Avyakt murli for Thursday 21 December 1978
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21-12-78ओम शान्ति अव्यक्त बापदादामधुबन
हर कल्प की अति समीप आत्माओं का रूप, रेखा और वेला
सर्व के भाग्य विधाता,जानी जाननहार शिव बाबा बच्चों प्रति बोलेः -
आज बाप-दादा अमृतवेले बच्चों से मधुर मिलन मनाते, चारों ओर के बच्चों को देखते हुए आपस में एक विशेष बात पर रूह-रूहान कर रहे थे। किस बात पर? हर बच्चे के दिव्य जन्म की रूप-रेखा वा जन्म की घड़ी अर्थात् वेला को देख रहे थे। हरेक की वेला और रूप रेखाओं के आधार पर वर्तमान संगमयुगी जीवन और भविष्य जीवन का आधार है। रूप में क्या देखा? जन्मते ही शक्ति रूप की झलक रही वा वियोग से योग की रेखा रही अर्थात् तड़प वा प्यास-रूप रहा वा सेवाधारी स्वरूप रहा वा सदा आते ही अतिइन्द्रिय सुख में सुख रूप रहा! उसके साथ रेखायें क्या रही, आते ही सम्पूर्ण परवाने की रेखा रही वा पुरुषार्थी की रेखा रही?वरदानी की रेखा रही, हिम्मत और हुल्लास की रेखा रही वा जन्मते ही सहयोग के आधार पर चलने की रेखा रही। ऐसे ही वेला को भी देख रहे थे,सेकेण्ड में निश्चय बुद्धि रहे,सप्ताह कोर्स के बाद रहे वा और भी अधिक समय के बाद निश्चय बुद्धि बने वा संशय निश्चय की युद्ध चलते-चलते निश्चय बुद्धि बने। वा अब भी युद्ध में ही चल रहे हैं। सेकेण्ड का निश्चय अर्थात् नज़र से निहाल। सेकेण्ड नम्बर श्रेष्ठ बोल से निहाल, तीसरा नम्बर सौदागर से सौदे के मुआफिक मूल्य को बार-बार जानने के बाद मरजीवे बने,चौथा नम्बर जरा सा प्राप्ति के, स्नेह के, सम्पर्क के, परिवर्तन के आधार पर अभी संशय अभी निश्चय। तो बाप-दादा आज हर बच्चे की इन बातों को देखते हुए रूह-रूहान कर रहे थे। इस मरजीवे जीवन का सदा निर्विघ्न वा सदा तीव्र पुरुषार्थी,सदा प्राप्ति द्वारा अनुभवी मूर्त्त वा पुरुषार्थी जीवन वा चढ़ती कला वा उतरती कला, इसी रफ्तार में चलने वाली जीवन - इन तीनों प्रकार की जीवन का आधार रूप, रेखा और वेला पर है।
जो हर कल्प की अति समीप आत्मायें वा पद्मापद्म भाग्यशाली आत्मायें हैं उनकी रूप, रेखा और वेला क्या होती है, वह जानते हो? ऐसी आत्मायें सेकेण्ड में पहुँची और बाप की बनी। कल्प पहले के भाग्य की टचिंग के आधार पर जन्मते ही ऐसे अनुभव करेंगेब्राह्मण बनना है, नहीं लेकिन ब्राह्मण थे,पहले भी थे और अब भी हैं,सेकेण्ड में अपना-पन अनुभव होगा। देखा और जाना। ऐसी वेला वाले की रूप-रेखा क्या होती है? पहले नम्बर की वेला जो अभी सुनाई उनका रूप क्या होगा? जन्मते ही सिर्फ एक रूप -- शक्ति वा शान्ति वा सुख का नहीं, लेकिन जैसे जन्मते ही सर्व प्रॉपर्टी के अधिकारी होते हैं, ऐसे हर स्वरूप के अनुभूति का अधिकार अनुभव करेंगे। जैसे बीज में सारे वृक्ष का सार समाया हुआ है ऐसे नम्बर वन अर्थात् बाप समान समीप आत्मायें वा नम्बर वन वेला वाली आत्मायें सर्व स्वरूप की प्राप्ति के खज़ाने के आते ही अनुभवी होंगे। ऐसे अनुभव करते हैं कि यही स्वरूप निजी स्वरूप है। सुख का अनुभव होता, शान्ति का नहीं वा शान्ति का होता सुख का नहीं शक्ति का नहीं, यह फर्स्ट नम्बर की वेला का अनुभव नहीं। सेकेण्ड में वर्से के अधिकारी यह है वेला और स्वरूप।
