Avyakt murli du mercredi 27 avril 1983
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27-04-83 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
दृष्टि तथा वृत्ति परिवर्तन के लिए युक्तियाँ
कुमारों की भट्टी में प्राण अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य:-
आज बापदादा सर्व पुरूषार्थियों का संगठन देख रहे हैं। इसी पुरुषार्थी शब्द में सारा ज्ञान समाया हुआ है। पुरुषार्थी अर्थात् पुरूष अर्थात् रथी। किसका रथी है? किसका पुरूष है? इस प्रकृति का मालिक अर्थात् रथ का रथी। एक ही शब्द के अर्थ स्वरूप में स्थित हो जाओ तो क्या होगा! सर्व कमज़ोरियों से सहज पार हो जायेंगे। पुरूष प्रकृति के अधिकारी हैं न कि अधीन है। रथी रथ को चलाने वाला है न कि रथ के अधीन हो चलने वाला। अधिकारी सदा सर्वशक्तिवान बाप की सर्वशक्तियों के अधिकारी अर्थात् वर्से के अधिकारी वा हकदार है। सर्वशक्तियाँ बाप की प्रापर्टी हैं और प्रापर्टी का अधिकारी हरेक बच्चा है। यह सर्व शक्तियों का राज्य भाग्य बापदादा सभी को जन्म-सिद्ध अधिकार के रूप में देते हैं। जन्मते ही यह स्वराज्य सर्व शक्तियों का,अधिकारी स्वरूप के स्मृति का तिलक, और बाप के स्नेह में समाये हुए स्वरूप के रूप में दिलतख्त,सभी को जन्म लेते ही दिया है। जन्मते ही विश्व कल्याण के सेवा का ताज हर बच्चे को दिया है। तो जन्म के अधिकार का तख्त, तिलक,ताज और राज्य सबको प्राप्त है ना?ऐसे चारों ही प्राप्तियों की प्राप्ति स्वरूप आत्मायें कमज़ोर हो सकती हैं? क्या यह चार प्राप्तियाँ सम्भाल नहीं सकते हैं? कभी तिलक मिट जाता,कभी तख्त छूट जाता, कभी ताज के बदले बोझ उठा लेते। व्यर्थ कखपन की टोकरी उठा लेते। नाम स्वराज्य है लेकिन स्वयं ही राजा के बदले अधीन प्रजा बन जाते। ऐसा खेल क्यों करते हो?अगर ऐसा ही खेल करते रहेंगे तो सदा के राज्य भाग्य के अधिकार के संस्कार अविनाशी कब बनेंगे! अगर इसी खेल में चलते रहे तो प्राप्ति क्या होगी! जो अपने आदि संस्कार अविनाशी नहीं बना सकते वह आदिकाल के राज्य अधिकारी कैसे बनेंगे। अगर बहुतकाल के योद्धेपन के ही संस्कार रहे अर्थात् युद्ध करते-करते समय बिताया, आज जीत कल हार। अभी- अभी जीत अभी-अभी हार। सदा के विजयीपन के संस्कार नहीं तो इसको क्षत्रिय कहा जायेगा या ब्राह्मण? ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। क्षत्रिय तो फिर क्षत्रिय ही जाकर बनेगा। देवता की निशानी और क्षत्रिय की निशानी में देखो अन्तर है? यादगार चित्रों में उनको कमान दिखाया है, उनको मुरली दिखाई है। मुरली वाले अर्थात् मास्टर मुरलीधर बन विकारों रूपी सांप को विषैले बनने के बजाए विष समाप्त कर, शैया बना दी। कहाँ विष वाला सांप और कहाँ शैया! इतना परिवर्तन किससे किया?मुरली से। ऐसे परिवर्तन करने वाले को ही विजयी ब्राह्मणकहा जाता है। तो अपने से पूछो - मै कौन?
सभी ने अपनी-अपनी कमज़ोरियों को सच्चाई से स्पष्ट किया है। उस सच्चाई की मार्क्स तो मिल जायेंगी लेकिन बापदादा देख रहे थे कि अभी तक जबकि अपने संस्कारों को परिवर्तन करने की शक्ति नहीं आई है, विश्व परिवर्तक कब बनेंगे! अभी दृष्टा हो,दृष्टि द्वारा देखने वाले दृष्टा,दृष्टि क्यों विचलित करते? दिव्य नेत्र से देखते हो वा इस चमड़ी के नेत्रों से देखते हो? दिव्य नेत्र से सदा स्वतः ही दिव्य स्वरूप ही दिखाई देगा। चमड़े की आँखें चमड़े को देखती। चमड़ी को देखना, चमड़ी का सोचना यह किसका काम है! फरिश्तों का?ब्राह्मणों का? स्वराज्य अधिकारियों का? तो ब्राह्मण हो या कौन हो? नाम बोलें क्या?
