Avyakt murli for Saturday 24 January 1976

>

24-01-76 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन

पुरूषार्थ को तीव्र करने की युक्ति- अब नहीं तो कभी नहीं

रूहानी सेवाधारी टीचर्स से मधुर मुलाकात करते हुए अव्यक्त बाप-दादा ने ये मधुर महावाक्य उच्चारे:-

टीचर्स जैसे विशेष सेवार्थ निमित्त बनी हुई विशेष आत्मायें हैं, वैसा पुरूषार्थ भी चलता है या जैसे स्टूडेण्ट्स का चलता है,वैसे ही चलता है? पार्ट के अनुसार विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है?सम्पूर्ण बनना है, सतोप्रधान बनना है - यह तो सभी का लक्ष्य है, यह तो इन-जनरल हो गया। लेकिन टीचर्स का विशेष पुरूषार्थ कौनसा चलता है?आजकल जो विशेष पुरूषार्थ करना है व होना चाहिये,वह यही है कि हर संकल्प पॉवरफुल हो- साधारण न हो,समर्थ हो व्यर्थ न हो। टीचर का अर्थ क्या है?सर्विसएबल,एक सेकेण्ड भी सर्विस के बिना न हो। मुरली पढ़ना, और चेकिंग करना - यह तो मोटी बात है!

जैसे समय समीप आ रहा है, तो निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को पुरूषार्थ यह करना है कि समय से तेज दौड़ लगायें। ऐसे नहीं कहना है कि इतना समय पड़ा है, कमी दूर हो ही जाएगी। नहीं। यह बुद्धि में रखना है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। हर संकल्प,हर सेकेण्ड के लिए यह स्लोगन कि अब नहीं तो कभी नहीं। जब ऐसे अभी के संस्कार भरेंगे तो ऐसी अभी कहने वाली आत्मायें सतयुग के आदि में आयेंगी। कभी कहने वाले मध्य में आयेंगे। कभी कहने वाले समय का इन्तज़ार करते हैं। तो पद में भी इन्तज़ार करेंगे। तो हर सेकेण्ड, हर संकल्प में यह स्लोगन याद रहे। अगर यह पाठ पक्का नहीं होगा तो सदैव कमज़ोरी के संस्कार रहेंगे। महावीर के संस्कार हैं - ‘अब नहीं तो कभी नहीं!’ हमारे से ये आगे हैं,यह करेंगे तो हम करेंगे - यह अलबेलेपन के संस्कार हैं। जो संकल्प आया वह अब करना ही है। कल नहीं आज,आज नहीं अब,अर्थात् अभी करना है।

सभी विशेष आत्मायें हो न? अपने को छोटा तो नहीं समझते हो?पुरूषार्थ में हर एक बड़ा है। कारोबार में छोटा-बड़ा होता है, पुरूषार्थ में छोटा-बड़ा नहीं होता। पुरूषार्थ में छोटा आगे जा सकता है। कारोबार में मर्यादा की बात है। पुरूषार्थ में मर्यादा की बात नहीं। ‘पुरूषार्थ में जो करेगा,सो पायेगा। अब ऐसे चेक करना है कि ऐसा पुरूषार्थ है या कि जैसे साधारण सबका चलता है, वैसे चलता है? टीचर्स सदा हर्षित हैं? टीचर्स को अनेकों की आशीर्वाद की लिफ्ट भी मिलती है और किसी को कमज़ोर बनाने के निमित्त बनती है, तो पाप भी चढ़ता है। जिस बोझ के कारण जो चाहते हैं वह कर नहीं पाते। बोझ वाला ऊपर उठ नहीं सकेगा। इसलिए चाहते हुए भी चेन्ज नहीं होते तो ज़रूर बोझ है। उस बोझ को भस्म करो - विशेष योग से, मर्यादाओं से और लगन से। नहीं तो बोझ में समय बीत जावेगा, आगे बढ़ न सकोगे। अमृतवेले उठ कर अपनी सीट को सेट करो। जैसी सीट है,उसी प्रमाण सेट हैं? - यह चेक करो। अपने पोज़ (Pose) को ठीक करो। अगर पोज़ ठीक न भी होगा तो चेक करने से ठीक हो जावेगा। अच्छा!

इस वाणी की मुख्य पॉइन्ट

आजकल का विशेष पुरूषार्थ यह होना चाहिए कि हर संकल्प पॉवरफुल हो साधारण न हो, समर्थ हो,व्यर्थ न हो। जो संकल्प आया, वह अब करना ही है। कल नहीं आज,आज नहीं अब,अर्थात् अभी करना है।