अब रेखा क्या होगी? निश्चय बुद्धि बनना वा निश्चय करना है, यह संकल्प मात्र भी नहीं होगा। जन्मते ही नेचुरल निश्चय बुद्धि की रेखा होगी कैसे वा ऐसे के विस्तार में नहीं जायेंगे,हैं ही इसमें ऐसे और वैसे का प्रश्न नहीं उठता। ऐसे पूरे जीवन के अटूट निश्चय की रेखा अन्य आत्माओं को भी स्पष्ट दिखाई देगी। निश्चय की रेखा की लाइन अखण्ड होगी, बीच-बीच में खण्डित नहीं होगी। ऐसी रेखा वाले के मस्तक में अर्थात् स्मृति में सदा विजय का तिलक नज़र आयेगा। ऐसी रेखा वाले, जैसे ब्राह्मणों का भविष्य श्रीकृष्ण रूप में जन्म से ही ताजधारी दिखाया है, ऐसे जन्मते ही सेवा की जिम्मेवारी के ताजधारी होंगे, सदा ज्ञान रतनों से खेलने वाले होंगे। सदा याद और खुशी के झूले में झूलते हुए जीवन बिताने वाले होंगे। सदा हर कर्म में वरदान का हाथ अपने ऊपर अनुभव करेंगे। हर दिनचर्या में अपने साथ सर्व सम्बन्धों से समीप और साकार रूप में साथ का अनुभव करेंगे। स्वतः योगी और सहज योगी होंगे। यह है नम्बर वन रूप, रेखा और बेला वालों की निशानी। अब अपने आपको चैक करो - पहले नम्बर की रूप,रेखा और वेला वाले कितने होंगे? 8 वा 108? आप सब कहाँ हो?अभी भी चेन्ज कर सकते हो। लास्ट सो फास्ट जा सकता है। अभी भी परिवर्तन की मार्जिन है। अभी टू लेट का बोर्ड नहीं लगा है। गुप्त पुरुषार्थी दिन रात एक दृढ़ संकल्प के पुरुषार्थी हाई जम्प लगा सकते हैं। इसलिए फिर भी अपने भाग्य को सदा नम्बरवन बनाने के पुरूषार्थ की लाटरी डालो तो नम्बर निकल आयेगा। समझा क्या करना है। लास्ट चान्स है इसलिए बीती सो बीती करो,भविष्य को श्रेष्ठ बनाओ। इसलिए बाप-दादा फिर भी सबको चान्स दे रहे हैं,फिर उल्हना नहीं देना - हम कर सकते थे लेकिन किया नहीं। समय नहीं मिला, सरकमस्टानसिज़ नहीं थे, अभी भी रहमदिल बाप के रहम का हाथ सबके ऊपर है इसलिए अपने ऊपर भी रहमदिल बनो। अच्छा।
ऐसे सदा बाप के वरदानों के हाथ अपने ऊपर अनुभव करने वाले, सदा अपने ऊपर और सर्व के ऊपर रहमदिल,अटूट अखण्ड निश्चयबुद्धि,अखण्ड योगी,सदा विजय के तिलकधारी, जन्मते ही ताजधारी,ऐसे सदा तख्तनशीन बच्चों को बाप-दादा का यादप्यार और नमस्ते।
पार्टियों से मुलाकात
1. निजधाम और निजस्वरूप की स्मृति से उपराम स्थिति - अपने निजस्वरूप और निजधाम की स्थिति सदा याद रहती है?निराकारी दुनिया और निराकारी रूप दोनों की स्मृति इस पुरानी दुनिया में रहते भी सदा न्यारा और प्यारा बना देती है। इस दुनिया के हैं ही नहीं। हैं ही निराकारी दुनिया के निवासी, यहाँ सेवा अर्थ अवतरित हुए हैं - तो जो अवतार होते हैं उन्हों को क्या याद रहता है? जिस कार्य अर्थ अवतार लेते हैं वही कार्य याद रहता है ना! अवतार अवतरित होते ही हैं धर्म की स्थापना के लिए - तो आप सभी भी अवतरित अर्थात् अवतार हो तो क्या याद रहता है?यही धर्म स्थापन करने का कार्य। स्वयं धर्म आत्मा बन धर्म स्थापन करने के कार्य में सदा रहने वाले,तो शक्ति अवतार हो ना! हर एक शक्ति,अवतार हैं। पाण्डव भी शक्तिरूप हैं। एक सर्वशक्तिवान है बाकि सब शक्तियाँ हैं,तो सब शक्ति अवतार हैं।
