Murli de Mamma - gyan-sitar-39

२८.९.६२

ज्ञान की रोशनी मिली है तो दिन-रात अवस्था का मीटर चढ़ता रहे

कहा जाता है - हथ कार डे, दिल यार डे। परमात्मा को यार भी कहते हैं, यार अथवा खुदा-दोस्त । इस पर एक कहानी है कि खुदा-दोस्त पुल पर बैठा था। जो उनके पास पहले आएगा उनको बादशाही देगा। पुल होती है एक तरफ़ से दूसरे तरफ़ क्रॉस करने की। तो हम भी संगम पर खड़े हैं। पुरानी दुनिया से पार हो नयी दुनिया में जाएंगे। अब चक्र लगाए पूरा किया है। अब हम सबका, बल्कि सारी दुनिया का यह अन्तिम जन्म है। हमें यहाँ से कनेक्शन करना है नई दुनिया में। अब नई दुनिया का कलम लगता है। जहाँ कलम लगता है वहाँ फिर प्रलय की बात नहीं। यह मनुष्य सृष्टि-वृक्ष का कलम लगने वाला है जिसका फाउन्डेशन परमात्मा आकर लगाते हैं। बड़े-बड़े मनुष्यों से कोई जगह आदि का फाउन्डेशन डलवाते हैं। लेकिन परमात्मा तो आकर नई दुनिया का फाउन्डेशन लगाते हैं और हम प्रैक्टिकल में उस पार्ट में चल रहे हैं।

हम जानते हैं कि अर्जुन के रथ में भगवान सवारी कर आया है इस युद्ध के मैदान पर और युद्ध करने का तरीका सिखला रहे हैं। धर्म स्थापन करने की बात में पवित्र बनने और विकारों को काटने की बात है। कितने मनुष्य तो स्वर्ग के सुख को भी कम समझते हैं। समझते हैं - "वह सुख भोग कर भी तो नीचे उतरना है। इसलिए ऐसा पुरुषार्थ करें ही क्यों ?" लेकिन हमारी तो चढ़ती कला है। अब तो सुख के दिन देखने हैं। जब नया मकान बनाया जाता है तो पुराना होने के लिए थोड़ेही सोचा जाता है। खुशी तो होती है ना कि हम नया मकान बनायेंगे, उसमें बच्चे होंगे, फिर पोत्रे होंगे, आदि-आदि ! लेकिन ऐसा थोड़े ही सोचते हैं कि यह मकान तो फिर खत्म होना है। फिर यह सब ख्याल क्यों करें ? इस अल्पकाल के सुख को समझते भी हैं कि जो चीज़ आज है वह कल नहीं रहेगी। लेकिन फिर भी उनके लिए सोच नहीं करते हैं। यह बात और ही लम्बी है। यह तो जन्म-जन्मान्तर की प्राप्ति है। इसमें तो गैरन्टी है और स्वयं देने वाला भी ऐसा है जो कभी धोखा भी नहीं देगा। इस सुख की टेस्ट ही निराली है।

कई फिर कहते हैं – “आत्मा को उस परमात्मा में लीन होना है। बस, आनन्द उसमें है।” लेकिन हम तो जानते हैं कि आत्मा कब परमात्मा में लीन हो नहीं सकती। लीन हो जाने का भी अगर किसने अनुभव पाया हो तो वह चिह्न मिलना चाहिए। वह वहाँ से आकर बतावे कि ऐसा हमने सुख पाया है। लेकिन लीन ही हो गया तो फिर बतावे कौन ? देवताओं के तो चिह्न मिलते हैं। उन्हों के यादगार हैं, हिस्ट्री है। सबको दुःख के बंधन से छुड़ाना, प्योरीफाइड धाम में ले जाना - यह परमात्मा का काम है। बुद्ध, क्राईस्ट आदि सबकी आत्मायें इस समय बंधन में हैं। सबका मुक्ति-जीवन्मुक्ति दाता वह है।

अब हम सबकी मत एक है। हुसैन एक है। उसमें ही बुद्धि जाती है। वहाँ तो सत्संग में जाओ तो किसकी बुद्धि किसमें, तो किसकी बुद्धि किसमें होगी। खुद गुरु भी छुट्टी देंगे कि किसको भी याद करो। लेकिन हम तो 'जो है, जैसा है,' - उसी तरफ़ बुद्धि को स्थित रखते हैं। हमारे इस संगठन में बहुत ताकत है। भल दुनिया में बहुतों की महिमा होती है लेकिन उनकी महिमा विकारी मनुष्य ही करते हैं। और हम जब बैकुण्ठ में हैं तो स्वयं महिमा सम्पन्न हैं ही। साधू-सन्यासियों की विकारी मनुष्य महिमा करते हैं। फिर वह जिन्हों से महिमा पाते हैं उनके पास ही जन्म लेते हैं। आप तो कोई विकारियों से महिमा नहीं पाते, न विकारियों से सम्बन्ध ही रखते। हमारी बात ही अलग है। हम तो विकारी को निर्विकारी बनाए ले चल रहे हैं। तो हमको कितना फखुर होना चाहिए ! इसमें अशुद्ध नशा या अहंकार की बात नहीं। अशुद्ध नशा भी क्यों हो ? अशुद्ध वालों से जब महिमा मिलती है तो अशुद्ध अहंकार बैठ जाता है। लेकिन हमारी तो किसी से भेंट ही नहीं है। वहाँ तो है ही शुद्ध प्रजा और सम्बन्ध ही बाप-बेटे का रहता है। तो बाप-बेटे में थोड़ेही अहंकार रहेगा। घर में भी बाप-बच्चे होते हैं, सब बाप तो नहीं होते। वहाँ भी राजा-प्रजा होते हैं। परन्तु प्रजा को भी सब प्राप्ति रहती है। तो हमको प्रालब्ध वहाँ लेना है।

इस ज्ञान को भी जैसा है वैसा ही समझना है। बाप ने हर एक चीज की रोशनी दी है। तो इसमें रात-दिन अवस्था का मीटर चढ़ा रहना चाहिए। हम कौन हैं, किसकी सन्तान हैं ! वो नशा रहना चाहिए। कहते हैं ना – खुशी जैसी खुराक नहीं। हमें अब मौत का भी डर नहीं। सदैव हर्षित रहना है। हर्षित-चित होंगे तो हर्षित-मुख भी रहेंगे। अभी हम हैं बेफिक्र बादशाह। सच्ची खुशी तो अब है। वहाँ तो प्रालब्ध में होंगे। अच्छा।