Mamma's Murli - gyan-sitar-41
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१४.१०.६२
सबको माया के बंधनों से मुक्त करना - यह परमात्मा का ही निराला पार्ट है
गीत- आखिर वह दिन आया आज… ।
ओम् शान्ति। बेहद के बाप ने अब अपनी बुद्धि को बेहद में अथवा बेहद की नालेज में फैला दिया है क्योंकि अपनी बुद्धि अब बेहद में स्थित है। भल हम देखते शरीरों की तरफ हैं लेकिन इस शरीर में देखते हैं आत्मा को, जो आत्मा फिर उस बेहद बाप की सन्तान है। तो हमारी बुद्धि में धारणा क्या रही ? सुनने वाली, देखने वाली आत्मा है। इसको कहा जाता है सोल-कॉन्सेस । हमारी बुद्धि में है कि हम आत्मा इन कानों के आधार से सुनती हैं और आत्मा जो सुनाती है, वह परम-आत्मा से जो सुना है वही सुनाती है। बुद्धि में याद है कि हम परम-आत्मा की सन्तान हैं। तो यह एक ही सत्संग वा स्कूल है जिसमें हम सुनने और सुनाने के समय परमात्मा को ही याद करते हैं। बाकी जो भी हैं वह शास्त्रों को या शास्त्र सुनाने वालों को याद करते हैं। परन्तु हमारी बुद्धि बेहद के बाप में रहती है क्योंकि हमको सुनाने वाला वही है। फिर चाहे किसी द्वारा सुनें, चाहे वह सुनावे ।
हमको पढ़ाने वाला स्वयं गॉड है जो नॉलेजफुल है। इस नॉलेज को पढ़ा भी वही सकता है जो इस चक्र के आदि-मध्य-अन्त को जानता है। नॉलेजफुल वही है और हम भी मास्टर नॉलेजफुल हैं। हम उनका सुनकर सुनाते हैं। वही जागती ज्योत है जो कब बुझता नहीं है। गति-सद्गति-दाता, पतित को पावन करने वाला – यह महिमा उनकी है। बाबा के गुण वा शिफ्तें कोई मनुष्य अपने ऊपर रखा नहीं सकते। यह महिमा एक की है, लेकिन यह महिमा मनुष्य अपने पर ले आये हैं। इसलिए अब कहते हैं कि हम, तुम, सब में परमात्मा है। लेकिन परमात्मा की शिफतें ही अलग हैं और मनुष्य की शिफ्तें भी अलग हैं। फिर मनुष्य के कर्तव्य भी भिन्न-भिन्न हैं, एक न मिले दूसरे से। सब धर्म-स्थापकों का भी पार्ट अलग-अलग है। सबकी रस्म-रिवाज अलग-अलग है। मैसेन्जर्स तो सब कहते हैं लेकिन सबका मैसेज एक नहीं हो सकता है।
जैसे हम आत्मायें पार्ट बजाने आती हैं, वैसे परमात्मा भी इस स्टेज पर एक बार पार्ट बजाने आता है। गॉड को मुफ्त में ऊंचे ते ऊंचा नहीं कहा जाता लेकिन उसने एक्ट की है। सर्व आत्माओं को वापस ले जाना, गति-सद्गति करना, नई दुनिया को क्रियेट करना – यह उनका स्पेशल कार्य है। जैसे हम आत्मायें यदि ऊंचे कर्म करती हैं तो बाप के पास भी ऊंची हैं और कारपोरियल दुनिया में भी इतना ऊंचा बनते हैं। जैसे गांधी की भी कर्तव्य पर महिमा चलती है। परमात्मा ने भी जबरदस्त पार्ट बजाया है जिसमें सबका संबंध आ जाता है। सभी आत्माओं को भेजने वाला और फिर वापस ले जाने वाला वही है। माया के बंधनों से छुड़ाने वाला लिबरेटर - यह काम कोई मनुष्य नहीं कर सकता ।
इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरुनानक जी आदि सबको धर्म के बंधन में जरुर आना है। नहीं तो, वृद्धि कैसे हो ? परमात्मा आता है हमको बंधन-मुक्त करने । तो उनका पार्ट निराला हो गया। हम जाते हैं तो फिर वापस भी आते हैं। सबके आने का टाइम अपना-अपना है जिससे फिर वृद्धि होती रहती है। तो क्या वृद्धि ही होती जायेगी या कभी एन्ड भी होगी ? एन्ड करने वाला तो वही परमात्मा है जिसका हर एक आत्मा के साथ संबंध है। वही आकर माया के बंधन से छुड़ाते हैं। एक तो है यह ज्ञान-योग की तरकीब, दूसरी हैं सजायें। सजाओं से पूर्ण जीवन्मुक्ति का सुख नहीं पायेंगे। सबको माया से बंधनमुक्त तो करते ही हैं, फिर सबको वर्सा वा प्रापर्टी भी देते हैं। सबसे श्रेष्ठ पार्ट वह है जिसमें सदा सुख है। जो स्पेशल चीज बाप से मिलती है, जो एक ही तरीके से मिलती है। बाकी ऐसे नहीं कि अनेक योगी, अनेक ज्ञानी हैं। योग उनको नहीं कहेंगे जो टांगे-बांहे उठाकर योग करें। योग करके जिस्म को बीमारियों से सफा देते हैं। वह तो और बात है। लेकिन रुहानी सफा देने वाला एक है। उनका रास्ता भी एक है। भल किसकी भावना पूर्ण करने के लिए कोई का भी साक्षात्कार करा देते हैं।
लेकिन बाप जो है, जैसा है - उसे ओरीजनल समझना है। तो यथार्थ जानने से यथार्थ रिजल्ट पायेंगे । हम योग और ज्ञान उनसे ही सीख रहे हैं और उनको जानना भी जरुरी है। यह है सारा रचता और रचना का ज्ञान जो नटशेल में बुद्धि में रहना चाहिए, जिसको स्वदर्शन-चक्र कहा जाता है, जो चलता ही रहे। यह स्वदर्शन-चक्र चलता रहेगा तो विकारों के सिर कटते रहेंगे। बात तो इतनी है लेकिन विस्तार बहुत है। परन्तु सार बुद्धि में बिठाने के लिए विस्तार समझाना पड़े । जब तक यह पढ़ाई है तो पढ़ते रहना है। फिर यह कोर्स पूरा हो जायेगा। जहाँ जी, वहाँ पी। बाप आकर टाइम ही ऐसा लेते हैं। छोटे बच्चे को भी कहेंगे - जहाँ जी, तहाँ पी। क्योंकि इस समय बड़े-छोटे सब एक जैसे हैं।
अब तो दुनिया की एन्ड है। अगर कोई की बुद्धि में आ जाए कि अब एन्ड है और आदि क्या होने वाली है- तो कितना तकदीरवान बन जाए ! अब दुनिया की आयरन एज है। आयरन एज के बाद फिर मृत्यु होगी। मृत्यु माना ही डिस्ट्रक्शन । फिर मृत्यु के बाद नये होंगे। अब इस दुनिया में अकाले मृत्यु होती है। इसलिए छोटा बच्चा भी मर जाता है। ईश्वरीय कानून है बाल-युवा-वृद्ध होना है । परन्तु अभी सब डिस-आर्डर में चल रहे हैं। तो इस स्कूल में यह सब पढ़ाइयां हैं। इससे हमारे कर्मों में बल आता है जिससे हम कर्मक्षेत्र पर डबल क्राउन बनते हैं। लाइट और रत्न-जड़ित – दोनों पॉवर आती हैं। वह पॉवर बाप दे रहे हैं जो आत्मा धारण कर रही है। फिर आत्मा आकर शरीर के साथ सुख पाती है। अब बाप से विल ले रहे हैं। जो जितना स्प्रीचुअल फादर से संबंध जोड़ेंगे उतना विल-पॉवर मिलेगी। जब बुद्धि में यह बातें हों तब बेहद की खुशी रहे । इनसे ऊंची पढ़ाई और कोई नहीं।