सिर्फ यह भी स्मृति रहे तो कितनी मीठी जीवन का अनुभव करेंगे। हम इस मृत्युलोक के नहीं लेकिन अवतार हैं। सिर्फ यह छोटी सी बात याद रहे तो उपराम हो जायेंगे। अगर अपने को अवतार न समझ गृहस्थी समझते हो तो गृहस्थी की गाड़ी कीचड़ में फंसी रहती। गृहस्थी है ही बोझ की स्थिति और अवतार बिल्कुल हल्का। वह फँसा हुआ है वह बिल्कुल न्यारा। कभी अवतार कभी गृहस्थी यह चक्कर अगर चलता रहता तो संगमयुगी श्रेष्ठ जीवन का, सुहावने सुख के जीवन का कभी-कभी अनुभव होगा,सदा नहीं। ऐसे सुख के दिन फिर कभी नहीं आने है, एक एक संगम का दिन अति प्रिय है तो ऐसे प्रिय दिन का सुहावना समय कैसे व्यतीत करते हो? अमूल्य रीति से व्यतीत करते हो वा साधारण रीति से? एक-एक सेकेण्ड की वैल्यू क्या है - उसको जानते हो? 5000वर्ष की श्रेष्ठ प्रालब्ध का आधार यह थोड़ी सी घड़ियाँ हैं,तो ऐसे अमूल्य घड़ियों को अमूल्य रीति से यूज़ करना चाहिए ना। रतन को अगर पत्थर समान यूज़ करेंगे तो रिजल्ट क्या होगी? साधारण रीति से व्यतीत करना अर्थात् रतन की वैल्यू पत्थर के समान करना। अगर समय को व्यर्थ गँवाते हैं तो रतन को पत्थर के समान यूज़ करते हैं। समय का मूल्य रखना अर्थात् अपना मूल्य रखना। समय की पहचान है ही, लेकिन पहचान स्वरूप होकर चलना - यह है अटेन्शन की बात। इस संगम का एक सेकेण्ड भी क्या नहीं कर सकता। एक सेकेण्ड में यहाँ से चारों धाम का अनुभव करके आ सकते हो। ऐसे अनुभवी हो?
छोटी-छोटी बातों में तो टाइम नहीं चला जाता। अब हाई जम्प लगाओ। अभी धीरे-धीरे चलने का समय समाप्त हुआ। बचपन नाज़ नखरे से चलने का होता, बचपन का नाज़ अच्छा भी लगता - लेकिन बड़ा होकर नाज़ से चले तो अच्छा लगेगा! तो अब बचपन बीत चुका,अब वानप्रस्थ तक पहुँच गये। अब यह नाज़ नखरे शोभते नहीं। वानप्रस्थ में सिर्फ एक ही कार्य रह जाता - बाप की याद और सेवा, इसके सिवाय और कोई भी याद न आये,उठो तो भी याद और सेवा सोओ तो भी याद और सेवा - इसी को कहा जाता है वानप्रस्थ। अभी तक भी अगर बचपन की बातें वा बचपन के संस्कार रह गये हों तो समाप्त करो। बन्धन है,क्या करूँ,कैसे करूँ यह सब बचपन के नाज़ नखरे हैं,अब यह दिन समाप्त हो गये, हैं क्या? त्रिकालदर्शी अपने को नहीं जान सकते जो कहते हो क्या करूँ! अब इसमें टाइम नहीं गँवाना - होना तो चाहिए,होता नहीं है, चाहते हैं कर नहीं पाते,यह बचपन की बातों का खेल अब समाप्त। इसका ही अब समाप्ति समारोह मनाओ। अच्छा।
2. ट्रस्टी समझने से पावरफुल स्टेज की अनुभूति
सभी सदा अपने को ट्रस्टी समझकर चलते हो? ट्रस्टी अर्थात् सदा हल्का, गृहस्थी अर्थात् सदा बोझ वाला। गृहस्थी होंगे तो उतरती कला में जायेंगे, ट्रस्टी होंगे तो चढ़ती कला में जायेंगे। ट्रस्टी सदा बेफिकर बादशाह होते अर्थात् फिकर से फारिग होते हैं उन्हें रूहानी फखुर रहता है कि हम मास्टर सर्वशक्तिवान हैं।कैसे भी सरकमस्टान्सेज हो लेकिन स्वयं हल्का रहेगा, स्वयं सदा न्यारा। जरा भी वातावरण के प्रभाव में नहीं आयेंगे। गृहस्थी समझने से क्या,क्यों शुरू हो जाता, ट्रस्टी समझेंगे तो फुलस्टाप आ जाता, फुलस्टाप अर्थात् पावरफुल स्टेज का अनुभव।
