Murli de Mamma - gyan-sitar-08

२३.१२.५८

संस्कारों के आधार पर शरीर की बनावट

ओम् शान्ति । परमात्मा द्वारा हम मनुष्य आत्माओं को और परमात्मा को जान चुके हैं। परमात्मा का परिचय माना रचता को जानना और मनुष्य का परिचय माना रचना को जानना। मनुष्य ही मुख्य हैं। सारी क्रियेशन मनुष्य के पिछाड़ी आ जाती है। अब हम जानते हैं कि मनुष्य ही आसुरी और दैवी स्वभाव वाला बनता है। देवताएं भी मनुष्य हैं, असुर भी मनुष्य हैं। ऐसे नहीं कि असुर कोई भयानक शक्ल वाले होते हैं। अथवा देवताओं को तीन नेत्र दिखाते हैं। ऐसे कोई मनुष्य को ज्यादा अंग नहीं होते हैं। सारी स्वभाव की बात है। देवताओं के और असुरों के संस्कार अलग-अलग हैं। असुर कहा जाता है ५ भूतों को। यह ५ भूत मनुष्यों में हैं तो मनुष्य को असुर कहा जाता है। इससे ही मनुष्य दुःखी होते हैं। अभी इन संस्कारों को बदलना है जो पूर्ण ज्ञान से ही बदलेंगे। इन ५ भूतों से छूटने की शफा देने वाला एक ही समर्थ परमात्मा है। परमात्मा ही मनुष्य से देवता बनाते हैं।

अब हम आसुरी स्वभाव को पलट दैवी स्वभाव की धारणा कर रहे हैं। पहले तो आसुरी स्वभाव के कर्मबन्धन से पूरा छूटना है अर्थात् संस्कार बदलने हैं। देवताओं को सर्वगुण सम्पन्न कहा जाता है। उन्हों के शरीर भी सुन्दर हैं क्योंकि शरीर की बनावट भी संस्कार के आधार पर होती है। कोई अन्धा-लूला होता है तो कहते हैं कर्मों का हिसाब है। तो संस्कारों का आधार रहा ना। अब परमात्मा आत्माओं को पवित्र बनाते हैं, तो शरीर भी सुन्दर मिलते हैं। अब आत्माएँ इम्प्योर हैं तो शरीर भी इम्प्योर हैं। अब हम दैवी स्वभाव धारण कर देवता बनते हैं।

यह है संगम । देवताएँ और असुर अब हैं। असुरों के जमाने में देवताओं की बात ही नहीं है, देवताओं के ज़माने में असुरों की बात नहीं रहती है। यह है संगम, जहाँ हम एक तरफ़ आसुरी स्वभाव को छोड़ दूसरे तरफ़ शुद्ध संस्कार धारण करने के प्रयत्न में हैं। संस्कार बदलाना तो एक परमात्मा समर्थ का ही काम है। संस्कार भी बहुत जन्मों के कड़े हैं। बहुत जन्मों के संस्कार जो फोर्स से चलते आ रहे हैं, अब उस फोर्स को मिटाना परमात्मा का ही काम है। बहुत कहते हैं कि पुरुषार्थ भी करते हैं परन्तु संस्कार ऐसे कड़े हैं जो मिटते नहीं हैं। यह सारा संस्कारों के ऊपर अनेक जन्मों का बोझ है, उनको अब मिटाना है। जितना हम बाबा को याद करेंगे उतना विकर्मो का बोझ कम होगा। अब ही सर्वगुण सम्पन्न, १६ कला सम्पन्न बनना है। कई पूछते हैं - १६ कला कौनसी हैं ? इसका मतलब है पूर्ण कलायें। मनुष्य के लिए और ज्यादा स्टेज ही नहीं है। जैसे कहा जाता है १००% । यही सम्पूर्णता है। उनके ऊपर कोई कलाएं नहीं हैं। बाकी कोई १६ गुण आदि नहीं हैं। सब कलाओं से सम्पन्न रहते हैं। रत्न जड़ित ताज और लाईट का ताज - दोनों रहते हैं। इनके ऊपर कोई ताकत नहीं रहती है। जिस्मानी और रुहानी- दोनों ताकत रहती हैं। तो हमारा पुरुषार्थ यह है। सब पॉवर्स परमात्मा द्वारा अपने हाथ में लेते हैं।

अभी हम १६ कला सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी बन रहे हैं। सन्यासियों को सम्पूर्ण निर्विकारी नहीं कहेंगे क्योंकि जन्म फिर भी विकारियों से लेते हैं। तो सम्पूर्ण निर्विकारी नहीं ठहरे। देवताएँ जन्मते भी निर्विकार से, रहते भी निर्विकारी और शरीर भी कर्मबन्धन-वश नहीं छोड़ते । यह स्टेज परमात्मा द्वारा मिलती है। वहाँ दुःख का नाम-निशान नहीं रहता है। मनुष्य समझते हैं - देवताएं भी लड़ते थे । परन्तु हम जानते हैं कि देवताओं में लड़ने का स्वभाव ही नहीं है। उन्हों को सर्वगुण सम्पन्न कहा जाता है। उस समय का इतना प्रभाव है। अब फिर चक्र को फिरना है। सब कलाओं में मनुष्य सम्पूर्ण अब हो सकता है। परमात्मा इस समय आकर सम्पूर्ण आनन्द, सम्पूर्ण सुख देते हैं, तब ही सुखदाता, आनन्द-दाता कहा जाता है। सतयुग में जब १६ कला सम्पूर्ण हैं तो उस समय महिमा गाने की भी बात नहीं रहती है। जब वह नीचे आते हैं तब महिमा गाई जाती है कि ऐसे १६ कला सम्पूर्ण भी होकर गये हैं। उस समय गाये कौन ? दुनिया ही उस अवस्था में है।