Avyakt murli du lundi 19 décembre 1983
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19-12-83 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
परमात्म प्यार - निःस्वार्थ प्यार
प्यार के सागर शिवबाबा अपने स्नेही बच्चों प्रति बोले-
आज स्नेह के सागर बाप अपने स्नेही बच्चों को देख रहे हैं। स्नेही सब बच्चे हैं फिर भी नम्बरवार हैं। एक है स्नेह करने वाले। दूसरे हैं स्नेह निभाने वाले। तीसरे हैं सदा स्नेह स्वरूप बन स्नेह के सागर में समाए हुए। जिसको लवलीन बच्चे कहते। लवली और लवलीन दोनों में अन्तर है। बाप का बनना अर्थात् स्नेही,लवलीन बनना। सारे कल्प में कभी भी और किस द्वारा भी यह ईश्वरीस स्नेह,परमात्म प्यार प्राप्त हो नहीं सकता। परमात्म प्यार अर्थात् निःस्वार्थ प्यार। परमात्म प्यार - इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म का आधार है। परमात्म प्यार जन्म-जन्म की पुकार का प्रत्यक्ष फल है। परमात्मा प्यार नये जीवन का जीयदान है। परमात्म प्यार नहीं तो जीवन नीरस, सूखे गन्ने के मुआफिक है। परमात्म प्यार बाप के समीप लाने का साधन है। परमात्म प्यार सदा बापदादा के साथ अर्थात् परमात्मा को साथी अनुभव कराता है। परमात्म प्यार मेहनत से छुड़ाए सहज और सदा के योगी,योगयुक्त स्थिति का अनुभव कराता है। परमात्म प्यार सहज ही तीन मंजल पार करा देता है।
1. देह-भान की विस्मृति।2.देह के सर्व सम्बन्धें की विस्मृति। 3.देह की, देह के दुनिया की अल्पकाल की प्राप्ति की आकर्षणमय पदार्थों का आकर्षण सहज समाप्त हो जाता है। त्याग करना नहीं पड़ता लेकिन श्रेष्ठ सर्व प्राप्ति का भाग्य स्वतः ही त्याग करा देता है। तो आप प्रभु प्रेमी बच्चों ने त्याग किया वा भाग्य लिया?क्या त्याग किया? अनेक चत्तियाँ लगा हुआ वस्त्र,जड़जड़ीभूत पुरानी अन्तिम जन्म की देह का त्याग, यह त्याग है? जिसे स्वयं भी चलाने में मजबूर हो, उसके बदले फरिश्ता स्वरूप लाइट का आकार जिसमें कोई व्याधि नहीं,कोई पुराने संस्कार स्वभाव का अंश नहीं, कोई देह का रिश्ता नहीं, कोई मन की चंचलता नहीं,कोई बुद्धि के भटकने की आदत नहीं - ऐसा फरिश्ता स्वरूप,प्रकाशमय काया प्राप्त होने के बाद पुराना छोड़ना,यह छोड़ना हुआ? लिया क्या और दिया क्या? त्याग है वा भाग्य है? ऐसे ही देह के स्वार्था सम्बन्ध,सुख-शान्ति का चैन छीनने वाले विनाशी सम्बन्धी, अभी भाई है अभी स्वार्थवश दुश्मन हो जाते, दुःख और धोखा देने वाले हो जाते,मोह की रस्सियों में बांधने वाले,ऐसे अनेक सम्बन्ध छोड़ एक में सर्व सुखदाई सम्बन्ध प्राप्त करते तो क्या त्याग किया? सदा लेने वाले सम्बन्ध छोड़े,क्योंकि सभी आत्मायें लेती ही हैं, देते नहीं। एक बाप ही दातापन का प्यार देने वाला है, लेने की कोई कामना नहीं। चाहे कितनी भी धर्मात्मा,महात्मा,पुण्य आत्मा हो, गुप्त दानी हो, फिर भी लेता है,दाता नहीं है। स्नेह भी शुभ लेने की कामना वाला होगा। बाप तो सम्पन्न सागर है इसलिए वह दाता है! परमात्म प्यार ही दातापन का प्यार है। इसलिए उनको देना नहीं, लेना है। ऐसे ही विनाशी पदार्थ विषय भोग अर्थात् विष भरे भोग हैं। मेरे-मेरे की जाल में फँसाने वाले विनाशी पदार्थ भोग-भोग कर क्या बन गये? पिजड़े की पंछी बन गये ना। ऐसे पदार्थ, जिसने कखपति बना दिया,उसके बदले सर्वश्रेष्ठ पदार्थ देते जो पद्मापद्मपति बनाने वाले हैं। तो पद्म पाकर, कख छोड़ना, क्या यह त्याग हुआ! परमात्म प्यार भाग्य देने वाला है। त्याग स्वतः ही हुआ पड़ा है। ऐसे सहज सदा के त्यागी ही श्रेष्ठ भाग्यवान बनते हैं।
