Mamma's Murli - gyan-sitar-04
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
१६.१२.५८
परमात्मा को हाथ में हाथ देना अर्थात् स्वयं को उनके आगे सम्पूर्ण सुपुर्द कर उनके डायरेक्शन पर चलना
ओम् शान्ति। हमारे पास अब रोशनी है अर्थात् मनुष्य आत्मा सुख के वा दुःख के जो भी पुनर्जन्म धारण करती है उन सब की नॉलेज है। कैसे हम पार्ट बजाने आये, फिर कहाँ जाना है — इन सब बातों की रोशनी है। परमात्मा जो धर्मराज है वह तो सबके हिसाब-किताब को जानने वाला है ना। जो पक्के निश्चय बुद्धि हैं वह समझते हैं कि अब हम प्रैक्टिकल में उस परमात्मा के संबंध में हैं। वह धर्मराज भी है, आगे-पीछे का सब हिसाब-किताब उनके आगे चुक्तू करना है। उनको हाथ में हाथ पूरा देना है। कोई-कोई पूछते हैं कि ‘हाथ में हाथ’ देना किसको कहा जाता है? जब हम जानते हैं वह हमारा बाप, टीचर और गुरु है। पास्ट विकर्मों का हिसाब - किताब भी उनके आगे अब चुक्तू करना है और भविष्य प्रालब्ध भी उस द्वारा ही प्राप्त करनी है। इसलिए हम सब कुछ उनको सुपुर्द करते हैं। जितना सुपुर्द करेंगे और भविष्य प्रालब्ध बनाने के लिए जो उनका पूर्ण डायरेक्शन है, उस पर चलेंगे तो फिर हमसे सब कर्म कराने वाला वह रिस्पान्सिबल हो जायेगा। यह हुआ हाथ में हाथ देना। फिर भल कैसे भी वह चलावे। परन्तु हमको सब सुपुर्द करना है। इतनी समर्थी चाहिए। हरेक के हिसाब-किताब को देख चलाया जाता है। वह करनकरावनहार है। वह जो करायेगा वह पूर्ण कल्याण अर्थ। तो इतना निश्चय होना चाहिए कि उनके डायरेक्शन अनुसार हमारी अवस्था हो। अपनी अवस्था को पूरा बनाना है।
अपने को पूरा सुपुर्द करना है। जबकि हम जानते हैं अब पूरा हिसाब-किताब लेने वाला प्रैक्टिकल में आया है। वह हमारे सामने उपस्थित हुए हैं सब कुछ देखने, डायरेक्शन देने और कर्म कराने। तो हम जितना सुपुर्द करेंगे उतना हमारी रिस्पान्सिबिलिटी भी उनके ऊपर ऐसी रहेगी। कई समझते हैं कि बस कागज पर अपना पूरा पोतामेल लिखकर देना है, बस। परन्तु पोतामेल के रहस्य को भी समझना है। जैसे बाप बच्चे का संबंध होता है, तो वह सब कुछ पेश करेंगे ना राय लेने के लिए। यह भी उनके डायरेक्शन पर चलने की समर्थी चाहिए। यह तो प्रैक्टिकल की बात है। ऐसे नहीं हमने कागज पर लिख दिया तो बस, बच्चे हो गये। यहाँ तो प्रैक्टिकल उनका बनना है, फिर वह जैसे चलावे। परमात्मा कहते हैं ना — मैं जो हूँ, जैसा हूँ उस रुप से जानना है। फिर वह जैसे चलावे। वैसे ही जो बच्चा बनने का दाँव लगाता है उनको समझना है — जैसा हूँ, वैसा हूँ, तुम्हारा हूँ। फिर तो उनका अपना कुछ रहा नहीं। इतनी हिम्मत है तो आगे बढ़ना है। अगर दोनों तरफ बुद्धि होगी तो काम नहीं चलेगा। सेकेण्ड-सेकेण्ड पूरा डायरेक्शन लेना है। नहीं तो उनको इतनी रेस्पान्सिबिलिटी उठाने की क्या आवश्यकता है? प्रैक्टिकल जीवन बनानी है। जैसे लौकिक रीति कोई किसका बच्चा बनता है तो कर्म के खाते से बनता है। अब वह बाप, टीचर, गुरु है। तो सब तरफ के कर्म उनको सुपुर्द करने हैं। बड़े साहस की बात है। परमात्मा के आगे स्पष्ट होना है। यह बातें उन्हों के लिए हैं जो पूर्ण विजय प्राप्त करने चाहते हैं। ऐसे पुरुषार्थी ही विजय को पा सकेंगे। पूरी हैण्डलिंग लेनी है जिससे अपने कर्म श्रेष्ठ भी होते जाएँ और विकर्मों का बोझ भी विनाश होता जाए। प्रैक्टिकल में जानना है, प्रैक्टिकल में बनना है।
भगवान भल भोलानाथ है परन्तु इतना तो भोला नहीं है। भोला इस बराबरी में है जो देखो, लेता क्या है और देने में कैसा पूरा दाता है! तुम देते ऐसी चीज़ हो जो उनके काम की नहीं है, तुम्हारे काम में भी पूरी नहीं आती है। और देता कितना है! इस हिसाब से भोलानाथ है। परन्तु वह पुराना भी पूरा लेगा। इतना तो भोला नहीं है जो सिर्फ कागज ले लेवे। परन्तु उनके आगे पूरा रखकर फिर पूरा लेना है। इसमें अपना कुछ भी नहीं समझना है। बेकार चीज़ उनके आगे रखनी है, इतनी हिम्मत हो तब है बात।