Mamma's Murli - gyan-sitar-01

११.१२.४८

सबको वापिस ले जाने वाला, सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानने वाला एक ही परमात्मा है।

सारी दुनिया इस समय घोर अन्धकार में है। इसलिए जहां से भी चलते हैं, उसमें दुःख की ठोकरें खाते रहते हैं। एक तो अज्ञानता यह है जो नॉलेज ही नहीं है कि हम कौन हैं, कहाँ से आये हैं? उसमें फिर ठोकरें भी खाते हैं। जिससे उलटी दुःख की ही रिजल्ट निकलती है। क्योंकि मार्ग का ही पता नहीं है। यह पता तो एक को ही है जिसके पास आदि-मध्य-अन्त की सारी रोशनी है। हरेक के आदि-मध्य-अन्त को जान भी वही सकता है। जिसकी आदि-मध्य-अन्त नहीं है। जो खुद ही आदि-मध्य-अन्त में आने वाले हैं वह आदि-अन्त को कैसे जान सकते हैं? जो साक्षी दृष्टा परमात्मा है, वही जान सकता है। वह जन्म-मरण के चक्र में आने वाला नहीं है। उसको ही सारी नॉलेज है। जन्म-मरण में आने वाले के पास सारी रोशनी रह नहीं सकती है। और जो भी धर्म स्थापन करने आये हैं, वह भी इस समय जन्म-मरण के चक्र में हैं। तो अब रोशनी कौन दे?

सभी धर्मों को जानने वाला अथवा वापिस ले जाने वाला वह है दूर का मुसाफिर। वह तो इस दुनिया का नहीं है। जब कहते हैं कि यह दुनिया झूठी है। झूठी काया, झूठी माया, झूठा सब संसार। सारा संसार ही झूठा है तो उनसे ले चलने वाला मुसाफिर तो इस दुनिया का नहीं चाहिए ना। इस देश में तो सब झूठे हैं। उनको तो इस झूठी दुनिया से पार ले जाना है। भल यह दुनिया ही नई बनती है परन्तु इस दुनिया में तो उसका भी अंश नहीं है ना। वह दुनिया एकदम इस दुनिया से पार है। तो जरुर पार ले जाने वाला उस दुनिया का मुसाफिर चाहिए। रोशनी तो उनके पास रह सकती जो इस चक्र में आने वाला न हो। यह चक्र भी जब तक अपनी आदि-मध्य-अन्त पूरी न करे तब तक वापिस कोई भी जा नहीं सकता। ऐसे भी नहीं कोई मुक्ति को पहुँचे हुए हैं जिन द्वारा रोशनी मिल सकती है। वहाँ कोई जा नहीं सकता। अब हमने रचयिता और रचना के भेद को पूरा जाना है। जबकि आदि को चक्र लगाकर अन्त में आना है, अन्त को फिर आदि में आना है, तो फिर बीच में कोई वापस कैसे जायेंगे? चक्र को भी नम्बरवार अपनी स्टेज में बदलना है। तो जब चक्र के अन्त का भी अन्त हो तब ही वापस जा सकेंगे। तो यह सारी नॉलेज एक के पास ही है। रचना की आदि-मध्य-अन्त कैसे होती है, वह तो रचता ही जानेगा ना। मनुष्य त्रिकालदर्शी हो नहीं सकता। जैसे मनुष्य की भी आदि-मध्य-अन्त होती है। नम्बरवार ही स्टेजेस आती हैं। बाल अवस्था के बाद वृद्ध अवस्था तो नहीं आयेगी। यह सब नियम बने बनाये हैं। तो अपनी बुद्धि में अब रोशनी आयी है। चक्र को पूरा जानते हैं और जानते भी तब हैं जबकि अब आदि में जाने का समय है। अगर आदि के समय हम त्रिकालदर्शी बनें अथवा उस समय यह नॉलेज रहे कि हमें नीचे गिरना है तो फिर सुख की भावना ही न रहे। तो अब अन्त में ही हम जानते हैं। देवताओं को त्रिकालदर्शी बनने की आवश्यकता ही नहीं है और न द्वापर में आने वालों को ही आवश्यकता है। परमात्मा आते ही अन्त में हैं जबकि तीनों कालों का खेल पूरा होने पर होता है। जब खेल चल रहा है, तब उसे बीच में देखने से मजा ही नहीं आयेगा।

अब परमात्मा समझा रहे हैं कि अब कहानी पूरी हुई। अभी अन्त का भी अन्त है। फिर नई कहानी शुरू होती है। यह चक्र अथवा कहानी अनादि बनी बनाई है। एक ही वर्ल्ड हिस्ट्री है। यह सब नॉलेज बुद्धि में है, इसलिए अपने को खुशी है कि फिर से जो कहानी शुरू हुई है उसमें हमारा भी पार्ट है। हम उसमें पूरा सुख लेते हैं। अपने को मालूम है कि इस नॉलेज को पूरा जानने वाला वही दूर का मुसाफिर है। खुद ही फिर वापस ले जाने फिर आता है। मनुष्य यह काम कर नहीं सकता। अगर मनुष्य आत्मा करे तो वह आदि-मध्य-अन्त में नहीं आनी चाहिए। वह तो चक्र से अलग चीज चाहिए। वह है ही एक परमात्मा स्वयं मालिक। मनुष्य समझते हैं — बहुत अवतार होते हैं, युग-युग अवतार होते हैं। परन्तु युग-युग में तो आने की दरकार ही नहीं है। क्योंकि चक्र तो फिरना ही है। अब हम चक्र के नियम को समझते हैं। अब इसमें हमें क्या करना चाहिए जिससे हमारी प्रगति बने? वह स्टेज क्या है? उसकी नॉलेज पूरी कोई भी सुना नहीं सकता है। कोई से भी यह नॉलेज मिली हुई नहीं है कि मनुष्य के लिए पूर्ण स्टेज क्या है और वह कैसे प्राप्त हो सकती है? बाकी तो सब अपनी-अपनी शिक्षा के आधार से मनुष्यों को थोड़ा-बहुत बताते हैं। मनुष्य के लिए ऊंच स्टेज क्या है, वह तो रचता ही समझा सकते हैं।

अब हम अन्धियारे को भी समझते हैं — जबकि रोशनी का पता पड़ा है। दुनिया थोड़े ही समझती है कि हम अन्धियारे में हैं। वह तो समझते हैं — अब तरक्की करते जाते हैं, रोशनी में आते जाते हैं। परन्तु वह रोशनी तो गिरावट की है। वह तो चढ़ाने वाला जब समझाते हैं तब ही हम जानते हैं। दुनिया तो अब बिगड़ी हुई है। यह तो समझते भी हैं लेकिन उसको सुधारने की तरकीब ही क्या है — वह एक परमात्मा ही जानता है। जो खुद ही बिगड़े हुए हैं वह कैसे इस तरकीब को एक्ट में ला सकते हैं! मामला सारी दुनिया का बिगड़ा हुआ है। पांच तत्व आदि सब बिगड़े हुए हैं। हर चीज का सुधार एक रचयिता परमात्मा के हाथ में ही है। अच्छा।