Murli de Mamma - gyan-sitar-22
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३०.८.५९
२१ जन्मों की प्रालब्ध का आधार इस अन्तिम एक जन्म का पुरुषार्थ
गीत:- बचपन के दिन भुला न देना…।
परमात्मा के साथ यह हमारे बचपन के दिन हैं जिसका ही गायन है। जीवन की छोटी आयु – वह बचपन तो कॉमन बात है। महिमा तो कोई उत्तम चीज की गाई जाती है ना। जब परमात्मा प्रैक्टिकल में आते हैं तब हम उनके बच्चे बन जन्मसिद्ध अधिकार लेते हैं। इन बचपन के दिनों में ही देखो, हम २१ जन्मों की कमाई कर लेते हैं ! ऐसे बचपन के दिनों का गायन है, जिस पर ही सारे चक्र का मदार है। उनका होकर जितना अब हक लेने का पुरुषार्थ करेंगे तो वह हमारी प्रालब्ध कई जन्मों तक चलती रहेगी। यह है परमात्मा से डायरेक्ट वर्सा लेना, उनकी पालना लेना। हक लेकर फिर उनकी पालना से खाते रहेंगे। २१ जन्म - २५०० वर्ष हम उस बाप का वर्सा खाते हैं। लौकिक बाप का तो खाते आये हैं, अब पारलौकिक बाप का वर्सा हम लेते हैं। अभी के पुरुषार्थ से ही २१ जन्मों की प्रालब्ध बनती है। लक्ष्मी-नारायण को भी इस पुरुषार्थ की प्रालब्ध मिली है। सारी वंशावली तो अब बनती है ना। तो सारा हक अभी हम जमाते हैं। इतने जन्मों का वर्सा पारलौकिक बाप से अभी हमको इस जन्म में मिलता है। उस पालना में दुःख-अशान्ति हो नहीं सकती। अभी तो कर्म-बंधायमानी के हिसाब से चलते हैं। फिर हम पारलौकिक बाप का खाते हैं। २१ जन्मों तक उनका वर्सा पाते हैं। यह है हमारा बचपन। अभी उनका बन हक लेने का दांव लगा रहे हैं। यह है सबसे श्रेष्ठ प्रालब्ध। ऐसे बाप की गोद लेना ही श्रेष्ठ है। उनकी ही बलिहारी है ना। अभी यह बचपन उस बाप के साथ हम बिता रहे हैं। अभी उनका नहीं बनेंगे तो दांव लगेगा ही नहीं। इसकी ही बलिहारी है। इसके आधार पर हम अनेक जन्मों की प्रालब्ध बनाते हैं। वह है हमारा पारलौकिक बाप। ऐसे बाप की पालना भी तो ऊंची होगी ना जिसमें कोई अप्राप्त वस्तु नहीं। तो इतना नशा रखना है ! इतनी ऊंच प्राप्ति के लिए अपना दांव पूरा लगाते रहना, इसमें ही फायदा है।
इस सारी रचना की नालेज को जानकर अभी समझ सकते हैं कि ज्ञान अथवा अज्ञान -- यह बातें ही इस समय की हैं जबकि इस सारे खेल के अन्त का समय है। परमात्मा द्वारा ही यह नालेज मिलती है जिससे फिर नई दुनिया स्थापन होती है। नॉलेज देने का समय अन्त का ही हो सकता है। क्योंकि सतयुग में भी देवतायें हैं, उस समय ज्ञान की आवश्यकता नहीं। पीछे तो दुनिया को पूरा नीचे आना ही है, तो ज्ञान की दरकार ही नहीं है। मनुष्य आत्मायें जब अज्ञान में हों तब ज्ञान देने के लिए फिर परमात्मा की आवश्यकता है। देवताओं के लिए कहते हैं कि वह इस धरनी पर पांव नहीं रखते । तो फिर ज्ञान कैसे देंगे ? हाँ, परमात्मा आते हैं। नॉलेजफुल भी वह हैं। कहते हैं - जब-जब धर्म ग्लानि होती है तब मैं आता हूँ। परमात्मा का कर्त्तव्य गाया हुआ है। देवतायें भी मनुष्य थे। वह इस पृथ्वी पर आकर ज्ञान नहीं देते हैं। तो हम जानते हैं एक ही समय पर एक परमात्मा ही आकर ज्ञान देते हैं। दुर्गति हो तब सद्गति के लिए ज्ञान की आवश्यकता रहे । सद्गति-दाता भी परमात्मा को कहा जाता है। परमात्मा द्वारा ही हम सारी नालेज जानते जा रहे हैं। जिनको त्रिकालदर्शी ऋषि-मुनि कहा जाता है, वह भी परमात्मा के बारे में बेअन्त कहते थे । आज की दुनिया फिर कहती कि परमात्मा सर्वव्यापी है अथवा अहम् शिवोहम् । तो फिर बेअन्त की बात ही नहीं रहती। जरुर कुछ भूल है । तब तो ऐसी ऊंच बुद्धि वालों ने भी बेअन्त कहा है। यह नालेज मिल ही उनसे सकती है जिसके पास सबका नालेज है। जब मनुष्य की पूरी दुर्गति होती है तब परमात्मा आकर ज्ञान देते है जो खुद सदा समर्थ हैं।