Murli de Mamma - gyan-sitar-31

११.९.६२

सृष्टि की कहानी – दो युग हैं पवित्र प्रवृत्ति के और दो युग हैं अपवित्र प्रवृत्ति के

ओमशान्ति । इस मनुष्य सृष्टि को ही कहने में आता है कि यह वैरायटी मनुष्य सृष्टि है। अनेक धर्म हैं। लेकिन इनके होते भी इस सृष्टि की कहानी एक ही कहेंगे जो है ही प्रवृत्ति मार्ग की। पहले पवित्र प्रवृत्ति मार्ग कहा जाता, फिर अपवित्र प्रवृत्ति होती है । जब पहले-पहले सृष्टि की रचना रची तो पवित्र प्रवृत्ति की रचना रची थी। वही पवित्र प्रवृत्ति वाले वाम - मार्ग में आये तो फिर माया का विकारी राज्य शुरु हुआ। वही पवित्र प्रवृत्ति वाले अपवित्र प्रवृत्ति में आ गये । फिर परमात्मा आकर पतित से पावन बनाते हैं। सबको लिबरेट करने वाला वह है। माया के बंधन से छुड़ाते हैं। फिर पावन प्रवृत्ति शुरु होती है। प्रवृत्ति अनादि है। पहले-पहले आधा कल्प पवित्र प्रवृत्ति थी, अपवित्रता की बात नहीं थी ।

तो परमात्मा आकर जब माया के बंधन से छुड़ावे तब तो पवित्र दुनिया स्थापन हो । सबको माया के बंधन से छुड़ाए पवित्र दुनिया स्थापन करते हैं। तो जो पवित्र प्रवृत्ति वाले थे उनको ही फिर चारों वर्णों में आना है। देवताओं के ही यह वर्ण कहे जायेंगे। कहते हैं- मैं आता हूँ अपने बच्चों का उद्धार करने । सारी दुनिया को माया के बंधन से छुड़ाते हैं। तो इस सारे खेल की एक ही कहानी है। आदि से लेकर अन्त तक चारों वर्णों में किसका क्या पार्ट चला – सो अब जानते हैं। पवित्रता के भी पूरे दो युग हैं और फिर अपवित्रता के भी दो युग हैं। उसमें भी फिर स्टेजेस हैं - सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो । फिर अन्त में बाप को आकर नई दुनिया बनानी पड़ती है। जब माया का राज्य आता है तो फिर देवताओं की प्रालब्ध पूरी हो जाती है। वह जब वाम-मार्ग में आये तब फिर दूसरे धर्म वालों का आना आरम्भ हुआ। उन्होंने तो देखी ही विकारी दुनिया है। बैकुण्ठ में पवित्र प्रवृत्ति की प्रालब्ध तो जिन्होंने पाई उन्होंने ही देखी, उन्होंने ही भोगी। पवित्र प्रवृत्ति वालों ने अपनी प्रालब्ध भोग पूरी की तो फिर वाम-मार्ग शुरु हुआ । तो अब जानते हैं-- हम ही पवित्र देवता थे, फिर सतो, रजो, तमो में आये । अब फिर पवित्र प्रवृत्ति को धारण कर रहे हैं । सन्यासियों का निवृति मार्ग पीछे होता है । इन चीजों को जान वही सकते हैं जिन्होंने प्रालब्ध पाई । बाप समझाते हैं- अब मैं फिर आया हूँ तुमको वही प्राप्ति कराने । तो यह खेल भी एक ही कहानी में है । जो पावन थे वही पतित बने । पावन बनाने वाला अलग है । जो पावन बने उन्हों की हिस्ट्री अलग है, बनाने वाले की हिस्ट्री अलग है ।