Murli de Mamma - gyan-sitar-06

२०.१२.५८

अन्धियारे से रोशनी में आने के बाद विचारों का परिवर्तन

आज की दुनिया कितने अंधियारे में है वह भी अब हम जानते हैं, जबकि हमारे पास रोशनी है। मनुष्यों को पता ही नहीं है कि इसी दुनिया में ही मनुष्यों के लिए स्वर्ग था, सदा सुखमय जीवन थी। रंचक भी उस सुख को नहीं जानते हैं। तरस पड़ता है कि बेचारे कितना अंधियारे में हैं ! समझते हैं- “बस, यही दुनिया है, इसमें ही बहिश्त, दोजक है। हमारे पास धन-दौलत है, घर में कोई खिटपिट नहीं है। फिर हम ख्याल ही क्यों करें कि कोई बहिश्त था जो हमने देखा नहीं है। हम जिस दुनिया को देखते हैं वही दुनिया है। इस समय तो हम बहिश्त में हैं। कल का भी हम सोच नहीं करते हैं। कल धन चला जाएगा, दुःख होगा – यह ख्याल ही क्यों करें ?" बिल्कुल विवेक मारा हुआ है। अच्छा, भल हमको अनुभव नहीं है कि शादी के बाद क्या दुःख होता है परन्तु बुद्धि से समझ तो सकते हैं। बड़ों को अथवा छोटों के जीवन को देखते हैं कि हमारे होते हमारे छोटे कैसे दुःखी हो रहे हैं। तो भी समझते - हम तो सुखी हैं ना। मनुष्य का विवेक इतने तक भी नहीं चलता। ऐसे थोड़े ही हमारे पास दुःख नहीं है तो समझें दुःख है ही नहीं। आज का संसार इतना तो गिरा हुआ है, जो इतना भी विवेक नहीं चलाते। मनुष्य जो कुछ काम अथवा पुरुषार्थ करते हैं, ख्याल तो रहता है ना कि इस धंधे से इतना फायदा होगा, इनसे नुक्सान होगा, १२ मास के बाद फिर नुक्सान न पड़ जाए। पिछाड़ी में बच्चों के लिए इतना धन इकट्ठा करके जाएं जो वह सुखी रहें। आज एक बच्चा है, कल दो तीन होंगे, उनके लिए भी धन इकट्ठा करें – यह सब ख्याल करते तो हैं ना। मनुष्यों की बुद्धि चलती है परन्तु समझते नहीं हैं। यह सब विचार पीछे के ही हैं ना। आज क्या है, कल क्या होगा ? यह नहीं समझते कि हमारी जीवन उल्टी भी हो सकती है। यह जो कर्म बनते आये हैं उनको सुधारना कैसे है ? यह बुद्धि में ही नहीं आता है। इतने तो अन्धियारे में पड़े हैं -- देखते हुए भी सोच नहीं करते हैं कि क्यों न पहले से ही हम ऐसे कर्म बनावें जो पीछे सुख भोगें। पीछे के सोच के सिवाए मनुष्य का कदम भी नहीं चल सकता है। समझते हैं - मेहनत करेंगे, इनसे इतने दिन पेट का गुजारा होगा, इस धन्धे से २४ घण्टे सुख से बीतेंगे । इन विचारों के सिवाए तो मनुष्य की चाल चलती नहीं है। यह मालूम ही नहीं कि वर्ल्ड की हिस्ट्री कहाँ से शुरु हुई ? कोई समय दुनिया ऐसी ऊंच स्टेज पर थी। समझते हैं - बस, इस दुनिया में ही सब कुछ है, दुनिया की यही चाल है। अगर ऐसी ही चाल है तो फिर दुःख भी नहीं होना चाहिए। मनुष्य मरता है, यह तो होगा ही फिर -- रोते क्यों हैं ? आजकल बुद्धि एकदम मारी गई है।

यह अब हम जानते हैं कि कुछ तो अपनी जीवन बनानी चाहिए। कई मनुष्य ऐसे भी समझते हैं कि यह कोई जीवन नहीं है। परन्तु कैसे और किस द्वारा वह जीवन बने – सो जानते नहीं। सारी दुनिया गिरी हुई है। जब दुःख आता है, ठोकर लगती है, तो आवाज़ निकलता है इनसे छूटें । परन्तु रोशनी देने वाला भी चाहिए। वह है ही एक । उस द्वारा हमें सदाकाल के लिए अब रोशनी मिल गई है। अन्धियारे और रोशनी का हम अब साक्षात्कार करते जाते हैं। देखते हुए भी मनुष्यों की आंखें बन्द हैं। दुःख देखते भी हैं परन्तु समझते हैं हमारे लिए नहीं है। ऐसे भी मनुष्य हैं जो समझते हैं – “भगवान, जिसको हम देखते ही नहीं तो विचार ही क्यों करें ? सुख की दुनिया देखी ही नहीं है तो मानें कैसे ?” अच्छा, दादे-परदादे को देखते नहीं हैं, तो थे ही नहीं क्या ? समझते तो हैं ना – हमारे पिता ने उनसे जन्म लिया होगा। समझ की बात है ना। इस अन्धियारे का भी साक्षात्कार तब होता है जब रोशनी में हैं। अब हमारी सुख की दुनिया बन रही है। आत्मा पूर्ण सन्तुष्ट तो परमात्मा द्वारा ही हो सकती है। अब हम अनुभव करते जाते हैं। अच्छा ।