Murli de Mamma - gyan-sitar-13

३१.१२.५८

निरन्तर योग में स्थित रहने की सहज युक्ति

जिस चीज से स्नेह होता है उस चीज की याद आती है और स्नेह तब होता है जब उससे कुछ प्राप्ति होती है। यह अनादि कायदा है। अब हमारा भी परमात्मा के साथ स्नेह है। हम अनुभव से कह सकते हैं कि परमात्मा द्वारा हमें सब कुछ प्राप्त हुआ था और अब भी प्राप्त हो रहा है। जिस द्वारा प्राप्त होता है, उससे स्नेह रहता है और जिससे स्नेह है उनकी याद आती है। उसमें ज्ञान और योग दोनों आ जाता है। ज्ञान से स्नेह रहेगा, स्नेह से याद रहेगी। यह सब बातें समझने की हैं। जो चीज मिलने की है वह अनुभव होती है। मिलने की चीज है सुख-शान्ति। जितना-जितना हम जानते जाते हैं, उतना अनुभव होता जाता है। अशान्ति से शान्ति, दुःख से सुख अब प्राप्त हो रहा है। पीछे तो होगी ही प्रालब्ध। अब दोनों चीज का कान्ट्रास्ट सामने रख सकते हैं। अनुभव के आधार से कह सकते हैं कि परमात्मा के साथ अब हमारा स्नेह बढ़ता जाता है।

योग के लिए कोई स्थूल साधना की बात नहीं है। नालेज से अनुभव में हैं, अनुभव से उनकी याद आपेही रहती है। याद नेचुरल चीज है। हम उनको कितना भी मिटायेंगे परन्तु वह चीज मिटेगी नहीं। याद की तरकीब बड़ी सहज है। संबंध से याद है ही है। यह भी हम जानते हैं कि वह सबको सुख देने वाला है। वह सब कुछ प्राप्त कराने वाला आकर उपस्थित हुआ है। अब प्राप्ति का अनुभव हो रहा है। तो उनका ही स्नेह रहता है, उनकी ही याद रहती है। यह अनुभव की बातें हैं। स्नेह का आधार अनुभव के ऊपर है। जितना अनुभव की प्राप्ति उतना स्नेह बढ़ता रहेगा। स्नेह से याद बढ़ेगी। अब इस दुनिया के दुःख के आसार प्रत्यक्ष होते जाते हैं, तो जरुर उनके पीछे सुख-शान्ति है। अनुभव से हम कह सकते हैं कि यह प्राप्ति हो रही है। तो जरुर हमारा बुद्धियोग और तरफ से हट उनके साथ ही रहेगा।

कोई-कोई पूछते हैं – “हमारी कब-कब अवस्था नीचे-ऊपर क्यों होती है? ४ दिन अच्छी रहती तो ६ दिन आनंद, खुशी, उल्लास नहीं रहता।” जितना-जितना नॉलेज होगा उतना स्नेह बढ़ेगा, उतनी ही याद अटूट लगातार रहेगी । भल कोई और कार्य होगा तो भी बुद्धि में वह बात घूमती रहेगी । तो यह याद भी ऐसी चीज है जो हमारे भूलाने से भी नहीं भूलेगी । जितना-जितना हम नालेज को जानते अनुभव को पाते जायेंगे उतना याद बढ़ती जायेगी । इसमें हाथ-पांव से करने की बात नहीं। जितना नालेज का अनुभव होगा उतना स्नेह रहेगा और जितना स्नेह उतना अटूट याद अथवा निरन्तर याद रहेगी ।

यह है प्रैक्टिकल बात । जैसे उन बातों में प्रैक्टिकल जीवन चलती थी, अब उनको बदलकर यह प्रैक्टिकल जीवन बनानी है। जीवन को सिर्फ बदलना है। कितनी सहज बात है ! बाहर का कोई ठाठ नहीं। कहाँ जगंल आदि में जाना अथवा साधना करना, इसकी भी दरकार नहीं है। उठते-बैठते, बोलते-चलते, आहार-विहार, खान-पान आदि सबमें वह नेचुरल चेंज आ जाती है। कोई एक-एक बात के लिए साधन नहीं करना पड़ता । सब बातों में पल्टा (परिवर्तन) आटोमेटिकली आ जाता है। ऐसे नहीं कि योग के लिए कोई अलग साधना करनी पड़ेगी । इसमें तो आटोमेटिकली वृति बदल जाती है । सूक्ष्म, स्थूल आन्तरिक अवस्था आदि सब बातों में चेंज आ जाती है। स्थिति भी बदल जाती है। मन-वाणी-कर्म इक्ट्ठा-इक्ट्ठा बदल जाता है। फिर जब आत्मा प्योर हो जाती है तो शरीर भी प्योर मिलता है। शरीर के ऊपर भी आत्मा के संस्कारों का संबंध है । कोई समझते हैं - "हमारे में क्रोध है, मोह है उसका क्या उपाय करें ? न चाहते भी हो जाता है"। परन्तु उसके लिए कोई अलग उपाय नहीं है। उपाय एक ही है कि एक बाप को याद करो। याद से सब विकार समाप्त हो जायेंगे । परन्तु यह सब समझने की बातें हैं। अच्छा । ओम् शान्ति ।