Murli de Mamma - gyan-sitar-48

२०.७.६३

कल्याणकारी बाप की मत भी कल्याणकारी है, उसमें अकल्याण हो नहीं सकता

ओम् शान्ति । हम जो सुनते अथवा सुनाते हैं - यह कोई अपनी मनुष्य-मत वा शास्त्र-मत नहीं है। शास्त्र-मत भी मनुष्य-मत ही है। परमात्मा के डायरेक्ट वर्शन्स का तो कोई शास्त्र रहा ही नहीं है। शास्त्र हैं ही मनुष्यों के। भल भगवान ने जो वर्शन्स उच्चारे उसका नाम गीता रखा है। परन्तु वह भी गीता मनुष्यों की हो गई । परमात्मा तो अभी खुद ओरीजनल वर्शन्स सुनाकर वह कर्तव्य करके स्वर्ग बना रहे हैं। परमात्मा ने कोई शास्त्र नहीं बनाये हैं। शास्त्र कोई परम्परा से नहीं चले हैं। परमात्मा का कोई शास्त्र है ही नहीं। गीता भी परमात्मा की नहीं है। परमात्मा ने तो ज्ञान से स्वर्ग बनाया। वहाँ शास्त्रों की दरकार नहीं रहती है। बाकी हम जो सुनते हैं, यह है परमपिता परमात्मा की श्रीमत । पहले-पहले तो यह निश्चय चाहिए । इसमें तो कोई मनुष्य-मत है ही नहीं। तो फिर वह जो सुनाये, जैसे कराये – उसमें संशय की बात नहीं हो सकती ।

पहले यह निश्चय होना चाहिए कि हम किसके द्वारा सुनते हैं ? पहला फाउन्डेशन यह है। सुनाने वाला वह समर्थ है। उनके सुनाने में कोई संशय हो नहीं सकता । माँ-बाप बच्चों को युक्तियों से भल उठा सकते हैं। बाकी उल्टी-सुल्टी बातें थोड़ेही करेंगे जिससे हमारा अकल्याण हो जाये । बाप तो है ही कल्याणकारी । लौकिक रीति भी अपने कर्मों के हिसाब से कहां अकल्याण हो भी जाए, परन्तु बाप बच्चों का कब अकल्याण नहीं चाहेगा। फिर यह तो है ही कल्याणकारी बाप । हमारी कर्मों की गति को साफ करने वाला है। अपने को यह समझ है – हमको सुनाने वाला वह समर्थ है। इसलिए किसी बात में हम अपनी मत चला नहीं सकते हैं। परन्तु यह तब हो सकता है जब निश्चय हो कि हमें सुनाने वाला कौन है ? बहुतकाल से मनुष्य-मत की बातें बुद्धि में बैठी हुई हैं। इसलिए कई संशय उठाते हैं।

अब हमें जबकि 'बुद्धिवानों की बुद्धि' मिला है तो उसमें हम कोई संशय उठा नहीं सकते हैं।

उसने तो जो सुनाया, जो कर्तव्य किया – फिर उनके कर्तव्य की प्रालब्ध चली। बाद में मनुष्य मत चली है। देवताओं को तो किसके मत की आवश्यकता ही नहीं रही। उस समय को कहा जाता है सतयुग की आदि ।

अब इन बातों की रोशनी परमात्मा ने दी है। मनुष्य तो यह समझ नहीं सकते । इसलिए आपस में टक्कर खाते हैं क्योंकि अनेकानेक धर्म हैं। कोई किस चीज को मानते हैं, कोई नहीं मानते हैं।

है ही खण्डन की हुई दुनिया । अनेकानेक मत हैं। एक बात पर एक मत हो, तो भी समझें कि यह परम्परा चली आई है। अभी तो हैं अनेक मत । अब वह एक बाप ही सभी मनुष्यों की गति को जानते हैं। वही बाप, टीचर, सतगुरु है। गति-सद्गति-दाता भी वही है। वह अपना कार्य कर रहे हैं। यह बात निश्चय में आ जाए फिर कोई हलचल नहीं हो सकती है। परमात्मा ही जानी-जाननहार है।

यथार्थ बातें उनसे ही मिल सकती हैं। जब वह बातें अनुभव में आती हैं तब प्रैक्टिकल जीवन बनती है।

परम्परा से जो सुनते आये उनसे क्या बने ? सिद्धि तो कुछ प्राप्त हुई नहीं । अभी हम यथार्थ बातें सुन रहे हैं जो हमारे जीवन के लिए हैं। जीवन बनाना तो अच्छा है ना। अनुभव में जो चीज आती है वह छिप नहीं सकती है। जब जीवन सुधरती है, तो फिर क्यों न अपनी जीवन बनायें ? परमात्मा श्रेष्ठ मत देकर

सुधार रहे हैं तो उनकी माननी चाहिए ना। अच्छा ।