Murli de Mamma - gyan-sitar-28
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17.9.59
आत्मा अपना ही मित्र, अपना ही शत्रु है, जो करेगा वह पायेगा
गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी…।
ओम् शान्ति। नॉलेज को दर्पण कहा जाता है। यह परमात्मा की अविनाशी नॉलेज दर्पण है ! इससे सारा पता लगता है कि मनुष्य आत्मा की कहानी अथवा कर्म - कहानी क्या है ? अब ज्ञान के दर्पण में क्या देखेंगे ? अन्दर तो बहुत काली, मैली आत्मा बैठी है। वह समझते परमात्मा बैठा है। लेकिन परमात्मा तो अन्दर नहीं बैठा है। परमात्मा को आना पड़ता है। इसलिए अवतरण गाया हुआ है। कहते हैं- जब-जब धर्म ग्लानि होती है, तब-तब मैं आता हूँ। बैठा हो तो यह कह नहीं सकते । जब आते हैं तो आकर रोशनी देते हैं कि तुम कितने स्वच्छ थे, अब कितने काले बने हो ! कहानी भी इसकी है। इसमें आदि-मध्य-अन्त आ जाता है। यह एक जीवन की बात नहीं है लेकिन जब से इस स्टेज पर पार्ट शुरु हुआ है तब से अब तक की कहानी चली आई है। बीच में वापस तो गए नहीं हैं। तो समझाते हैं कि शुरु से आत्मा कैसे पार्ट बजाती आई है। यह है अब हमारे सामने दर्पण अथवा नॉलेज। इस दर्पण में निराकारी दुनिया से लेकर आकार-साकार सृष्टि की सारी समझानी है। मनुष्य भल वेद - शास्त्र अध्ययन करते हैं लेकिन दर्पण तो मिलता नहीं जिससे देखें कि आत्मा कहाँ से मैली हुई है तो साफ़ करें। यदि उससे आत्मा साफ होती तो दुनिया की यह रिजल्ट नहीं होती ।
दुनिया वाले तो कहते हैं कि कलियुग अभी बच्चा है। और बड़ा होगा तो क्या हाल होगा ? दर्पण होता तो क्यों मैली होने देते, साफ कर देते। तो अपने को दर्पण मिला है। इसलिए जानते हैं कि परमात्मा का अब आना ज़रुरी है। आते हैं तो ज़रुर उनका निवास स्थान कोई है। वह दूर देश निवासी है। उनका कर्त्तव्य भी है लेकिन ऐसे नहीं, यह विनाश-स्थापना का कार्य सदैव चलता रहता है। यह जन्म-मरण तो अपने कर्मों से होता है। इससे तो दुःखी हो रहे हैं। अगर परमात्मा का यह कर्त्तव्य है तो परमात्मा दुःख देने वाला ठहरा। लेकिन परमात्मा की महिमा है सुखदाता । दुःख देने वाले को थोड़े ही याद किया जाता है। तो ज़रुर विनाश, स्थापना का कोई और तरीका है। तो परमात्मा समझाते हैं -- "जिससे दुःखी हुए हो उनका विनाश करने आता हूँ। पापों का विनाश करने वाला और पापात्माओं का उद्धार करने वाला हूँ।” अब तो पापात्माओं की खूब वृद्धि हो रही है। अब बाप उन्हों का उद्धार कर दैवी सृष्टि की स्थापना करते हैं। फिर उनकी पालना के लिए हमारी भी प्रालब्ध बनाते हैं। फिर तो यह कार्य करने की दरकार नहीं है।
परमात्मा का आना भी एक टाईम पर होना चाहिए। जब झाड़ बिल्कुल पुराना हो जाता है तब बाप कलम लगाते हैं। तो उसका भी टाईम है ना। जब वृद्धि हो रही है तब तो कलम नहीं लगायेंगे। तो परमात्मा के कर्त्तव्य का भी टाईम है। अब आवे तो वह भी एक जगह आएगा। कहाँ आकर स्थापना करे - वह भी हिसाब-किताब समझाते हैं। भारत ही है जो सतोप्रधान था, दूसरे धर्म पीछे वृद्धि हुए हैं। शुरु से यह भारत था जहाँ दैवी धर्म और राज्य था। अब वह नहीं है। इसलिए परमात्मा को उसी की स्थापना के लिए आना पड़ता है। आने का टाईम भी एक ही बार है। अच्छा, आवे तो किसमें आवे ? मनुष्य तन का आधार लेना पड़े। मनुष्य आत्माओं से पुरुषार्थ कराए प्रालब्ध बनानी पड़े।
मनुष्य आत्माएं गिरी कहाँ से हैं? कर्मों से गिरी हैं। तो कर्मों को सुधारने, समझाने लिए मनुष्य-तन का आधार लेना पड़े। आना भी उस मनुष्य-तन में पड़े जिसकी प्रालब्ध शुरु से पहला नम्बर हो, जिसको एडम कहो, आदम कहो। यह तो उनको बनायेगा ना जो पहले देवता हैं, जो फिर पहले ही मैले बने हैं, उसमें ही आकर बताता हूँ। तो परमात्मा के आने के भी सरकमस्टाँस हैं। हिसाब-किताब से आएगा ना। खुद तो हुआ अकर्ता, अभोक्ता। वह आत्माओं से करायेगा ना – जो शुरु वाली आत्मायें हैं, जिन्हों का ८४वाँ जन्म हो। सबके तो ८४ जन्म नहीं हैं। पीछे वालों के कम जन्म हैं। उन्हों में तो नहीं आ सकता। नया कलम तो शुरु से लगेगा ना।
