Mamma's Murli - gyan-sitar-20
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
२४.८.५९
अवस्था अच्छी बनानी है तो जो सुनते हो उसे औरों को सुनाओ
अभी हम पुराने से नये बन रहे हैं। नई चीज सुख देने वाली होती है और पुरानी चीज दुःख देने वाली होती है। हम भी जब नये थे तो बहुत सुखी थे। अब फिर हम सुख की तरफ जा रहे हैं। इसके लिए हमको परमपिता परमात्मा ज्ञान और योगबल के सांचे में ढाल रहे हैं। भल आत्मा का स्वरुप तो वही है लेकिन संस्कारों में परिवर्तन आ जाता है। अब हम आत्माओं को परमात्मा काले से गोरा बना रहे हैं। तो शरीर भी ऐसे ही बनेंगे। आत्मा है तो अनादि लेकिन प्योर बना रहे हैं। इसलिए उनको रचयिता भी कह सकते हैं। सभी आत्माओं को मुक्ति-जीवन्मुक्ति देने वाले वह हैं। इसलिए क्यों न कहें कि वह रचयिता है। इसलिए उनको आत्माओं का पिता भी कहते हैं । कैसे हम आत्माओं को नया जन्म देते हैं ? जैसे पुराने जेवर से नया बनाते हैं तो भट्ठी में डाल खाद निकाल साफ करते हैं। वैसे भी हम महसूस करते हैं - जैसे ज्ञान-योग की भट्ठी में पड़े हैं, ५ विकारों की खाद निकलती जा रही है। यह सब बातें अपने अनुभव की हैं। अपने आगे तो स्पष्ट है कि हमको क्या बनना है। ५ विकारों का अंश भी नहीं रहता है। अपने ओरीजनल संस्कार तो प्योर हैं। यह तो माया के संस्कार हैं। खेल ही ऐसे बना है जो आधा कल्प ईश्वर के प्योर संस्कार हमारे में रहते हैं, आधा कल्प माया के विकारी संस्कार रहते हैं।
अब फिर हमें प्योर बनना है जिससे सर्वदा सुख-शान्ति मिलेगी। इसके लिए ही अनेक युक्तियां मिल रही हैं। जितना मन्सा-वाचा-कर्मणा इस अलौकिक सर्विस में तत्पर होंगे उतना अपना पुरुषार्थ भी तेज होगा। यह भी युक्ति है। औरों को समझायेंगे तो अपने को भी देखेंगे कि मेरे में कोई कमी तो नही है। जैसे कोई और को कहेंगे बीड़ी मत पियो, तो खुद कैसे पियेंगे ? इसलिए बाबा फरमान करते हैं - "जो सुनते हो वह औरों को सुनाओ तो तुम्हारी अवस्था भी अच्छी होगी ।" परिपूर्ण तो यहाँ ही बनना और बनाना है। ऐसे नहीं, दूसरे जन्म में बनेंगे। वहाँ तो है ही प्रालब्ध। अभी बाप पढ़ाने के लिए सामने है तो क्यों न सम्पूर्ण बनें, जो फिर वहाँ सजायें खानी न पड़ें। जब वह बाप-गुरु-टीचर बने हैं, तो फिर सजायें खाने उनके पास क्यों जावें ? इसलिए कहते हैं – अपने विकर्म मेरे सामने रखेंगे तो आधी सजा तो अभी ही क्षमा कर देंगे। वहाँ तो पूरी सजा खानी पड़ेगी। तो इसके लिए यह पुरुषार्थ है। बाकी कोई कहे हमने सब समझ लिए हैं, यह ड्रामा है, चक्र ऐसे फिरता है। लेकिन नहीं, इसकी घड़ी-घड़ी स्मृति चाहिए। नहीं तो २-३ रोज पढ़ने से ठण्डे पड़ जाते हैं । इसलिए जितना बुद्धि उसमें रहेगी उतना सदैव खुशी की अवस्था रहेगी। मार्ग भी बुद्धियोग का है। यहाँ हाथ-पांव की लड़ाई नहीं है, सब अन्दर की बात है। अन्दर ही अच्छे संस्कार धारण करने हैं।
हर एक को अपनी पढ़ाई का शो दिखाना है। कहते हैं ना बंधन से छुड़ाओ । लेकिन सर्विसएबल भी हो ना। वहाँ से भी छोड़ो और सर्विसएबल भी न हो तो क्या करेंगे ? माया बुद्धि को भटकाती रहेगी। इस सर्विस के लायक होंगे तो वह सर्विस आपेही छूट जायेगी। इस सर्विस पर तत्पर हो जायेंगे तो कर्मबन्धन का खेल खत्म हो जायेगा। ऐसे तो नहीं होना चाहिए - खुद पकड़कर बैठे और कहता रहे बंधन से छुड़ाओ। यह तो है बुद्धियोग की बात । छोड़कर छूटने की बात तो नहीं है। बुद्धि को कर्मातीत बनाना है। बाकी प्रवृत्ति को भी सिद्ध करना है। जो कुछ हम छोड़ते हैं अथवा बदली करते हैं -- वह है इमप्योरीफाइड कर्मबन्धन । उन्हें छोड़ प्योर संबंध लेना है। कर्म-सन्यासी तो नहीं हैं। यह तो सब बुद्धि की सफाई है। इसके लिए यह युक्तियां हैं। यह तो गैरन्टी है कि विजय अवश्य होनी है। यह तो बीच में विघ्न पड़ते हैं। यह सम्बन्धियों के बन्धन न पड़ें तो बंधन टूटें कैसे ? अपना तो सबमें फायदा है। सच्चे पातशाह से अगर सच्चा प्यार है तो इन विघ्नों की परवाह नहीं रहती । यह कोई मनुष्य से तो प्यार नहीं। डायरेक्ट सर्व समर्थ से योग लगाते हैं। वही अब विनाश, स्थापना का कार्य कर रहे हैं। इस बात को सिद्ध होने में अब देरी नहीं । प्रैक्टिकल दृश्य ही सिद्ध करा देंगे । तब तक अपने निश्चय और हिम्मत से काम लेना है।