Mamma's Murli - gyan-sitar-03

१४.१२.५८

परमात्मा और धर्म-आत्माओं के कार्य में महान् अन्तर

ओम शान्ति। हम आत्मायें बहुत पुरानी हैं। जरूर है कि हम आत्मायें कब नई भी थीं। भला आत्मा नई और पुरानी कैसे होती है? दुनिया तो समझती है कि “आत्मा न्यारी है, न कटती है, न जलती है।” आत्मा का किसी भी तरह विनाश नहीं होता, क्योंकि इमोर्टल है।” परन्तु अब हमने परम आत्मा से जाना है कि आत्मा इमार्टल बरोबर है। शरीर को जलाते हैं तो आत्मा निकल जाती है। आत्मा अपने कर्मों के हिसाब-किताब अनुसार दूसरा शरीर लेकर पार्ट बजाती है। भोगने वाली आत्मा है। ऐसे नहीं कि शरीर भोगने जाता है, शरीर में आत्मा भोगने जाती है। कर्मों का हिसाब-किताब आत्मा पर लगता है तब तो आत्मा भोगने जाती है। अगर आत्मा न्यारी होती तो भोगने क्यूं जाती? दुःख-सुख आत्मा ही भोगती है। तो जरूर मैल चढ़ी हुई है। अब आत्मा को दुःख फील होता है, तो जरूर आत्मा को पूर्ण सुख-शान्ति का भी अनुभव था। उसी समय आत्मायें भी नई थीं। अब पुरानी बन गई हैं। आत्मा के ऊपर मैल भी अनेक जन्मों की लगी हुई है, न कि एक जन्म की। मनुष्य जो कुछ विकर्म करते हैं उसकी भोगना बहुत है जो एक जन्म में पूरी नहीं हो सकती है। अनेक जन्मों की मैल चढ़ते-चढ़ते आत्मा अब अन्तिम स्टेज पर आकर पहुँची है। ऐसी तमोगुणी आत्माओं को फिर स्वच्छ बनाने परमात्मा को आना पड़ता है। ५ भूतों ने ही इस तमोगुणी अवस्था में लाया है। पहले-पहले आत्माओं की संख्या भी कम थी, फिर वृद्धि होती गई। पार्ट में आने से मैल चढ़ती गई। आत्मायें सभी इकट्ठी तो नहीं आती हैं। झाड़ तो धीरे-धीरे वृद्धि को पाता है। गीता में भी महावाक्य हैं कि मनुष्य सृष्टि उल्टा झाड़ है। उल्टा क्यों है? क्योंकि इनकी जड़ ऊपर है।

सब आत्मायें निराकारी दुनिया से आती हैं तो जड़ वहाँ रही ना। अब सब आत्मायें तमोगुणी हैं। उन्हों को स्वच्छ बनाना—सो तो एक ही समर्थ का काम है, और उनकी गत-मत वही जाने। सद्गति करने की मत उनकी क्या है? किस तरकीब से करते हैं? वह तो वही जाने। मनुष्य आत्मायें तो पार्ट बजाते-बजाते पुरानी हो गई हैं। वह कैसे किसको स्वच्छ बनायेगी? वह बल कहाँ से आए? सर्वशक्तिवान तो वह एक ही परमात्मा है। वह बाप भी आत्मा है परन्तु उनको परम कहते हैं क्योंकि पुनर्जन्म रहित है। उनको कोई लेप-छेप नहीं लगता। उनसे सतोगुणी संस्कार कब जाते नहीं हैं। आत्मायें जन्म-मरण में आती हैं तो वह संस्कार चले जाते हैं। जो भी स्वच्छ आत्मायें हैं वह आती हैं अपना धर्म स्थापन कर उनकी पालना करने। परमात्मा आते हैं सबको वापस ले जाने और साथ-साथ फिर नई दुनिया की स्थापना कराते हैं। तो उनके काम निराले हुए। परमात्मा का कर्तव्य ही अपना है। आत्मायें अपने संस्कारों सहित अनादि हैं। उन्हों को अनेक जन्मों का पार्ट भी कैसे बजाना होता है -- वह भी समझना है। ऐसे नहीं कि आत्मा, परमात्मा से मिली हुई एक ही चीज है।

