Murli de Mamma - gyan-sitar-07

२२.१२.५८

मुक्ति अर्थात् दुःख के बन्धन से छूटना और जीवन्मुक्ति अर्थात् सुख के जन्मों में आना

ओम् शान्ति। अभी हमारा सतगुरु निराकार परमात्मा है जो पारलौकिक सर्व शक्तिवान समर्थ है। गुरु का सम्बन्ध होता ही है मुक्ति-जीवन्मुक्ति देने के लिए। वह चीज़ कोई लौकिक गुरु द्वारा मिलनी नहीं है क्योंकि वह सब हैं जन्म-मरण में आने वाले । मुक्ति-जीवन्मुक्ति तो अजन्मा ही देगा। वह एक ही सतगुरु है। बाकी तो सब गुरु हुए इस लोक के। वह भी पुनर्जन्म में आने वाले और हम भी पुनर्जन्म में आने वाले । पुनर्जन्म तो सतयुग में भी होते हैं। परन्तु वह कर्मबन्धन के दुःख का जन्म नहीं है। वहाँ कर्म, अकर्म हो जाते हैं। हम अभी के इस पुरुषार्थ से पूर्ण प्रालब्ध लेते हैं। ऐसे नहीं २१ जन्मों में पुरुषार्थ कर प्रालब्ध बनायेंगे । नहीं, अभी ही सब कुछ करना है। अब हम समझते हैं कि जीवन्मुक्ति है ही २१ जन्मों की और मिलती भी सतगुरु द्वारा है। जीवन्मुक्ति से मुक्ति को सिद्ध करते हैं। मुक्ति होती तब है जब जीवन्मुक्ति मिलती है। यह कर्तव्य एक सतगुरु ही कर सकता है। २१ जन्म जीवन्मुक्ति जो मिलती है वह अभी की ही प्राप्ति है। तो हमारा तैलुक (संबंध) उस एक के साथ है। और सब देह सहित देह के सम्बन्ध टूट जाते हैं। मुक्ति का मतलब है दुःख के बन्धन से छूटना। जीवन्मुक्ति अर्थात् सुख के जन्मों में आना। यह कार्य उनका ही है। तो देह के सब सम्बन्ध अभी नहीं छूटे हैं तो ज़रुर दुःख के कर्मबन्धन का नाता है। उसका हिसाब-किताब भोगना ही पड़ेगा। अगर परमात्मा बाप से पूरा वर्सा लेना है तो पूरा संबंध रहना चाहिए । इसको बहुत थोड़े समझते हैं। जैसे जीवन का संबंध अपने आप से है ना।? मन्सा-वाचा-कर्मणा सब जीवन के नाते को जानते हैं। वैसे ही मन, वाणी, कर्म से सब उनके पास ट्रान्सफर करना है। सिर्फ बुद्धियोग द्वारा याद नहीं करना है, लेकिन मन-वाणी-कर्म - सबसे उनका हो जाना है । इसमें वाचा का भी संबंध है, बुद्धि का भी संबंध है। जबकि करनकरावनहार उपस्थित है तो हमारे कर्म भी उनके कर्म से संबंध रखने वाले होने चाहिए। वाचा भी वही हो जो भगवानुवाच है और मन्सा भी वही हो अर्थात् उनको ही याद करना है। भगवान से पूरा संबंध रखना है, तब ही पूर्ण मुक्ति - जीवन्मुक्ति मिल सकती है। भगवान से वरदान तो पूरा लेना है ना। सर्व दुःखों से छूटना है। अगर सजाएं खाई तो वह भी दुःख हुआ। कर्मबन्धन से छूटने का मतलब है कर्मबन्धन की सजाओं के दुःख से भी छूटना । ऐसे नहीं सजा खाकर मुक्त होना है।

लेकिन सम्पूर्ण दुःख से छूट सम्पूर्ण सदाकाल के सुख को प्राप्त करना - यह है हमारा पुरुषार्थ जो एक परमात्मा ही करा सकते हैं। हमारे इस पुरुषार्थ का फिर रिस्पॉन्सिबल वह हो गया। परन्तु जब तक पूरा संबंध नहीं है, तो समझना चाहिए हम अपने कर्मों के रिस्पॉन्सिबल हैं। हमारे कर्मों का रेसपान्सिबल वह तब होगा जब हम उनके पूरे बनें। उनके हाथ में हाथ देना अर्थात् पूरा सम्बन्ध जोड़ना। उनके ही कर्तव्य में लग जाना है। अगर कुछ कर्मबन्धन को सम्भालने में लगे तो उस परमात्मा की सेवा में ज़रुर कुछ कम हो जाएगा । इसलिए तन-मन-धन से उनकी सेवा में लगना है। उनका पूरा बनकर उनके कार्य में पूर्ण मददगार साथी बनेंगे तो उसका रिटर्न भी इतना मिलेगा। जैसे गवर्मेन्ट की जो जितनी सेवा करता है उसे उतना मिलता है ना । इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा बनने से ही पूरी प्राप्ति होगी। लेकिन पूरा मददगार भी बनना है। ना से तो फिर भी जो जितना करें उतना अच्छा ही है। फिर भी सतयुगी दुनिया में तो आएंगे ना, या तो सूर्यवंशी राजा बनेंगे या सूर्यवंशी प्रजा में आयेंगे। या फिर चन्द्रवंशी राजा-रानी बनेंगे या चन्द्रवंशी प्रजा में आएँगे। इसमें पूछने की भी बात नहीं रहती। प्रैक्टिकल चरित्र से मालूम पड़ता है।

तो हमको क्या करना है ? क्योंकि उनका सारा काम प्रैक्टिकल में है। वह चरित्र प्रैक्टिकल में चल रहे हैं। करनकरावनहार कर और करा रहे हैं। बुद्धि द्वारा हम समझते भी हैं। फिर करना क्या है, सो तो हर एक अपना साहस रखेगा। बाकी समझाया तो सब जाता है - हर एक को करना क्या चाहिए ? सो तो अपनी हिम्मत, अपना बल जितना होगा उतना कदम उठायेंगे। जिसको बनना है उनको करना है। पुरुषार्थ में कम जास्ती तो होंगे ही क्योंकि नम्बरवार सब बनते हैं। भल जानते हैं जो कल्प पहले बने थे वही बनेंगे। पुरुषार्थ करने के बाद रिजल्ट निकलेगा। इसमें यह कहना नहीं होता कि जैसा डायरेक्शन मिलेगा वैसे करेंगे। पुरुषार्थी की चाल ही सिद्ध करती है कि यह किस प्रालब्ध के लायक है। उसके लिए कोई डायरेक्शन नहीं मिल सकते। टोटल नॉलेज तो मिल ही रही है – राजा-रानी बनने का पुरुषार्थ क्या है? प्रजा बनने का पुरुषार्थ क्या है? बाकी अपने को लायक बनाना, यह तो अपने ऊपर है। हमको सतगुरु का पूरा सहारा है। देने वाला वह है, लेने वाले हम हैं। हम भी पुरुषार्थी की चाल से समझते हैं, वह भी उनसे समझेंगे। जो करेगा, रिजल्ट निकलेगा, कहेंगे -- यही कल्प पहले वाले थे। ऐसे तो नहीं कहते हैं -- कल्प पहले यह बने थे, इनको ही पुरुषार्थ कराना है। भगवान भी ऐसा एडवान्टेज नहीं लेते हैं। बनना है अपने पुरुषार्थ से। पढ़ाई सबको सरीखी (समान) मिलती है। फिर जो जितना पढ़ते हैं उतना पद पाते हैं। जो करेंगे सो पायेंगे। अच्छा।