Murli de Mamma - gyan-sitar-12
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३०.१२.५८
पुराने कर्मबन्धन के हिसाब - किताब को मिटाकर पूरा बाप के हवाले हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषार्थ है
भगवान को कालों का काल भी कहा जाता है। क्योंकि इस समय उनका पार्ट ही है पूर्ण विनाश करने का। जबकि उनको पूर्ण विनाश करना है तो जरुर कालों का काल बनना पड़े । मरते तो आते हैं, परन्तु उस मरने और अभी के मरने में बड़ा फर्क है ! अब तो मानों अनेक जन्मों का मौत है। इसलिए अनेक जन्मों के हिसाब-किताब को भगवान के आगे रखना है। किस तरीके रखना है, वह भगवान खुद ही आकर समझाते हैं। कहते हैं - चाहे अनेक जन्मों के डन्डे खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करो, चाहे मेरे द्वारा मेरे साथ संबंध जोड़कर जीते जी मरो । आप सब जीते जी मर रहे हो या मर भी चुके हो ? हम सब पुरुषार्थी हैं। दिन-रात हर सेकेण्ड पुरुषार्थ करते हैं। जबकि उनके साथ हमको चलना है तो इस पुराने कर्मबन्धन के हिसाब-किताब को पूरा चुक्तू कर देना है। भल गोद भी ली है, तो भी अपने हिसाब-किताब को तो जीते जी चुक्तू करना है ना। उसमें सक्सेसफुल कहाँ तक रहते हैं - वह बात और है परन्तु अटेन्शन दिन-रात जरुर होना चाहिए ।
तो पूर्ण विनाश का मतलब यह नहीं कि सिर्फ दुनिया का विनाश परन्तु उनको आत्माओं के पूर्ण हिसाब-किताब को भी चुक्तू करना है। आत्मायें उनके हवाले हों तब तो धर्मराज हिसाब-किताब चुक्तू करे। विनाश की भी फुल तैयारियां हो रही हैं और यहाँ परमात्मा जीते जी आत्माओं को देह से अलग कराके अपने हवाले करते हैं। देह और देह के सम्बन्धियों से निकल उनके हवाले होना है। उस तरफ परमात्मा ने वह तैयारियां भी कराई हैं, क्योंकि सबको ले जाना है। यह भी बतलाते हैं कि जीते जी हमारा होने से बहुत बड़ा पद प्राप्त होगा। ऐसे भी नहीं, सिर्फ गोद ली तो मर चुके । यह तो आत्माओं का पुरुषार्थ बहुत गहरा है। आत्माओं को अपने पूर्ण संस्कारों को मिटाए उनके हवाले करना है। हिसाब-किताब पूरा देना है। अपनी प्रालब्ध लेने का भी हिसाब उनके आगे रखना है क्योंकि परमात्मा को स्थापना, विनाश, पालना का कार्य अब ही पूरा कर जाना है। बाप हमें बतलाते हैं कि कल्प पहले इस पुरुषार्थ से तुम यह बने थे । परन्तु ऐसे तो नहीं बन गये। कहते हैं- मेरे द्वारा अपना पुरुषार्थ करने से बने थे । तो भविष्य का जोड़ और पास्ट का माइनस करना है। जीते जी यह काम करना - इसमें मुश्किलात आती है। बड़ी कठिन मंजिल है। माया ऐसी है जो बच्चे बनकर फिर बदल जाते हैं।
लक्ष्य तो बहुत ऊंचा है। सिर्फ वायदा करना है। भल यह बतलाया जाता है कि महारथी, घोड़ेसवार, प्यादे के लिए क्या-क्या पुरुषार्थ है, लेकिन पुरुषार्थ को तो समझना है ना कि किस पुरुषार्थ से पूरी प्राप्ति करें ? भगवान द्वारा समझाया तो जाता है कि ज्ञान बहुत सहज है, पुरुषार्थ बहुत गम्भीर है। इसमें पूरा हिसाब-किताब देना होता है और लेना होता है । परन्तु इसमें भी रुकावटें आती हैं। हम तो ऐसे दांव लगाने वाले को धन्यवाद देंगे। बाकी मंजिल कड़े से कड़ी भी है, मीठे से मीठी भी है, अति सहज भी है, डिफीकल्ट भी है। सहज इसलिए है क्योंकि उनका तरीका बहुत सहज है, उनको जानना भी सहज है। परन्तु फिर भूलते भी झट हैं। यह सब विघ्न नूंधे हुए हैं। उनको जानकर अन्त तक निभाना है। ऐसे निभाने वाले ही पूरा लाभ ले सकते हैं। उस दुनिया में भी सब कुछ चाहिए । राजा-रानी में भी नम्बरवार, प्रजा में भी नम्बरवार । सब एक स्थिति में नहीं रह सकते। इसलिए जानकर, सम्भलकर चलना है।