हर एक आत्मा के भिन्न-भिन्न संस्कार हैं। क्राइस्ट, बौद्ध आदि भल स्वच्छ आत्मायें हैं, परन्तु उन सबके भी भिन्न-भिन्न संस्कार हैं, अपना-अपना कर्तव्य है। तो स्वच्छ आत्माओं में भी भिन्नता हुई ना। यह सब नॉलेज परमात्मा ही दे सकते हैं जो अनादि काल से जानते हैं। अर्जुन को भी कहा है ना कि मुझ एक को जानने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। हर चीज का नॉलेज मिल जाता है। तो परमात्मा सबमें मिला हुआ नहीं है, उनके कर्तव्य ही निराले हैं। आत्मा ही आत्मा में मिलकर एक नहीं हो सकती है तो परमात्मा में मिलकर एक कैसे हो सकती है? सतयुग में आत्मायें पवित्र हैं, कर्म-बन्धन के हिसाब-किताब से उस स्टेज में जीवनमुक्त हैं। उसी समय मैल नहीं रहती। फिर अपने-अपने पार्ट में आने से संस्कारों की मैल चढ़ती जाती है। मनुष्य के भिन्न-भिन्न संस्कार, भिन्न-भिन्न एक्टिविटी — यह किस आधार पर है? इस भिन्नता की भी स्टेज हैं। आत्मायें अपनी तमोगुणी स्टेज में भी अपने-अपने संस्कार वाली हैं। रजो में भी भिन्नता है तो तमो में भी भिन्नता है। सतयुग में जब जीवनमुक्त हैं, यथा राजा-रानी तथा प्रजा। तो यह राजा-रानी-प्रजा सब थे ना। भिन्नता न होती तो सब राजायें होते। प्रजा है तो राजा अवश्य है। सब राजा हों तो फिर खेल ही न हो। इन सभी महीन बातों को बुद्धि से समझना है। विवेक को खोलना है। परमात्मा आकर अनुभव, विवेक के आधार पर समझाते हैं। राइट रांग क्या है? — सो सोचना है जरुर।

कहते हैं — भगवान ने ऐसा खेल क्यों रचा? बच्चों को दुःखी करना — क्या यह बाप का खेल है? बाप कहते हैं कि मैंने जो खेल रचा है उसमें भिन्नता थी। मैंने सुख का खेल रचा। यह तो फिर मनुष्यों ने मुझको भूलकर अपने को भुलाया है और अपने लिए कर्मभोग बनाया है। मैंने तो ऐसे कर्म-भोग से छुड़ाया था, तब तो मुझे दुःख-हर्ता सुख-कर्त्ता कहा गया है। यह है समझने की बात। यह सुनने वाला भी रेग्युलर चाहिए क्योंकि गुह्य पढ़ाई होती जाती है। भल वही बात १० बार सुनी होगी परन्तु कोई दिन वह बात पूरी रीति बुद्धि में बैठ जाएगी। रेग्युलर पढ़ने से ही पूरी धारणा होगी। विनाशी पद पाने में भी रेग्युलर पढ़ाई होती है ना। यह भी पढ़ाई है और इनका टाईम भी यह थोड़ा-सा है। ऐसे नहीं कि परम्परा गुरुओं की गद्दी चलती है। नहीं, परमात्मा तो कहते हैं सतगुरु हूँ ही मैं एक। मैं ही सद्गति देता हूँ। सद्गति को ही प्रालब्ध कहेंगे। दुर्गति को प्रालब्ध नहीं कहा जाता है। सिर्फ सत्य-सत्य कहने से न कल्याण हुआ है, न होने वाला है। हर बात को विवेक से समझना चाहिए ना। मंजिल बरोबर ऊंच है। विकारों को पूरा जीतना है तब तो सम्पूर्ण बनेंगे। विकारों से युद्ध करनी है। इसमें अगर खुद नहीं पहुँच सकते तो शान्त में रहें। औरों की शान्ति में विघ्न डालना, ऐसे को कल्प पहले भी परमात्मा ने कहा है राहू और भस्मासुर। अपने को ही भस्म कर देते हैं। असुर तो पहले ही हैं। ज्ञान अमृत पी फिर उल्टा बनते हैं तो उनको भस्मासुर कहा जाता है। तो ज्ञान अमृत पीकर और ही भस्मासुर तो नहीं बनना चाहिए। अपना काम है सूचना देना। बुरे बनो तो भी कितने तक बनो, अच्छा बनो तो भी कितने तक बनो? बुराई में भी स्टेजेस हैं — सतो, रजो, तमो। ऐसे नहीं कि एकदम चकनाचूर हो जाओ। भल बुरे बनो यानी पद गँवाओ परन्तु एकदम भस्मासुर तो नहीं बनो ना। खुद नहीं चल सकते हो तो औरों को तो विघ्न नहीं डालो। करते तो सब अपने लिए हैं ना। सच्चे पुरुषार्थी को तो यह विघ्न आदि और ही फोर्स (जोश) दिलाएंगे। बाप का फर्ज है सपूत अथवा कपूत बच्चों को समझाना। कपूत प्रति भी सूचना दी जाती है — मुफ्त अपना पद भ्रष्ट करते हो। बनाने वाले तो अपना पद बना ही लेंगे। बिगाड़ेंगे फिर भी अपनी। इसलिए कुछ सोचना चाहिए। अच्छा।