल सफलता निकले। जो प्रदर्शनी वा मेला देख चुके उनके लिए अब नया प्लैन चाहिए। नई आकर्षण चाहिए। तो प्लैनिंग बुद्धि प्लैन निकालो। ड्रामा अनुसार जो विशेषता मिली हुई है, उस विशेषता को कार्य में लगाना अर्थात् विशेष लॉटरी लेना।
नये-नये साधन बनाने का प्लैन निकालो, कॉपी में नहीं, प्रैक्टिकल में। वहाँ के तो कागज पर ही रह जाते हैं। लेकिन यह प्रैक्टिकल के प्लैन हों।