सदैव हरेक नारी शरीरधारी आत्मा को शक्ति रूप, जगत माता का रूप,देवी का रूप देखना यह है - दिव्य नेत्र से देखना। कुमारी है, माता है, बहन है, सेवाधारी निमित्त शिक्षक है, लेकिन है कौन? शक्ति रूप! बहन-भाई के सम्बन्ध में भी कभी-कभी वृत्ति और दृष्टि चंचल हो जाती है। इसलिए सदा शक्ति रूप हैं। शिव शाक्ति हैं। शक्ति के आगे अगर कोई आसुरी वृत्ति से आते तो उनका क्या हाल होता है,वह तो जानते हो ना। हमारी टीचर नहीं - शिव शक्ति है। ईश्वरीय बहन है इससे भी ऊपर शिव शक्ति रूप देखो। मातायें वा बहनें भी सदा अपने शिव शक्ति स्वरूप में स्थित रहें। मेरा विशेष भाई, विशेष स्टूडेन्ट नहीं। वह शिव शक्ति है और आप महावीर हो। लंका को जलाने वाले, पहले स्वयं के अन्दर रावण वंश को जलाना है। महावीर की विशेषता क्या दिखाते हैं? वह सदा दिल में क्या दिखाता है? वह सदा दिल में क्या दिखाता है? - एक राम दूसरा न कोई। चित्र देखा है ना। तो हर भाई महावीर है, हर बहन शक्ति है। महावीर भी राम का है, शक्ति भी शिव की है। किसी भी देहधारी को देख सदा मस्तक के तरफ आत्मा को देखो। बात आत्मा से करनी है वा शरीर से? कार्य व्यवहार में आत्मा कार्य करता है वा शरीर? सदा हर सेकण्ड शरीर में आत्मा को देखो। नजर ही मस्तक मणी पर जानी चाहिए। तो क्या होगा?आत्मा आत्मा को देखते स्वतः ही आत्म-अभिमानी बन जायेंगे। है तो यह पहला पाठ ना! पहला पाठ ही पक्का नहीं करेंगे,अल्फ को पक्का नहीं करेंगे तो बे बादशाही कैसे मिलेगी?सिर्फ एक बात की सदा सावधानी रखो। जो भी करना है,श्रेष्ठ कर्म वा श्रेष्ठ बनना है। तो हर बात में दृढ़ संकल्प वाले बनो। कुछ भी सहन करना पड़े,सामना करना पड़े लेकिन श्रेष्ठ कर्म वा श्रेष्ठ परिवर्तन करना ही है। इसमें पुरुषार्थी शब्द को अलबेले रूप में यूज नहीं करो। पुरुषार्थी हैं,चल रहे हैं,कर रहे हैं,करना तो है,यह अलबेलेपन की भाषा है। उसी घड़ी पुरुषार्थी शब्द को अलबेले रूप में यूज नहीं करो। पुरुषार्थी है, चल रहे हैं, कर रहे हैं, करना तो है, यह अलबेलेपन की भाषा है। उसी घड़ी पुरुषार्थी शब्द के अर्थ स्वरूप में स्थित हो जाओ। पुरूष हूँ, प्रकृति धोखा दे नहीं सकती। यह सब प्रकार की कमज़ोरियाँ अलबेलेपन की निशानियाँ हैं। महावीर तो पहाड़ को भी सेकेण्ड में हथेली पर रख उड़ने वाला है। अर्थात् पहाड़ को भी पानी के समान हल्का बनाने वाला है। छोटी-छोटी परिस्थितियाँ क्या बात हैं! फिर तो ऐसे महावीर को कहेंगे चीटी से घबराने वाले। क्या करें, हो जाता है। यह महावीर के बोल हैं? समझदार यह नहीं कहेंगे कि क्या करें, चोर आ जाता है। समझदार बार-बार धोखा नहीं खाते। अलबेले बार-बार धोखा खाते हैं। सेफ्टी के साधन होते हुए अगर कार्य में नहीं लगाते तो उसको क्या कहेंगे?जानता हूँ कि नहीं होना चाहिए लेकिन हो रहा है, इसको कौन सी समझदारी कहेंगे!
दृढ़ संकल्प वाले बनो। परिवर्तन करना ही है, कल भी नहीं, आज। आज भी नहीं अभी। इसको कहा जाता है महावीर। राम के आज्ञाकारी। आज तो मिलने का दिन था फिर भी बच्चों ने मेहनत की है तो मेहनत का फल रेसपान्ड देना पड़ा। लेकन इन कमज़ोरियों को साथ ले जाना है? दी हुई चीज़ फिर वापिस तो नहीं लेनी है ना! जबरदस्ती आ जावे तो भी आने नहीं देना। दुश्मन को आने दिया जाता है क्या?अटेन्शन,चेकिंग यह डबल लॉक, याद और सेवा यह दूसरा डबल लाक सबके पास है ना। तो सदा यह डबल लाक लगा रहे। दोनों तरफ लाक लगाना। समझा! एक तरफ नहीं लगाना। खातिरी तो स्थूल सूक्ष्म बहुत हुई है। डबल खातिरी हुई है ना। जैसे दीदी दादी वा निमित्त बनी हुई आत्माओं ने दिल से खातिरी की है तो उसके रिटर्न में सब दीदी दादी को खातिरी देकर जाना कि हम अभी से सदा के विजयी रहेंगे। सिर्फ मुख से नहीं बोलना,मन से बोलना। फिर एक मास के बाद इन फोटो वालों को देखेंगे कि क्या कर रहे हैं। किससे भी छिपाओ लेकिन बाप से तो छिपा नहीं सकेंगे। अच्छा
सदा दृढ़ सकंल्प द्वारा सोचा और किया, दोनों को समान बनाने वाले, सदा दिव्य नेत्र द्वारा आत्मिक रूप को देखने वाले,जहाँ देखें वहाँ आत्मा ही आत्मा देखें,ऐसे अर्थ स्वरूप पुरुषार्थी आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।