Mamma's Murli - gyan-sitar-52
Saving in progress..
You can now read this murli without Internet.
You can read this murli without Internet.
in order to be able to read it without internet.
३.९.६३
पांच विकारों से निवृत्त होकर रहना ही सच्चा महात्मा बनना है
अब तो हमें दर्पण मिला है जिसमें हम देख सकते हैं कि पाप क्या है पुण्य क्या है। रूहों का बाप यह दर्पण देते हैं कि बच्चे देखो यह आत्मा जो पुण्य आत्मा थी वह पाप आत्मा कैसे बनती है। पाप कराते हैं यह पांच विकार उनसे छुड़ाकर पुण्य आत्मा बनाना यह परमात्मा का ही काम है। तो आत्मा ही पुण्यात्मा, पापात्मा बनती है। ऐसे नहीं कि आत्मा निर्लेप है। यह तो जो खाने पीने वाले हैं उन्होंने अपना रास्ता खोला है कि शरीर ही सब कुछ करता है । अगर ऐसा होता तो जब आत्मा चली जाती है फिर शरीर कुछ कर्मभोग भोगे । नहीं। आत्मा में ही अच्छे बुरे संस्कार हैं तो भोगती आत्मा है परन्तु शरीर द्वारा । इसलिए आत्मा परमात्मा एक नहीं कहेंगे अगर आत्मा परमात्मा एक कहें तो परमात्मा ही पुण्यात्मा और पापात्मा हो गया। परन्तु परमात्मा तो पाप, पुण्य से न्यारा है। आत्मा ही पुण्यात्मा, धर्मात्मा बनती है। कई समझते हैं जो वेद शास्त्र पढ़ा हुआ है वो धर्मात्मा है परन्तु धर्मात्मा बनना तो बड़ी स्टेज है। उसमें तो पूरा ५ विकारों से निवृत्त हो चलना है। हमारी आत्मा के ऊपर जो अनेक जन्मों के पाप की मैल है उनको छुड़ाना है और अनेक जन्म के लिए स्वच्छता धारण करनी है। यहाँ कोई घर छोड़ने की बात नहीं है परन्तु विकर्मों से छुटकारा करना है। अनेक जन्मों के पापों को दग्ध करना है एक जड़ निकाल दूसरी जड़ लगानी है। इसके लिए रोज अपने आपको देखना है कि हमारे में कौन-कौन से दाग हैं जो मिटाने हैं। ५ भूतों का दाग निकल जाये तो खूब सूरत बन जायें। वह तो है शरीर की सुन्दरता । यह पवित्रता है रुह की सुन्दरता। देखों देवताओं की रूह पवित्र है तो शरीर भी कितने सुन्दर हैं। तो शरीर और रूह को हम सुन्दर बना रहे हैं। जिसका मदार सारी दिनचर्या पर है। अच्छे कर्म का फायदा भी १० गुणा है तो बुरे कर्म की सजा भी १० गुणा है। तो सारे दिन की दिनचर्या में अपने मन-वचन-कर्म को देखना है। अपने ऊपर ध्यान रखना है कि हमारे में कोई विकार तो नहीं है ? बाप का फरमान है कि कोई भी बापदादा की अवज्ञा न करो । अवज्ञा का भागी बनने से बहुत भारी चोट लगती है। जो बच्चे पुरुषार्थी हैं उनको मास मास की रेग्युलर दिनचर्या लिख माँ बाप के पास भेजनी चाहिए कि हम सारे दिन में, २४ घण्टों में कितना याद करते हैं। याद की भी परसेन्टेज लिख भेजनी चाहिए । रात्रि सोने के पहले १० मिनट उनकी याद में बैठ सोना चाहिए तो स्वप्न भी ऐसे अच्छे आयेंगे और नींद भी उस स्थिति में गिनी जायेगी । घड़ी-घड़ी अपने दर्पण को देखते रहना है। विवेक से रांग, राइट को जज कर चलते चलो । विवेक को मारकर चलना कोई जीवन नहीं। कोई भी बात अपने कन्ट्रोल से बाहर नहीं होनी चाहिए। देखो अपना मरना, जीना सब कन्ट्रोल में है तो कोई भी कर्म इन्द्रिय लूज नहीं होनी चाहिए। अपने ऊपर कन्ट्रोल रखना ही अपना उपकार करना है । समझा।