Murli de Mamma - gyan-sitar-16

२२.४.५९

मुक्ति और जीवन्मुक्ति का आपस में संबंध

ओम शान्ति । परमात्मा के द्वारा सारी रचना की नालेज अर्थात् इस मनुष्य सृष्टि और निराकारी दुनिया के सारे भेद को जानते जा रहे हैं। क्योंकि निराकारी दुनिया का इस साकारी दुनिया से संबंध है और साकारी दुनिया का निराकारी दुनिया से संबंध है। आत्मायें पार्ट बजाने आती हैं, फिर जाती हैं। मनुष्य समझते हैं कि "हम भी कोई पुरुषार्थ से कभी मुक्ति पद को पा सकते हैं। ऐसे बहुत मुक्ति को पाये हुए हैं ।” परन्तु हम जानते हैं कि मुक्ति और जीवन्मुक्ति - दोनों का आपस में संबंध है। जैसे निराकारी दुनिया का साकारी दुनिया से संबंध है, ऐसे जब तक परमात्मा द्वारा जीवनमुक्त दुनिया न बने, तब तक मुक्त भी कोई नहीं बन सकता ।

दुनिया नहीं जानती कि मुक्ति अलग चीज है, जीवन्मुक्ति अलग चीज है। हम जानते हैं -- जब दुनिया जीवन्मुक्त बने तब बाकी सब मुक्ति में जावें । तो मुक्ति-जीवन्मुक्ति इक्ट्ठी हो गई ना । मुक्त-जीवनमुक्त सबको इक्ट्ठा एक ही टाइम पर होना है। इसमें हर चीज आ जाती है। तब ही आत्मा भी वह मुक्ति-जीवन्मुक्ति का सुख ले सकती है। सारी दुनिया से इसका संबंध है। तो यह सब बातें इक्ट्ठी हैं। ऐसे नहीं, कभी भी कोई मुक्त हो सकते हैं। मुक्ति-जीवन्मुक्ति इक्ट्ठी हैं। तो इस रचना के आदि-मध्य-अन्त को हम परमात्मा द्वारा जानते जा रहे हैं।

तो साकारी और निराकारी दुनिया का भी आपस में संबंध है जिससे यह चक्र चलता रहता है। दुनिया इस मुक्ति-जीवन्मुक्ति के अर्थ को न जानने के कारण समझती है - "कोई भी पुरुषार्थ से मुक्ति को पा सकते हैं, फलाने-फलाने ने पाई हुई है।” परन्तु कोई ने भी पाई नहीं है। इसका पुरुषार्थ एक ही टाइम होता है और एक के द्वारा ही यह पुरुषार्थ सीखते हैं। जीवन्मुक्त पद सारी दुनिया का पद है, एक मनुष्य का पद नहीं है। तो जब जीवन्मुक्त दुनिया बनती है तो अन्डरस्टुड है बाकी सब मुक्त हो जाते हैं ।