Mamma's Murli - gyan-sitar-45

२९.१०.६२

हम डायरेक्ट परमात्मा की गोद के बच्चे वर्से के हकदार हैं

गीत:- ले लो दुआयें माँ-बाप की…।

ओम् शान्ति। अभी यह तो समझा है कि दुआ, दया, कृपा, आशीर्वाद … यह भक्ति-मार्ग के शब्द हैं। यह ज्ञान-मार्ग में नहीं काम आ सकते हैं क्योंकि यहाँ संबंध ही निराला है। भक्ति-मार्ग में तो गुरु-शिष्य आदि-आदि हैं। लेकिन यहाँ यह संबंध नहीं हैं । भल परमात्मा को सतगुरु भी कहते हैं लेकिन हम जानते हैं कि वह हमारा बाप है, टीचर भी है तो गुरु भी है। हमारे सभी संबंध एक से ही हो गये हैं। वह टीचर, गुरु, धर्मराज सब है, परन्तु है हमारा बाप । इसलिए कोई बाप से दया-कृपा नहीं माँगते हैं। बाप पर हमारा हक है, हम अपना हक जमाते हैं। हम उनके प्रैक्टिकल गोद के, धर्म के बच्चे आकर बने हैं। वह हमको गोद में लेने आया है। भले भक्ति-मार्ग में भी कहते हैं कि हम तुम्हारी सन्तान हैं परन्तु वह हक नहीं जमाते हैं। हमने तो प्रैक्टिकल में चैतन्य में उनको अपना बाप बनाया है। गोद का बच्चा भी तो हक रखता है। मैं उस बाप की मिलकियत का वारिस हूँ। तो यहाँ कृपा की बात नहीं। परन्तु हमको लेना ही है, तो उनको देना ही है।

बाप खुद बैठ पढ़ाते हैं, जिससे जन्म-जन्मान्तर के लिए हमारी आजीविका सदाकाल सुख की बनती आती है। तो उसको हमने बाप बनाया है। ऐसा अपने पास नशा होना चाहिए कि एक हम ही बाप के प्रैक्टिकल में बने हैं ! फिर ऐसा टीचर भी किसके पास होगा ! उनकी पढ़ाई से हम मनुष्य से देवता बनते हैं। 'देवता' शब्द सुन समझते हैं कि देवता भी क्या हैं ? लेकिन देवता माना सर्व प्राप्ति । गुरु नानक ने भी उनकी ही महिमा की है। उनकी अंगुली एक तरफ दिखाते हैं कि एक को याद करो। लेकिन अब तो बाप आया है, डायरेक्ट कहता है कि "मुझे याद करो। मेरा परिचय मैं ही देता हूँ। मेरी बात मैं ही जानता हूँ। तुम्हारी बातें भी मैं ही जानता हूँ कि तुम्हारा किसमें कल्याण और किसमें अकल्याण है।” धर्म के पिताएं भी जो आते हैं वह भी अपने बच्चों के पिता हैं। लेकिन यह तो उन्हों का भी पिता है। क्राइस्ट ने भी ऐसे नहीं कहा कि मैं परमात्मा हूँ। सबने कहा है- मैं उनका बच्चा हूँ। सब अथॉरिटी का मालिक वह है और हम उनके डायरेक्ट बने हैं ! हमारा धर्म बहुत ऊंचा है, जिसके लिए स्वयं परमात्मा को ही आना पड़ता है। और धर्म स्थापन करने में परमात्मा को आने की जरुरत नहीं ।