3. अंगद समान स्थिति बनाने के लिए निश्चय का फाउन्डेशन मज़बूत करो
सभी अंगद के समान अचल हो? माया के किसी भी प्रकार की हलचल में भी अचल। माया का कोई भी वार स्थिति को हिला न सके। हिलने का कारण क्या होता है?निश्चय का फाउन्डेशन मज़बूत न होने के कारण ही हिलते हैं। अगर निश्चय हो कि कल्याणकारी समय है, हर बात में कल्याण है, तो कितने भी तुफान क्यों न आयें लेकिन हिला नहीं सकते। अब निश्चय के फाउन्डेशन को तीव्र पुरूषार्थ का पानी देकर मज़बूत करो तो सदा अंगद के समान रहेंगे। माया के वार को वार नहीं समझेंगे। अभी हिलने का समय गया, यदि अभी भी हिलते रहे तो लास्ट पेपर में भी हिल जायेंगे तो फिर जन्म-जन्म के लिए फेल हो जायेंगे। इसलिए स्मृति के संस्करण मज़बूत करो। सदा याद रखो कि यह अंगद का यादगार हमारा ही यादगार है तो शक्ति आयेगी।
4.हिम्मत और हुल्लास को एकरस बनाने के लिए एकरस स्थिति ः
सदा हिम्मत और हुल्लास एकरस रहता है? जब एकरस स्थिति होगी तो हिम्मत और हुल्लास भी सदा एकरस होगा,नीचे ऊपर नहीं। कभी बहुत, कभी कम उसका कारण क्या है? सर्व प्राप्ति का अनुभव सदा सामने वा स्मृति में नहीं रहता। आज अल्पकाल की प्राप्ति भी हिम्मत और हुल्लास में लाती है तो यह तो सदाकाल की और सर्व प्राप्ति-इसका परिणाम क्या होगा? बाप द्वारा जन्म से ही जो प्राप्ति हुई है उन सबकी लिस्ट सामने रखो। जब प्राप्ति अटल,अचल है तो हिम्मत और हुल्लास भी अचल होना चाहिए। अचल के बजाए कब मन चंचल हो जाता वा स्थिति चंचलता में आ जाती - यह चंचलता के संस्कार किस में होते हैं? अब तो विश्व में आप आत्मायें सबसे बुजुर्ग हो, अनुभवी हो फिर चंचलता क्यों? सदा बाप और प्राप्ति को सामने रखने से अचल अर्थात् एकरस बन जायेंगे। सब विघ्न खत्म हो जायेंगे। जन्म से ही विजय का तिलक लगा हुआ है सिर्फ वह मिट न जाय यह अटेन्शन रखना है। सदैव नया उमंग, नया हुल्लास और नया प्लैन होना चाहिए। कोई ऐसे सर्विस के साधन बनाओ जिससे कम खर्चा और सफलता ज्यादा हो। अभी बहुत सेवा की मार्जिन है। उसको पूरा करो, हर प्रोग्राम में विशेषता वा नवीनता ज़रूर हो। सबको अनुभव कराने का प्लैन बनाओ। अच्छा।
टीचर्स से बातचीत
टीचर्स तो बाप समान हैं ना, जैसे बाप शिक्षक है वैसे आप भी शिक्षक हो तो समानता हो गई ना! तो समान वाले को क्या कहा जाता है?फ्रेंड। टीचर भी बाप-दादा की फ्रेंड्स हैं, यह फ्रेंडस का सम्बन्ध भी याद रहे तो सहजयोगी हो जायेंगे। फ्रेंड्स का नाता बहुत समीप का नाता है। फ्रेंड्स आपस में जितना स्पष्ट होते है उतना माँ बाप से भी नहीं होते। फ्रेंड्स का सम्बन्ध याद रहे तो तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से बैठूँ, तुम्हीं से खेलूँ यह अभ्यास सहज हो जायेगा। तो सभी फ्रेंड्स को मुबारक हो। पंजाब और दिल्ली दोनों की टीचर्स हैं,तो दोनों भाई-बहन हो गये, दिल्ली है भाई पंजाब है बहन। पंजाब भी दिल्ली से निकला ना।
अच्छा। ओमशान्ति।