Murli de Mamma - gyan-sitar-09

२७.१२.५८

परमात्मा की नज़र और ईशारा सिर्फ, अभी ही प्रैक्टिकल में मिलता है

कहा जाता है -- "हिम्मते मर्दा, मददे खुदा ।" यह अक्षर किस समय के और किसके हैं, यह भी अभी हम जानते हैं। दुनिया वाले समझते हैं -- जो कुछ चल रहा है वह परमात्मा के ही इशारे से चलता है क्योंकि वह सर्वत्र है, हाजिरा हजुर है। उनके इशारे अथवा हुक्म से ही अच्छा अथवा बुरा सब कुछ चल रहा है। हम जानते हैं कि प्रैक्टिकल में उनकी नज़र, उनका ईशारा और पुरुषार्थ करना-कराना, इस एक समय की ही बात है, जिस समय वह प्रैक्टिकल अपनी नज़र और डायरेक्शन से आकर काम कराते हैं। तीनों कर्त्तव्य अब करते हैं। स्थापना का काम भी चल रहा है, विनाश की भी तैयारी हो रही है और जो स्थापना करते हैं, उनकी प्रालब्ध चले - वह भी अब बनाई जाती है। एक ही टाइम पर सब काम करते हैं। ऐसे नहीं सारे चक्र का दुःख-सुख वह बनाते हैं। हम जानते हैं -- वह तो अच्छी बात बनायेगा ना। आधाकल्प सुख की प्रालब्ध रहती है। उनके कर्त्तव्य से ही सिद्ध है कि एक चीज़ के विनाश और दूसरी चीज की स्थापना के लिए वह उपस्थित है। जिस चीज का विनाश कराते हैं तो ज़रुर वह बुरी चीज है। बुराई को विनाश ही करना है तो फिर उसको रच कैसे सकता ? वह बनाते हैं अच्छी चीज़ । तो उनका कर्त्तव्य ही सिद्ध करता है कि उसने अच्छे की स्थापना और बुरे का विनाश किया है। अभी हमें उनकी नज़र प्रैक्टिकल में मिलती है। प्रैक्टिकल में डायरेक्शन देते हैं। वह हमारे सामने खुद अपने ईशारे से काम करा रहे हैं। हम अपने पुरुषार्थ से अपनी प्रालब्ध बना रहे हैं। अब का ही प्रैक्टिकल पार्ट है। अगर सदा यह पार्ट होता तो फिर सदा विनाश, सदा स्थापना-पालना होती ।

मनुष्य समझते भी ऐसे हैं कि “मनुष्य खाते-पीते हैं, मरते-जन्मते हैं – यह सब भगवान कराते हैं। भगवान की यह स्थापना-विनाश-पालना जैसे कि चलती ही रहती है।” परन्तु अब हम जानते हैं - उनकी विनाश-स्थापना-पालना का पार्ट ऐसे नहीं होता है। वह तो आधा कल्प के लिए ऐसी स्थापना कर देते हैं, जिसमें सदा सुख है। इन बातों को अब हम समझ कर अपनी भविष्य प्रालब्ध बना रहे हैं। पालना भी फिर हमारे द्वारा ही उनको करानी है। हिम्मत और मदद अभी की बात है। बाकी इतना जो करते आये उसमें प्रैक्टिकल मदद नहीं थी । हमारे ही पुरुषार्थ से हमको ऐसी प्रालब्ध मिलती है। इस हिसाब से आधा सुख, आधा दुःख रखा हुआ है। हम ही प्रैक्टिकल में चक्र में आते हैं । दुनिया इस समय की बातों को यादगार के रुप में सिमरण करती है। प्रैक्टिकल पार्ट बहुत थोड़ा टाइम है।

अब हमारी बुद्धि में नॉलेज है। ऐसे थोड़ेही, कोई दुःखी हो रहा है वह भी उनके इशारे से । नहीं । यह तो हर एक के कर्म हैं जिस कारण दुःख-सुख उठाते आते हैं। उनकी नज़र, उनका ईशारा ऊंच चढ़ाने वाला है क्योंकि वह खुद ऊंचे ते ऊंच है। उनके पार्ट में ऊंच ले जाने की ही बात है। यादगार सब हैं ही इस समय के । औरों के यादगार ऐसे नहीं गाये जाते हैं। उन्होंने भी परमात्मा के यादगार गाये हैं। महिमा सारी परमात्मा की है, न कि कोई मनुष्य हस्ती की। परमात्मा एक ही समय आकर सारा काम पूरा कर जाते हैं। फिर कुछ रहता नहीं, जिसके लिए आना पड़े। स्थापना भी आधा कल्प के लिए कर देते हैं। विनाश भी पूरा कर लेते हैं। यह भगवान का पार्ट और हमारा पार्ट बड़े कायदे से बना हुआ है, जिसका चक्र चलता रहता है। एक तरफ़ आदि और एक तरफ़ अन्त है। इस समय उनके द्वारा हमको रोशनी मिल रही है। उस रोशनी से हम चल रहे हैं। जो चलते हैं उनके लिए ही रोशनी है। जब तक उनकी नज़र में नहीं हैं तब तक जैसे कि अन्धियारे में हैं। हिम्मते मर्दा मददे खुदा, दोनों का कनेक्शन है । पुरुषार्थ करें तब मदद भी मिले । आधा कल्प सिर्फ सुनते आये हैं। अब प्रैक्टिकल उनके द्वारा प्राप्त करना है। इसलिए कोई भी बात से हमको घृणा नहीं आ सकती है। बना बनाया खेल है, इसमें ऊंचा, नीचा -- सब पार्ट है। हम अपने अभी के पुरुषार्थ की मंजिल को भी समझते हैं। इसे भी हमको तय करना है ।