Mamma's Murli - gyan-sitar-25
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
७.९.५९
पांच विकारों के कर्मबन्धन से छूटना ही सच्ची स्वतन्त्रता है
ओम् शान्ति। हम जिसकी याद में बैठे हैं उसको हम जानते हैं कि वह समर्थ है ! उसकी समर्थी का भी कब कर्त्तव्य चला है। निराकारपने की समर्थी नहीं। जरुर साकार में समर्थी का कर्त्तव्य चला है तब गायन हुआ है। निराकार होते साकार में गायन है तो जरुर कुछ खास बात होगी। बाकी यह तो समझते हैं कि किसको धन देना, खाना देना, सुख देना- यह उस करनकरावनहार का काम नही है, उसकी यह समर्थी नहीं है। अगर ऐसा हो तो फिर सबको सुख देवे। फिर कोई सुखी और कोई दुःखी क्यों ? सुख होते भी मनुष्य सन्तुष्ट नहीं है तो क्या यह परमात्मा का कर्त्तव्य है ? अब हमारी बुद्धि का ताला खुला है, तो हम जानते हैं कि परमात्मा की समर्थी क्या है ? परमात्मा ने जो सुख दिया है वह कुछ भिन्न है, तब ही परमात्मा के कर्त्तव्य का गायन है। बाकी इस जीवन से परमात्मा का कर्त्तव्य सिद्ध नहीं होता है। परमात्मा ने यह जीवन नहीं बनाई है। वह कुछ और ऊंच जीवन थी जिसका गायन है। वह ऊंच सुख की दुनिया थी। मनुष्य नहीं जानते। उसको सर्व सुख-दाता, समर्थ तब कहा जाता है जबकि मुक्ति और जीवन्मुक्ति दोनों ही आकर देते हैं। और सभी धर्म वालों को मुक्ति में भेज देते हैं। बाकी जो लायक बनते हैं उन्हों को राज्य-भाग्य दे खुद वापस चले जाते हैं। क्योंकि प्रालब्ध तो आत्माओं को भोगनी पड़ती है। हमको वह नॉलेज मिली है, सुख मिला है, तब ही गायन करते हैं और उनसे योग लगाते हैं।
परमात्मा कहते हैं – इस सृष्टि में मेरी याद का तो अंश ही नहीं है। माया ने एकदम बुद्धि का ताला लगा दिया है। बाकी परमात्मा बाप कभी किसको दुःख नहीं देते हैं। उसको कहा जाता है सुख-दाता, न कि दुःख-दाता। सुख दिया है, तब तो इतने यादगार बने हैं और गायन होता है। अब माया ने अपवित्र बनाया जिस कारण ही मनुष्य दुःखी बने हैं। मनुष्य यह जो स्वतन्त्रता कहते हैं, लेकिन जब तक ५ विकारों के कर्मबन्धन से न छूटे हैं, तब तक स्वतन्त्रता हो नहीं सकती है। अपवित्र आत्मायें न सुख देख सकती हैं, न सृष्टि पर राज्य चला सकतीं । इसलिए परमात्मा का प्लैन ही कुछ और है। वह राज्य कारोबार न कौरवों को देते हैं, न यादवों को देते हैं। परन्तु पवित्र देवताओं को देते हैं, जिन्हों को अब खुद बना रहे हैं। बनना तो हरेक को अपने पुरुषार्थ से ही है। अपनी मेहनत से लक्ष्मी-नारायण ने सम्पूर्ण पुरुषार्थ से सम्पूर्ण प्रालब्ध पाई है, तब ही गायन है। हीरो-हीरोइन कहा जाता है। ब्रहमा को भी हीरो-हीरोइन कहा जाता है क्योंकि ऊंच कर्त्तव्य किया है।
मनुष्य की ऊंचाई है देवता बनना। बाकी मनुष्य परमात्मा नहीं बन सकता। तो पुरुषार्थ करना है। ड्रामा पर अथवा भाग्य पर नहीं ठहरना है। भल हम जानते हैं कि यह बना बनाया है… लेकिन बनना तो पुरुषार्थ से है ना। पता पड़ने से पुरुषार्थ नहीं छूट सकता। चाहे पता लगे, चाहे न लगे, पुरुषार्थ में जरुर लगना है। अर्जुन को भी कहा है ना - सब मरे पड़े हैं, सिर्फ निमित्त तुमको मारना है। तो पुरुषार्थ कराया ना। पुरुषार्थ बिगर, हठ पर ठहरने से काम नहीं चलता है। नहीं तो फिर हाथ मसलना पड़ेगा। श्वाँस पर तो भरोसा नहीं है। शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए। जैसे और लौकिक कार्य को निभाते हो, तो इसको भी निभाना है। गफलत नहीं करनी है। नहीं तो धर्मराज के मोचरे भी खाने पड़ेंगे, रोटी भी नहीं मिलेगी। अगर मोचरों से छूटेंगे तो फिर आराम से बैठ खाते रहेंगे। कोई कहते हैं – अच्छा, पीछे धर्मराज से समझ लेंगे। तो अब भला समझ लो। अपने कर्मों से छूटो। देखो, कहते हैं ना – हाय मेरे कर्म ! इसमें कोई अपना घात भी कर लेते हैं। दुःख से छूटने का वश नहीं चलता है तो फिर दूसरे - तीसरे जन्म में दुःख भोगते हैं। कहते हैं – पीछे भगवान से समझेंगे। तो अभी ही समझ लो। कुछ सोचो, बाकी गफलत मत करो। गफलत करने वाले दुःख भोगते हैं, छूट नहीं सकते हैं। इसलिए चेतावनी दी जाती है कि इन दुःख के कर्मबन्धन से छूटो, नहीं तो पछताना पड़ेगा। अच्छा। ओम् शान्ति।