Mamma's Murli - gyan-sitar-10
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२८.१२.५८
पवित्र प्रवृत्ति से निवृति नहीं लेकिन माया से निवृति रखो
ओम् शान्ति। परमात्मा की नॉलेज सिद्ध करती है कि प्रवृत्ति मार्ग अनादि से ही चला आता है । रचता और रचना - यह दो अक्षर भी प्रवृत्ति को सिद्ध करते हैं। परमात्मा क्रियेटर है तो किसका ? क्रियेशन का। भगवान के संस्कार ही प्रवृत्ति के हैं। भल निराकार है परन्तु रचना का रचता तो है ना। परमात्मा अपने संस्कारों में ही प्रवृत्ति वाला है। तो इससे सिद्ध है अनादि प्रवृत्ति है। वह परमात्मा की अनादि पवित्र प्रवृत्ति कौनसी है, उसका नॉलेज खुद ही बताते हैं। ऐसे नहीं, प्रवृत्ति सुख और दुःख की है। परमात्मा की प्रवृत्ति ही सुख की है। जिस रचना के लिए उसको रचता कहा जाता है। सुख-दुःख, हार-जीत – दोनों को मिलाकर प्रवृत्ति नहीं कही गई है। परमात्मा की प्रवृत्ति है ही सुख की। दुनिया समझती है - यह दुःख सुख प्रवृत्ति में होता ही आया है, होता रहेगा। परन्तु नहीं, परमात्मा सुख की रचना रचते हैं । उसमें दुःख-सुख की बात नहीं, वह तो प्रालब्ध है। वहाँ जन्मना, मरना, शरीर में रहना - सब पवित्रता के आधार से होता है। दुनिया जानती ही नहीं कि जन्मना पवित्रता से भी हो सकता है। इस बात को असम्भव समझती है। परन्तु परमात्मा कहते हैं – मेरी अनादि रचना थी ही पवित्र प्रवृत्ति । बाकी सब रचना है माया की। माया की रचना में आदि-मध्य-अन्त दुःख है। वह है अपवित्र रचना । इस खेल को समझना है। यह रचना है ५ भूतों की, इसमें दुःख-सुख दोनों मिला हुआ है। अल्पकाल का सुख तो दुःख की बराबरी में ही रखेंगे। परमात्मा की अनादि रचना में है ही पवित्रता। आदि-मध्य-अन्त सुख की प्राप्ति रहती है।
मनुष्य समझते हैं -- निवृत्ति से ही पवित्रता होगी । परन्तु निवृत्ति रखनी है माया से। ऐसे नहीं, प्रवृत्ति से निवृत्ति रखनी है। प्रवृत्ति है तब तो पवित्रता शब्द आता है ना। पार्ट ही न हो तो प्रवृत्ति शब्द भी क्यों कहें ? अब हम जानते हैं – परमात्मा की पवित्र प्रवृत्ति की डिपार्टमेन्ट अलग है, माया की डिपार्टमेंट अलग है। पवित्र प्रवृत्ति में रहने की अब नॉलेज मिलनी है। पवित्रता को प्रवृत्ति कहेंगे, प्रवृत्ति को पवित्रता कहेंगे। अब हम माया की अपवित्र प्रवृत्ति से निकल रहे हैं। परमात्मा कहते हैं कि माया की प्रवृत्ति में अनेक जन्म बिताये, अब उनसे निवृत्त होना है। उल्टी-सुल्टी प्रवृत्ति से निवृत्त होना है और पवित्र प्रवृत्ति में आना है। दुनिया ने देखी ही यह माया की प्रवृत्ति है। परमात्मा की पवित्र प्रवृत्ति के संस्कार ही इन आत्माओं से गायब हैं। बहुत जन्मों से माया की मैल चढ़ी हुई है। इसलिए समझ नहीं सकते हैं कि प्रवृत्ति भी पवित्रता के आधार पर कभी चली है और चल सकती है। मनुष्य आत्मा के लिए पुनर्जन्म तो जरुर है। परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि पुनर्जन्म है ही दुःख देने वाला । आदि-मध्य-अन्त सुख देने वाले पुनर्जन्म हमारे होते हैं।
अब हम जानते हैं कि आत्मा की ओरीजनल स्टेज यह है। तो सदाकाल सुख भोगते हैं। परमात्मा जो रुहों का बाप है उनके ही संस्कार हैं स्थापना-विनाश-पालना करना। वह समझते हैं कि यह स्टेज भी नीचे की है। ऊपर वाली स्टेज में कुछ नहीं है। परन्तु हम जानते हैं कि परमात्मा है ही संस्कार वाला । स्थापना-पालना-विनाश-- यह परमात्मा के संस्कार हैं, आत्मा के नहीं। आत्मा इस कार्य अर्थ निमित्त नहीं बन सकती है। इस विकारी प्रवृत्ति का विनाश और पवित्र प्रवृत्ति की स्थापना करना परमात्मा का ही काम है। यह संस्कार उस एक ही सुप्रीम रुह के हैं। वह रुह अब अपना कार्य कर रहे हैं। इसमें हाथ पाँव से कुछ करना नहीं है। परमात्मा कर्म भी यही सिखलाते हैं कि पवित्र बनो और बनाओ। यह समझ की बात है। कहा जाता है ना - समझ से काम लो। समझ होगी तो मालूम रहेगा -- क्या कर्म करना है। पहले ज्ञान पीछे कर्म । समझ कर काम करना होता है। समझ से ही हम जानते हैं कि श्रेष्ठ कर्म क्या है ? तो रचता और रचना, बीज और झाड़ सिद्ध करते हैं प्रवृत्ति को । बीज में झाड़ है ना। बीज है ही प्रवृत्ति वाला। परमात्मा क्रियेटर है, उनकी रचना प्रवृत्ति की है। अब हम इस नॉलेज को जानते हैं कि यह है ही प्रवृत्ति का फाउन्डेशन । अपवित्र प्रवृत्ति की जड़ को निकाल पवित्र प्रवृत्ति की जड़ को लगाना परमात्मा का ही काम है, जो अब कर रहे हैं।