एक देवी-देवता धर्म ही है जिसको गॉड-गॉडेज कहते हैं। और धर्म वालों को गॉड-गॉडेज नहीं कहेंगे। उन्हों का अपना-अपना नाम है – क्रिश्चियन, बौद्धी, आदि-आदि। लेकिन परमात्मा द्वारा जो धर्म स्थापन हुआ उन पर नाम पड़ा है गॉड-गॉडेज क्योंकि सभी मनुष्यों में बड़े हो गए। हमारा धर्म स्थापन भी वह आकर करता है जो खुद जन्म-मरण में नहीं आता है। तो पालना भी दूसरों से कराते हैं। उनको पालनहार, विनाश, स्थापन-कर्ता कहते हैं। अब खुद उपस्थित हो कार्य कर रहे हैं। हमको ऐसा लायक बनाते हैं। यह जो अभी की पालना चलती है वह कोई परमात्मा की नहीं है। इसमें तो कर्मों अनुसार किसको अच्छी रोटी मिलती, किसको नहीं भी मिलती है। यह कोई परमात्मा की पालना नहीं है। हम जानते हैं कि सतयुग में जो हमको पालना मिलती है वह परमात्मा की ही मिलती है। अभी के पुरुषार्थ का वह फल है। सच-सच तो वही परमात्मा की पालना है। अभी सुख की पालना नहीं है – कभी दुःख तो कभी सुख । हम अभी ही अपना पूरा एकाउन्ट भर लेते हैं, फिर आधा कल्प खाते रहते हैं। इसमें दया, कृपा की कोई बात नहीं ।

कोई आते हैं, मिलते हैं तो कहते हैं - हमारे प्रति शुभ भावना रखना । अब ऐसे तो है ही नहीं कि हमारी अशुभ भावना है। हम तो सबके शुभचिंतक हैं -- क्यों न यह भी अपनी जीवन बनाये, आबाद करे। हमारी बुद्धि में किसके लिए भी डिफरेन्ट भावना नहीं है। यह सिर्फ कहने की रस्म चली आती है जो गुरु लोगों के आगे जाकर कहते हैं। फिर उन्हों की अल्प भावना पूरी भी होती है, तब यह रस्म चली आती है। अब हम तो इन बातों में जाते नहीं। हमको तो बाबा से सारा हक, सारा वर्सा लेना है जो फिर वहाँ ऐसी इच्छा नहीं रहती । यहाँ तो इच्छाएं लगी रहती हैं। लेकिन यह जो बातें सुनी हैं कि इच्छा की अविद्या, तो कहते हैं कि इच्छाओं को मारो। तो हठ से मन को मारते हैं। परन्तु जिसकी अप्राप्ति है, तो जरुर इच्छा उठती है। धन न हो, तो जरुर इच्छा होती है। इच्छा घटती नहीं है। हमारे में अप्राप्ति क्यों होती है ? उसके लिए पुरुषार्थ करना है। तो यह भी ज्ञान है। इच्छा दुःख नहीं देती, लेकिन अप्राप्ति दुःख देती है। हमारे पास अप्राप्ति न हो - उनका साधन चाहिए। इच्छाओं के लिए कहते हैं कि मन को मारो । लेकिन माया को मारना है। वैसे संकल्प तो भगवान में भी हैं जिसने इतना ज्ञान दिया है। लेकिन भगवान के संकल्प ऊंचे हैं। इतनी नॉलेज देकर इतना ऊंचा बनाया है ! देवताओं को भी राजधानी चलाने के लिए मन-बुद्धि है। जड़ थोड़ेही बनना है। अब जप-तप-योग के लिए यह नहीं कि मन को मारो लेकिन हम तो चलते-फिरते उनकी याद में रहते हैं अर्थात् तप कर रहे हैं।

हम ही राजऋषि है, राजाई के लिए तप करते हैं। इस तप के बल से हमको राजाई मिलती है । हमने यह राजाई किससे छीनकर नहीं ली है। अगर छीन कर ली हो तो पहले जिसके पास थी उनकी भी महिमा होनी चाहिए। तो इसका मतलब राजाई लक्ष्मी-नारायण से ही शुरु होती है। कलियुग में इस योगबल की तरकीब से इतनी बड़ी राजाई लेते हैं। फिर कहते हैं कि योगबल से बच्चे कैसे पैदा होते हैं ? लेकिन योगबल की ताकत से जब राजाई ली है तो वह ताकत वहाँ भी चलती है। यह संसार है भोग बल का और वह है योगबल का। यह डबल ताज भी योगबल से पाया है। अभी हम ब्राह्मण बने, फिर देवता बनते हैं। शूद्र से देवता नहीं बन सकते हैं लेकिन पहले शूद्र से मरकर पवित्र ब्राह्मण बनना है। अब हरेक अपने से पूछे कि मैं ब्रह्मण बना हूँ ? ब्राह्मण बनना कम बात नहीं है। ब्रह्मा की मुख-वंशावली बनना है।