कभी-कभी बाप के आगे वई लाडले ही कहें, लाड प्यार दिखाते हैं कि हमने इतना त्याग किया,इतना छोड़ा फिर भी ऐसे क्यों! बापदादा मुस्कराते हुए बच्चों को पूछते हैं कि छोड़ा क्या और पाया क्या? इसकी लिस्ट निकालो। कौन सा तरफ भारी है - छोड़ने का वा पाने का?आज नहीं तो कल तो छोड़ना ही है, मजबूरी से भी छोड़ना ही पड़ेगा, अगर पहले से ही समझदार बन, प्राप्त कर फिर छोड़ा तो वह छोड़ना हुआ क्या! भाग्य के वर्णन के आगे त्याग कौड़ी है। भाग्य हीरा है। ऐसे समझते हो ना! वा बहुत त्याग किया है?बहुत छोड़ा है? छोड़ने वाले हो या लेने वाले हो? कभी भी स्वप्न में भी ऐसा संकल्प किया तो क्या होगा?अपने भाग्य की रेखा, मैंने किया, मैंने छोड़ा, इससे लकीर को मिटाने के निमित्त बन जाते। इसलिए स्वप्न में भी कब ऐसा संकल्प नहीं करना।
प्रभु-प्यार सदा समर्पण भाव स्वतः ही अनुभव कराता है। समर्पण भाव बाप समान बनाता। परमात्म प्यार बाप के सर्व खज़ानों की चाबी है क्योंकि प्यार वा स्नेह अधिकारी आत्मा बनाता है। विनाशी स्नेह, देह का स्नेह राज्य भाग्य गँवाता है। अनेक राजाओं ने विनाशी स्नेह के पीछे राज्य भाग्य गँवाया। विनाशी स्नेह भी राज्य भाग्य से श्रेष्ठ माना गया है। परमात्म प्यार, गँवाया हुआ राज्य भाग्य सदाकाल के लिए प्राप्त कराता है। डबल राज्य अधिकारी बनाता है। स्वराज्य और विश्व का राज्य पाते। ऐसे परमात्म प्यार प्राप्त करने वाली विशेष आत्मायें हो। प्यार करने वाले नहीं लेकिन प्यार में सदा समाये हुए लवलीन आत्माएं बनो। समाये हुए समान हैं- ऐसे अनुभव करते हो ना!
नये-नये आये हैं तो नये आगे जाने के लिए सिर्फ एक ही बात का ध्यान रखो। सदा प्रभु प्यार के प्यासे नहीं लेकिन प्रभु प्यार के भी पात्र बनो। पात्र बनना ही सुपात्र बनना है। सहज है ना। तो ऐसे आगे बढ़ो। अच्छा!
ऐसे पात्र सो सुपात्र बच्चों को, प्रभु प्रेम की अधिकारी आत्माओं को,प्रभु प्यार द्वारा सर्वश्रेष्ठ भाग्य प्राप्त करने वाली भाग्यवान आत्माओं को,सदा स्नेह के सागर में समाये हुए बाप समान बच्चों को, सर्व प्राप्तियों के भण्डार सम्पन्न आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
पार्टियों के साथ
प्रश्न:- महा-तपस्या कौन सी है? जिस तपस्या का बल विश्व को परिवर्तन कर सकता है?
उत्तर:- एक बाप दूसरा न कोई - यह है महा-तपस्या। ऐसी स्थिति में स्थित रहने वाले महातपस्वी हुए। तपस्या का बल श्रेष्ठ बल गाया जाता है। जो इस तपस्या में रहते - एक बाप दूसरा न कोई, उनमें बहुत बल है। इस तपस्या का बल विश्व परिवर्तन कर लेता है। हठयोगी एक टांग पर खड़े होकर तपस्या करते हैं लेकिन आप बच्चे एक टांग पर नहीं, एक की स्मृति में रहते हो, बस - एक ही एक। ऐसी तपस्या विश्व-परिवर्तन कर देगी। तो ऐसे विश्वकल् याणकारी अर्थात् महान तपस्वी बनो।