Murli de Mamma - gyan-sitar-55

२०.१०.६३

अशरीरीपन की ड्रेस पहन इज्जत से घर जाना है, फिर इज्जत से आना है

यह सृष्टि चक्र कुछ नियमों से ही चलने वाला है। जैसे दिन-रात, गर्मी-सर्दी भी सभी अपने समय पर चलती है, वैसे यह सृष्टि ड्रामा भी कायदे से चल रहा है। अब है रात के अन्त और दिन के आरम्भ का संगमयुग। यह है - परिवर्तन का समय। मनुष्य संख्या की वृद्धि भी दिखाती है कि अब अन्त है। लास्ट जन्म है। यानी इस जन्म में नई कलम लगाने का कार्य कर सकते हैं। बाप भी फिर ऐसे समय पर आते हैं। तो समय अनुसार सब काम करना चाहिए। दुनिया बदलती है तो अपने को भी बदलना चाहिए। नये से पुराना आहिस्ते-आहिस्ते होता है, अब फिर नया बनना है। नया खाता चाहिए पवित्रता का, तो पुराना पापों का खाता बदलना है। ये है सब बुद्धिबल से। तो बाप कहते हैं मुझे और शान्तिधाम को याद करो जहाँ तुमको जाना है। जैसे एक्टर एक्ट कर फिर घर के कपड़े पहन वापस जाते हैं। अब हमारे घर की ड्रेस है - अशरीरी। देह का संबंध यहाँ मिला। अब अशरीरी होकर चलना है। फिर जब नई दुनिया में आयेंगे तो इस बल से आयेंगे जिसमें सदा काल का सुख होगा। अब सिर्फ ख्याल रखना है वापस जाने का। तो अब पुराने खाते को योगबल से दग्ध करना है। नहीं तो जाने में दिक्कत पड़ेगी। हम जायेंगे भी इज्जत से, तो आयेंगे भी इज्जत से। तो अब श्रेष्ठ कर्मों का बीज डालना है। सब बातों का अलग-अलग समय है। जैसे खेत में भी बीज डालने का, उसकी सम्भाल करने का, फिर फल प्राप्त करने का सबका समय अलग-अलग है। अभी का यह जन्म दुर्लभ है। अभी ही नई कलम लगानी है। बाकी सजा खाकर इनसल्ट से जायेंगे, तो आयेंगे भी इनसल्ट से। यह ज्ञान-योग मशहूर है। इसका फल है १६ कला सम्पन्न बनना। तो इस जन्म को और समय को बहुत सम्भालना है। फिर तो बीज बोने का समय नहीं है। यह एक जन्म का पुरुषार्थ है, फिर अनेक जन्मों की प्रालब्ध है। अच्छा।