Murli de Mamma - gyan-sitar-27
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12.9.59
अशरीरी अवस्था ही सर्वोत्तम अवस्था है
आत्मा पहले अशरीरी है जिसको निराकार कहते हैं। शरीर को पीछे धारण करती है। यह है अपना लक्ष्य। लेकिन कहने में यह भी कामन है। प्रैक्टिकल अशरीरी होकर रहने का अभ्यास कोई को भी नहीं है। जैसे बाबा अशरीरी है वैसे हम भी बाबा के साथ वहाँ बैठे हैं। तो उठते-बैठते यह अवस्था रखनी है। जैसे बाबा आते हैं, बोलते हैं अथवा कर्मेन्द्रियों का आधार लेते हैं, फिर अशरीरी हो जाते हैं – वैसे हम आत्माओं को भी अभ्यास करना है। यह है सर्वोत्तम अवस्था। कछुए मिसल शरीर में आकर काम करके फिर अशरीरी होना है। ऐसे भी काम होते हैं जो शरीर में आने की दरकार नहीं रहती है। जितना हम बाबा की याद में बाबा के साथ रहेंगे उतनी बाबा की ताकत मिलती रहेगी। तो यही अवस्था धारण करने का पुरुषार्थ करना है। जैसे बाबा अभी-अभी शरीर में, अभी-अभी अशरीरी – वैसे हम भी क्वीक उड़ना सीखेंगे तो पंख निकल आयेंगे। यह नयों के लिए बात नहीं है। उनके लिए जैसे फ्रेंच भाषा है । पुरानों के लिए यह धारणा है ।
याद के भी तरीके हैं ना। अपनी अवस्था को ऐसा हल्का बनाना है। यही बहुत सरल मीठी अवस्था है । ड्यूटी में रहते अथवा घर में रहते जो अनेक बातें विस्मृति कराती हैं, जिससे छोटे-छोटे विकर्म बनते हैं, उससे सेफ्टी के लिए ही यह अभ्यास कवच है । फिर माया की गोली नहीं लगेगी। जैसे बाबा समझते यह शरीर लोन पर लिया है, वैसे हमने भी सर्विस अर्थ यह शरीर लिया है तो जितना उस अवस्था में रहेंगे उतना ५ भूतों से सेफ रहेंगे । यह है अति सूक्ष्म। बाहर से तो कोई तपस्या या ध्यान में नहीं जाते। वह ध्यान की डिपार्टमेंट अलग है । उसको हम अशरीरी अवस्था नहीं कहेंगे। यह प्वाइंट बड़ी सूक्ष्म है। इसका अभ्यास करना है । अपनी सेफ्टी का स्थान ही है कि बाप के पास चुप कर अशरीरी हो बैठ जाना । जैसे बच्चे जब किसी बात से डरते हैं तो माँ-बाप की गोद में चुप कर बैठ जाते हैं । हमें तो सारी नॉलेज है, सब एक्टर्स हैं। कोई उल्टी रीति चलता है यह भी उनका पार्ट है- उसमें हर्ष वा शोक नहीं आता । इसकी धारणा बहुत अच्छी चाहिए। जितना जरुरी है उतना समय ध्यान देकर के फिर अपनी स्मृति में रहो । ऐसे अभ्यास करते बाबा के पास बैठ जायेंगे। फिर तो २१ जन्म - २५०० वर्ष सेफ हो जाते हैं । कर्म भी श्रेष्ठ रहते हैं। पांच भूत तो रहते नहीं। तो जितना वहाँ रहेंगे तो देही के शुद्ध स्वभाव-संस्कार जागेंगे । यह है अपने को ऊपर उठाने के लिए। इस पृथ्वी से ऊंचा जा रहे हैं । कहते हैं ना – देवताओं के पैर पृथ्वी पर नहीं रहते हैं। यानी विकारी पृथ्वी पर नहीं आते । बाकी पृथ्वी तो वहाँ भी है। तो अब हमको यहाँ से पांव उठाना है, लौटना है ।
गुरु का काम है वापस ले जाना। प्योरीफाइ कर लौटाते हैं अर्थात् दुर्गति से सद्गति में ले जाते हैं । यह है पुरुषार्थ कर अपने को उड़ाना। जैसे छोटे पंछी को उड़ना सिखाते हैं, ऐसे बाबा हमको भी उड़ना सिखाते हैं । न साकारी दुनिया, न आकारी लेकिन निराकारी दुनिया में अशरीरी होकर रहना है। है सारी बुद्धि की सफाई । कहा ही जाता है बुद्धियोग। हाथ-पांव के योग-आसन तो बहुत सिखाते हैं । लेकिन यह है बुद्धि की सफाई जिससे आत्मा साफ हो जाती है। यह है अभी का पुरुषार्थ, फिर कोई पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता है। दैवी संबंध अभी बनाते हैं २१ जन्म - २५०० वर्ष के लिए। तो सारे अनेक जन्मों के शुद्ध पोतामेल को अभी बनाना है और सारे अनेक जन्मों के अशुद्ध खाते को खत्म करना है।
