Murli de Mamma - gyan-sitar-15

21/4/1959

आत्मा और शरीर – दोनों की खूबसूरती का आधार 'कर्म' है

ओम् शान्ति । सूरत और सीरत - सूरत कहा जाता है रुप को, सीरत कहा जाता है गुणों को । यह दोनों चीज बनती हैं संस्कारों के आधार से। आत्मा ज्ञान से खूबसूरत अथवा प्रकाशमय बनती है। जैसे परमात्मा सबसे तेजोमय है ना । तो यह तेज और गुण भी संस्कारों के आधार पर रहते हैं। जिस आधार पर फिर शरीर भी ऐसा प्योर मिलता है। शरीर का रुप भी संस्कारों के आधार पर बनता है। शरीर और आत्मा की खूबसूरती - दोनों का आधार है मनुष्य के कर्मों पर और कर्म से फिर जो संस्कार बनते हैं वह उस अनुसार ।

अब हमारा पुरुषार्थ है कि हम आत्मा को खूबसूरत बनायें । तो यह सब हो गया आत्मा के आधार पर। जितना-जितना आत्मा को ऊंचा उठायेंगे उतना आत्मा खूबसूरत होगी और सीरत भी ऐसी होगी। आत्मा के साथ देह का संबंध है, देह के साथ सब संबंधों का कनेक्शन है। इन सबको आधार मिला है आत्मा के संस्कारों का । जितना-जितना उनको प्रकाशमय बनायेंगे तो फिर गुण भी ऐसे रहेंगे। आत्मा को ही शुद्ध बनाना है। आत्मा के प्योरीफाइड होने से यह सब कुछ प्योर बनेगा । सूरत और सीरत आत्मा की बनानी है। बनाने वाला वह है। आत्मा बदल जाती तो शरीर भी बदल जाता है। सारी सजावट बदल जाती है।

तो अपना अटेन्शन है आत्मा पर । सबसे खूबसूरत तो परमात्मा ही है जिस द्वारा ही सब आत्मायें प्योरीफाइड बनती हैं। परमात्मा इमार्टल है। आत्मा फिर भी बदलती है। तो अपना अटेन्शन है आत्मा की तरफ । इनसे सारी रचना खूबसूरत हो जायेगी, जिसको स्वर्ग कहा जाता है। स्वर्ग को ही सबसे खूबसूरत कहेंगे । सारी खूबसूरती का आधार आत्मा पर है। उनको भी इतना इमार्टल बनाना है जो इतना समय उनकी सूरत और सीरत दोनों कायम चलें । सूरत खूबसूरत है तो अवश्य सीरत भी ऐसी रहेगी। ओम् शान्ति ।