Mamma's Murli - gyan-sitar-40
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
८.१०.६२
बाप से पूरा हक लेने के लिए आज्ञाकारी, सपूत बनो
परमात्मा को साजन भी कहते हैं। वह सारा हाल बैठ बताते हैं कि हे आत्मायें, तुम कैसे मेरे से बिछुड़ी, फिर तुम कैसे आकर मिली हो, फिर मिलकर क्या प्राप्ति होगी। तो वह खुद अपना परिचय दे रहा है। ऐसे नहीं कि अब भक्तिमार्ग की तरह कोई अपनी भावना अनुसार मिलेगा। लेकिन कहते हैं कि मेरा जो कुछ है सब बच्चों को ही देता हूँ।
हमारी पहले यह भावना थोड़ेही थी कि हम परमात्मा के होकर के उनके वर्से के हकदार बनें। लेकिन भक्ति-मार्ग में तो हम किसको भी परमात्मा का रुप बनाकर पूजते हैं, तो भावना का रिटर्न मिलता था । यह पता नहीं था कि हम ऐसे वारिस बन जायेंगे । भल भक्ति-मार्ग में कहते थे कि सब तू ही है, लेकिन यह दिमाग में नहीं था कि मैं ऐसा ऊंच भी बन सकता हूँ, ऐसी भी कोई प्राप्ति होती है। अब यथार्थ दिमाग में आया है कि हम ऐसा क्यों न बनें। तो वह खुद कहता है कि मेरे को जानकर मेरे पर दांव लगाओ, मेरे हो जाओ। जैसे बच्चा गोद का हो जाता है लौकिक में, तो बच्चे का हक लग जाता है। लेकिन इसमें तो बच्चा बनकर फिर भी पुरुषार्थ है। धारणा कर लायक बनना है। बच्चे बनने के बाद भी फिर बच्चा आज्ञाकारी, सपूत, फरमानबरदार हो । उस लौकिक में तो कैसा भी बच्चा हो - हक ले लेगा। लेकिन यहाँ तो बच्चा बनकर भी फिर उनके फरमान पर पूरा चलेंगे तो पूरी-पूरी मार्क्स मिलेगी। कहते हैं - सब तुम्हारे लिए है है। उस बाप को तो कुछ अपनी लालसा रहती है लेकिन यहाँ तो जो करेगा सो पायेगा ।
अभी के पुरुषार्थ से सब पदार्थ जन्म-जन्मान्तर के लिए मिल जायेंगे । मृत्यु होते भी जन्म-जन्मान्तर हमारा सुख लगातार चलता रहेगा । इसलिए वहाँ हमारा मरना, मरना नहीं है। यहाँ तो अकाले मृत्यु होती है। बाबा कहते हैं – पदार्थ हैं तो उनका सुख भी प्रैक्टिकल में चाहिए। मनुष्यों के पास धन है तो भी दुःख है। तो फिर कह देते हैं कि इच्छा ही न हो क्योंकि देखते हैं कि इच्छा ही खराब चीज है। तो फिर हठ से इच्छाओं को मारने की कोशिश करते हैं। लेकिन इसमें हठ आदि की बात ही नहीं है। अब मनुष्यों के पास सुख रहता ही नहीं है, तब कहते हैं कि संसार काग विष्टा के समान है। यह संसार बना ही नहीं है। लेकिन अपने पास नॉलेज है कि सम्पत्ति ही सुख देने वाली है। लेकिन सम्पत्ति भी पवित्र हो । पवित्र शरीर, पवित्र संसार हो । हमारे पास पवित्रता का वह बल चाहिए जिससे हर चीज पवित्र हो जाए। इस विकारी दुनिया की पवित्रता में कोई बल नहीं है, इसमें विकारी खाता मिक्स है। पवित्र, तो जन्म और मरण में भी पवित्र हो । पवित्रता की डिग्री वह जिसमें सब पवित्र हो। इस पुरानी दुनिया की पवित्रता में कोई सार नहीं है- न इसके मर्तबे में, न इसके धन में. । सब तमोप्रधान हैं।
अभी हमको अपना देश, अपना वतन बुद्धि में घूमता है। भल आंखों से यह दुनिया देखते हैं लेकिन इनसे बहुत दूर हैं। अब आंखों में गति और सद्गति वाली दुनिया घूमती है। दुर्गति की दुनिया से किनारा कर बुद्धि उसमें लगा दी है। ऐसे न समझो कि यह कल्पना है, आंखों से नहीं देखते हैं। लेकिन इसमें संशय नहीं होना चाहिए। जब होगा तब तो प्रैक्टिकल हो ही जायेगा। यह बतलाने वाला कोई मनुष्य या कोई ठगने वाला थोड़ेही है जिसमें कुछ नीचे-ऊपर हो । हमारा गुरु निराकार है - यह कब भूलो मत। जब भूलते हैं तब छोटे-छोटे संशय आते हैं। अगर इन आंखों से देखने की चीज हो फिर तो कोटों में कोई क्यों हो, सब जान जायें। यही गुंजाइस है, इसमें भूलो मत । जो कुछ होना है वह तो होना ही है। बनाने का समय अब है। अब इतना समय नहीं है जो कोई मर जाए फिर दूसरे जन्म में आकर यह ज्ञान लेवे । छोटा बच्चा तो ज्ञान ले नहीं सकता। इसलिए ही कहते हैं कि यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है। ऐसे भी नहीं कि कोई अब मरे तो जन्म नहीं लेगा। लेकिन पढ़ाई का समय यह है। बाप कहते हैं - मैं वृद्ध तन में आता हूँ। उसके ही अनेक जन्मों की कहानी सुनाई है। अगर ड्रामा के राज़ को समझें तो सब बातें बुद्धि में आ जाएं।