तो परमात्मा बैठ सारे प्लैन को समझाते हैं। ऐसे कार्य करना पड़ता है। नहीं तो कैसे करें ? कोई राय देवे। कराना तो मनुष्यों से है। ऐसे तो नहीं खुद ही करता है । फिर तो भोगना भी उसको पड़े । लेकिन कहते हैं -- "आत्मा अपना ही मित्र है, अपना ही शत्रु है । जो करेगा वह पाएगा।" तो परमात्मा तो नहीं करता है ना । आत्माओं से ही कराते हैं । और कोई तरीका नहीं । सब कायदे से करना है । विकर्मों की सजाएं भी भोगनी पड़ती हैं । पुरुषार्थियों को प्रालब्ध देनी पड़ती है । इसलिए कैसे अपना कार्य करते हैं-- वह समझाते हैं । आकारी देवताओं से भी मदद लेते हैं । रचना द्वारा ही नई रचना रचनी पड़ती है । मैं तो न्यारा हूँ । मुझे इन बातों में जाना नहीं है । कराना है स्वच्छ आत्माओं से और सृष्टि फिर एकदम पापात्मा है । तो कितनी डिफीकल्टी है ! तो ऐसी युक्ति से करना पड़ता है । नहीं तो कैसे करें जो सभी कायदे में कायम रहें ? कहते – मेरे कर्त्तव्य को भी वह जान सकते जो मेरे साथ इस कार्य में मददगार हैं । बाकी तो सबको वापस मुक्तिधाम में जाना है । उन्हों का भी अपने-अपने समय पर गोल्डन एज है । यह बातें समझने, समझाने की बुद्धि चाहिए । बाकी यदि भगवान ही करनकरावनहार है तो फिर हम पुरुषार्थ का क्यों सोचें ? लेकिन कर्मों की रिस्पॉन्सिबिलिटी हमारे ऊपर ही है । अच्छे-बुरे कर्मों का फल भी हमको मिलना है । बाप आकर अच्छे कर्मों का ज्ञान देते हैं । बाबा से जैसे यह वर्सा लेते हैं । लेकिन जब उनसे योग लगायें ।
हम कहते हैं - बाबा है, दादा है, वर्सा देते हैं । उनसे सम्बन्ध जोड़ेंगे तब तो मिलेगा ना । हम भी निराकार आत्मायें, वह भी निराकार परम आत्मा । परम है क्योंकि अजन्मा है । यह जो मूँझते हैं कि परमात्मा एक तन में हद में कैसे आते, वह तो बेहद में रहने वाला सर्वव्यापी, सर्व तन में विराजमान है ? लेकिन इसको भी समझना है । उनका कैसा प्लैन है ? जैसे गवर्मेन्ट के भी प्लैन बनते हैं, परमात्मा का भी प्लैन है । तब तो कहते हैं सद्गति करने की मत तुम जानो । तो जो जानते हैं वही बताते हैं । सच्चा मित्र तो वह ठहरा ना जो हमारे विकर्मो को मिटाए सर्वदा सुखी बनाते हैं । तो क्यों न उनसे सम्बन्ध जोड़ें और सब दुःख के सम्बन्ध तोड़ें । कहते हैं - तुम्हारा सम्बन्ध फिर भी आत्माओं के साथ जुड़ेगा लेकिन वह है सुख का सम्बन्ध । यह है दुःख का सम्बन्ध, इसे तोड़ो । भगवानुवाच - यह काम महाशत्रु है । मनुष्य समझते हैं – पति-पत्नी का संबंध है ही विकार के लिए। लेकिन ऐसी विकारी प्रवृत्ति परमात्मा ने नहीं रची। बुद्धि नहीं मानती कि ऐसी गन्दगी से उत्पत्ति परमात्मा ने बनाई हो। इसलिए सन्यासी ब्रह्मचर्य में रहते हैं। ज़रुर अच्छा है ना। अगर शास्त्रों अनुसार यह विकार करना हक है तो फिर शास्त्र सुनाने वाले सन्यासी क्यों ब्रह्मचर्य में रहते हैं? यह विचार नहीं आता क्योंकि मन-बुद्धि सहित आत्मा भ्रष्ट हो गयी है। अब बाबा समझाते हैं – मेरी रचना में यह बात अंश मात्र नहीं थी। इसलिए ऐसे कभी नहीं समझना है कि यह अनादि चीज़ है, शुरु से चली आती है। नहीं। बाप ने सृष्टि की वृद्धि का तरीका भी बड़ा रॉयल रखा है। आधा कल्प पतित होने से बचा देते हैं। इन बातों पर बुद्धि काम नहीं करती है तो मूँझते हैं। इतनी बुद्धि नहीं है तब तो बुद्धिवानों की बुद्धि बाप कहते हैं – अब चलो गन्दी छी-छी दुनिया से नई दुनिया में।