Mamma's Murli - gyan-sitar-32

१३.९.६२

आत्मा, परमात्मा - दोनों अनादि हैं, अन्तर सिर्फ पवित्रता की लाइट का है

कहावत है – आत्मा, परमात्मा अलग रहे बहुकाल, सुन्दर मेला कर दिया जब सतगुरु मिला दलाल । अब दलाल जो संबंध जुड़ावे वह भी तो परमात्मा ही चाहिए । तो अब सतगुरु ने ही अपने साथ योग लगाना सिखाया है और समझाया है कि 'मैं कौन' और 'तुम कौन' । बहुत लोगों की मत है कि सबकी आत्मायें एक हैं । परन्तु त्रेता के अन्त तक भी ३३ करोड़ आत्मायें गाई जाती हैं । उनको कहा ही जाता है निराकार आत्मायें । यानी आत्मा और शरीर अलग चीज़ें हैं । आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है । तो लेने और छोड़ने वाली आत्मा है । पहले भले शारीरिक संबंध से आत्मा को दुःख-सुख भोगना है हिसाब-किताब अनुसार, परन्तु प्योर बनना है । प्योर बनना है सुप्रीम सोल से । तो जैसे परमात्मा के लिए प्रश्न नहीं है कि किसने उनको पैदा किया, वैसे आत्माओं के लिए भी प्रश्न नहीं उठता है । दोनों अनादि हैं । परन्तु सिर्फ परमात्मा एक ही सोल है जो एवर प्योर है । सब चीजों में वह एवर है । बाकी आत्मा को इनकारपोरियल से कारपोरियल में आना है और स्टेजेस से पास होना है । एक ही सुप्रीम सोल बदलता नहीं है ।

गीता में भी है कि हजारों सूर्यो से जास्ती तेज है। तो जितनी प्योर उतनी प्रकाशमय है । परन्तु साइज जैसी आत्मा की है. वैसी परमात्मा की है. सिर्फ लाइट का अन्तर है । जब तमोप्रधान आत्मायें होती हैं तो काली हो जाती हैं। शुरु में देखते थे कि इसकी आत्मा में इतनी लाइट है ! तो अब यह कालापन आदि सब पवित्रता पर है। तो तरस तो आता ही है कि क्यों नहीं सब अपनी जीवन बना लें ! बाप के पास हमारी जायदाद है, वह लेने का जोश आना चाहिए । जैसे बाप से लड़ाई करके भी वर्सा लेना होता है ना। भल कोई गुरुनानक को मानता हो, तो उसमें भी बड़ा पद पा सकता है। अब नहीं किया तो धर्मराज के पास आना ही पड़ेगा ।

जिस टाइम जिस सर्विस की दरकार है उसमें ही कमाई है। जैसे जिस समय गवर्मेन्ट को मजदूरों की दरकार पड़ती है तो जास्ती पैसा देकर भी काम कराते हैं। तो जिस समय जिस सर्विस की दरकार है उस समय वही सर्विस करने से उसकी कमाई जास्ती है। जिस समय तगारी उठाने की दरकार है उस समय वाचा सर्विस करेंगे, जिसकी उस समय दरकार नहीं, तो वह फालतू हो जायेगी । हमको तो बेहद में खड़ा रहना है। हमारी बेहद की सर्विस है। दुनिया की सर्विस में खड़े हैं । यह है डिटेल पुरुषार्थ की वा प्रालब्ध की नॉलेज जिससे आगे बढ़ते रहना है। छोटों को भी आगे बढ़ना है, उनके आरगन्स छोटे हैं, इतनी बुद्धि नहीं है। तो जितनी सर्विस कर सकते हैं उसमें ही कमाई है। पहले तो खुद धारण करना है, फिर औरों को धारण कराना है। बाबा हमको बहुत ऊंच ले जाते हैं। आत्माओं से नम्बरवार प्रेम-प्यार भी रखना है। ऐसा (देवता) बनना है तो काम भी ऐसा करना है। कई कहते “यह पद आदि भी क्या है - टैम्पटेशन है। अपना काम है अच्छा काम करना।" लेकिन वह भी तो जीवन होगी ना पवित्रता, सुख, शान्ति की। तो उसका साक्षात्कार कराते हैं। अच्छा ।