लोग समझते हैं कोई को दुःख न देना, झूठ न बोलना, गुस्सा न करना - यही पुरुषार्थ करना है। लेकिन हम कहते - बॉडी-कानसेस में आना ही एक दो को दुःख देना है। इसलिए अशरीरी होकर रहना है। बाहर से तो कुछ करना नहीं है। देखो, देवतायें कितने फैशनेबल हैं, जड़ चित्रों को कितना सजाते हैं ! तो जब वह होंगे उन्हों के महल कितने सजे-सजाये होंगे ! विष्णु कितना सजा सजाया है ! यहाँ तो अन-नेचुरल सजावट है। वहाँ लिपिस्टिक, पाउडर लगाने की दरकार नहीं रहती । वहाँ कोई अप्राप्त वस्तु नहीं रहती है। दूध की नदियां बहती हैं। ऐसे नहीं, नदियों में कोई दूध बहता है, लेकिन अथाह रहता है। कोई कमी नहीं। पूर्ण सम्पत्ति है। ऐसे तो नहीं यह कोई कल्पना है। यह नालेज तो कोई मनुष्य दे भी नहीं सकते। परमात्मा ही समझाते हैं। तो ऐसा पुरुषार्थ करना है जिससे सब प्राप्ति हो जायें। तब कहा है सभी यज्ञों में सर्वोत्तम, क्योंकि इसमें सब यज्ञ स्वाहा हो जाते हैं। सब बातों में अपने को सर्वोत्तम रखा है। तब कहते हैं -- जहाँ जीत, वहाँ मैं। हार तो माया कराती है। ऐसे तो नहीं कहते जहाँ हार वहाँ मैं। यह है श्रेष्ठ यज्ञ परमात्मा का। हम देख रहे हैं कि विनाश के आसार आते जाते हैं। हम भी उन्नति को पाते जाते हैं।
अशरीरी भी तब कहते हैं जब शरीर में हैं। अशरीरीपन की अवस्था को भूल गये हैं, इसलिए पक्का कराते हैं। वह भी कैसा सरल मीठा तरीका है ! परमात्मा बाप के साथ बैठ जाओ, बस। बाकी भगवान को सर्वव्यापी होने की दरकार नहीं। अगर उनके हाजिर होते दुःखी होवें तो परमात्मा की बदनामी हो जाती है। 'बाबा' कहने से ही कितना लव आ जाता है ! उनसे सब कुछ लेना है। तो अपना योग कितना सरल सहज है ! नष्टोमोहा होना कठिन नहीं है। मुश्किल है अनेक जन्मों के विकर्मों को योगबल से भस्म करना। इसमें ही टाइम लगता है। बाकी नष्टोमोहा तो झट से हो सकते हैं। उसका पहला एक्जैम्पल ब्रह्मा का सामने खड़ा है, जिसमें बाप ने प्रवेश किया। उसको देरी नहीं लगी और मातायें भी कैसे आ गई ! मस्ती आ गई- हमको मिलना है । उस समय इतना ज्ञान भी नहीं था। मस्ती थी - बस, अब बैकुण्ठ जाना है । इस दुनिया में क्या सुख है ? जैसे सूखा काना (गन्ना) चूसना है । बाबा कहते – “इसमें क्या रस है ? खाओ तो माल खाओ" । बाप तो ऐसा बनाते हैं, तब तो उनको याद करते हैं । कैसा भी नास्तिक हो, यह जरुर कहेंगे -- कोई पॉवर है, कोई नेचर है । लेकिन वह क्या है, उसमें कितनी शक्ति है - वह हम जानते हैं । वह तो कह देते हैं- हे राम जी, जगत बना नहीं है। फिर तो राम जी भी बना नहीं है । लेकिन हम जानते हैं-- कैसे बाबा पुराने जगत से एकदम नया बनाते हैं ।
तो उस बाप से कितना लव होना चाहिए ! जो प्रेम टुकड़ा-टुकड़ा हो सब तरफ चला गया था वह अब एक से जुटाते हैं । सब कुछ वही है। इससे यहाँ हमारी कमाई हो रही है। वह कमाई तो अल्पकाल झणभंगुर की है । इसमें सच्ची कमाई करना चाहो तो उस अवस्था में रहो। बाबा का होकर रहना है । परमात्मा को समर्थ तो सब गाते हैं। अब वह हमारा बाबा प्रैक्टिकल बने हैं । फाउन्डेशन में ताकत है पूरे झाड़ को धारण करने की । परमात्मा इतना सर्वशक्तिवान होते भी इतना साधारण पार्ट बजाते हैं। इसको कहते हैं इन्कागनिटो पार्ट । यह भी कल्याणकारी है । नहीं तो, भीड़ हो जाए, उसको कहाँ सम्भालेंगे ? अभी ही नहीं पहुँच सकते । कितने निमन्त्रण देते हैं! हैन्ड्स नहीं हैं। तैयार हो तो कर्मबन्धन भी छूटे। तुम कहो– कर्मबन्धन से छुड़ाओ तो हम लायक बनें, लेकिन बाबा कहते - इन सरकमस्टांस में ही बनकर दिखाओ तब कहेंगे लायक है । बाबा आते हैं सद्गति के लिए। लेकिन उसके लिए पहले गति करेंगे ना । गति कहा जाता है प्योर कर ले जाना। ले जायेगा तब तो नई दुनिया में आयेंगे ।