Murli de Mamma - gyan-sitar-24
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५६ ६.९.५९
हमारा साथी स्वयं भगवान है, इसलिए तूफानों से डरना नहीं
ओम् शान्ति । वास्तव में सर्वशास्त्र शिरोमणी गीता ही गाई हुई है। परन्तु भारतवासियों को मालूम न होने के कारण किसने गाई है, उसका कदर कम कर दिया है। भल भगवानुवाच है लेकिन भगवान ने डायरेक्ट गाई है। ऐसे समझते तो सारी दुनिया मानती। सारी दुनिया कृष्ण को तो नहीं मानेगी। लेकिन भारतवासियों को ही पता नहीं तो और कैसे जानें ? भारत में ही कोर्ट में गीता उठाए कसम लेते हैं। जैसे मुसलमानों का कुरान है, क्रिश्चियन का बाईबल है, वैसे भारत की गीता है।
परमात्मा कहते हैं - "जो गीता कल्प पहले गाई थी वही अब फिर से उच्चारण कर रहा हूँ।” क्राइस्ट ने ऐसे नहीं कहा कि मेरा कल्प पहले वाला बाईबल है। क्योंकि वह जब आए तो उन्हों का धर्म तथा शास्त्र तो था नहीं। लेकिन परमात्मा आते हैं तो दिखाते हैं कि देखो, मैं तुमको सो देवता बनाता हूँ, जिन्हों के चित्र सामने हैं। भल देवताओं की बायोग्राफी, चित्रों को बहुत नीचे-ऊपर किया है लेकिन यादगार तो कायम है। अब प्रैक्टिकल नहीं है लेकिन यादगार हैं। तो अपने धर्म का ही सारे चक्र में पार्ट है। गीता तो हाजिर है लेकिन वह होते भी कहते हैं - "मेरा ज्ञान प्रायः लोप है। इन शास्त्रों से मैं नहीं मिलता।” क्योंकि परमात्मा आते ही हैं अन्त में। कहते हैं- "मेरा ज्ञान उस गीता में भी नहीं है। तो जब ज्ञान रहा ही नहीं तो मेरी प्राप्ति कैसे होगी ? जब तक मैं न आऊं मेरे यादगारों से तो नहीं बनेंगे।" यहाँ तो प्रैक्टिकल चाहिए। कहते हैं – जब जड़जड़ीभूत वृक्ष हो जाता है तब मैं आता हूँ।
कोई साधू-सन्यासी तो कह नहीं सकते -- मैंने कल्प पहले देवता बनाया था। मन्मनाभव-मामेकम्, मुझ एक में ही बुद्धि लगाओ । अक्षर ही परमात्मा के डायरेक्ट हैं। कोई महात्मा गीता सुनायेगा तो भी कहेगा - परमात्मा से योग लगाओ। ऐसे नहीं कहेगा मेरे में लगाओ। तो जरुर परमात्मा ने खुद डायरेक्ट कहा है। तब कहा है- मुझ एक में बुद्धि लगाओ। यह भी खुद परमात्मा ने समझाया है। तब समझते हैं कि वह डायरेक्ट आकर कह रहे हैं।
शास्त्रों में तो कितनी कहानियाँ लिखी हैं – लश्कर थे, बाणों से लड़ाई हुई। लेकिन हम तो पक्के अहिंसक हैं। न अस्त्र-शस्त्र की लड़ाई है, न काम कटारी चलाते हैं। असुल तो पवित्र प्रवृत्ति मार्ग था जिसको गृहस्थ आश्रम माना पवित्र स्थान कहते हैं। वह तो मैं स्थापन करता हूँ। मुक्ति भी मैं आकर देता हूँ। अब विनाश तो सामने है और स्थापना भी हो रही है। पुरानी दुनिया के मरने की चीजें निकली हैं, तो नई दुनिया के जन्मने की भी चीजें निकली हैं।
कहते हैं – मैं अपने बच्चों के आगे प्रत्यक्ष होता हूँ। तो वही पहचानते हैं। बाकी अन्त में दुनिया को पता पड़ेगा। लेकिन जो कार्य कराना था, कमाई करानी थी वह काम तो पूरा हो चुकेगा। फिर तो 'अहो प्रभु !' ही कहेंगे। हम प्रैक्टिकल गीता सुन रहे हैं और वह शास्त्र सुना रहे हैं। इतना कान्ट्रास्ट है। इस बात को अच्छी रीति धारण कर दुनिया की स्टेज पर रखना है। इसमें सब सामना करेंगे। लेकिन हम जानते हैं हमको पढ़ाने वाला कौन है ! ऐसे निश्चयवान स्टेज पर आयेंगे। कई फिर संशय में आकर टूटते भी रहेंगे। यह तो कल्प पहले माफिक होता रहेगा, इससे डरना नहीं है। जिसका साथी परमात्मा है, उसको डर क्या ? जैसे दिखाते हैं पाण्डवों ने भगवान का साथ लिया। तो हमने ईश्वर का साथ लिया है। अन्त में विजय तो है ही। बीच में बहुत तूफान आयेंगे लेकिन रिजल्ट का पता है तो डरेंगे नहीं।
परमात्मा कहते – जब मैं आता हूँ तो बहुत भगवान बन बैठते हैं। अब सिद्ध कैसे हो ? तो अन्त में निर्णय हो जाता है। भगवान का कार्य क्या है वह तो वही जानते। परमात्मा की समर्थी - पुरानी दुनिया का विनाश, नई दुनिया की स्थापना। वह भी टाईम पर हिसाब से कराता है। दुनिया वालों ने तो शास्त्रों में यही पढ़ा है कि भगवान मरे हुए को जिन्दा करता, धरती से पानी निकाल देता …। अब यह तो काम उनका है नहीं। हाँ, हम सागर के बच्चे जो मरे पड़े थे उन्हों को जिंदा करते हैं ज्ञान अमृत से। मनुष्य फिर उल्टा अर्थ निकाल समझ बैठे हैं। भगवान की ऐसी समर्थी है। हम तो जब आकारी देवताओं ब्रहमा, विष्णु को ही भगवान नहीं कहते तो मनुष्य तो हो नहीं सकता। वह तो परमात्मा एक है जो बैठ अपनी नालेज देते हैं।
अपने में जो अनेक जन्मों के संस्कार पड़े हैं उन्हों को निकाल इसको धारण करने में मेहनत लगती है। बुद्धि से जज करना है – यह राईट है। तो औरों को देना है। बाबा यही मदद माँगते हैं। बाकी डरने की बात नहीं है जब खेवनहार साथ है। राम, कृष्ण कोई खेवनहार नहीं। उन्हों को भी परमात्मा ने पार किया है, असार संसार से पार कर सार वाली दुनिया में ले गये हैं। दुनिया इसको नहीं जानती। तब मैं आकर बताता हूँ और ले चलता हूँ। ऐसी हैं भगवान की बातें। कहते हैं- सिर्फ यह अन्तिम जन्म पुरुषार्थ कर पवित्रता को धारण करो। फिर तो जन्म-जन्मान्तर बिगर पुरुषार्थ पवित्र रहते आयेंगे। जहाँ मूल एम ऑब्जेक्ट ही पवित्रता की हैं, वहाँ अपवित्रता की बात कैसे हो सकती।