Murli de Mamma - gyan-sitar-11
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२९.१२.५८
कर्मयोग सन्यास करने का यथार्थ तरीका
ओम् शान्ति। परमात्मा द्वारा इस समय जो ५ विकारों का सन्यास सिखाया जाता है, उसके भी अर्थ को समझना है। क्योंकि हमारा कोई कर्म-सन्यास नहीं है। हमारा है कर्मयोग - सन्यास । हम सन्यास करते हैं ५ भूतों का। वह कर्म-सन्यासी रचना को मानते नहीं हैं। वह तो ज्योति ज्योत में समाने अथवा मुक्ति पद को ही मुख्य मानते हैं। हम परमात्मा द्वारा जानते हैं कि मनुष्य का जीवन्मुक्ति ही स्टेटस है। उनको कैसे प्राप्त करें, सो परमात्मा ही आकर सिखलाते हैं।
कई बिचारे मूँझ पड़ते हैं। सुनते हैं ना - देह सहित देह के सब सम्बन्धों का सन्यास करना है। तो समझते हैं कि फिर सम्बन्धियों से हमारा कोई तैलुक नहीं। जैसे सन्यासी घृणा रख चले जाते हैं। यहाँ तो समझाया जाता है -- चैरिटी बिगन्स एट होम। जैसे हम ज्ञान से मालामाल हो रहे हैं तो औरों को भी मालामाल करना है। यही हमारा कर्म है। जबकि हमारी नालेज, हमको लक्ष्य ही देती है कि कर्मयोग - सन्यास करो, तो इसमें सन्यासियों के माफिक सबसे तोड़ना नहीं है। सम्बन्ध जरुर रखना है। परन्तु विकारी सम्बन्ध का नाता बदलकर इस पवित्र सम्बन्ध में रहना कि हम उस बाप की सन्तान हैं, वह हमको मालामाल कर रहे हैं। तो पहले घर वाले जिनके साथ नाता था, जिन्हों से सेवा ली है, उन्हों के रिटर्न में यह ऊंची सर्विस करनी है। तोड़ने का मतलब यह नहीं कि घृणा करें। हमारा काम है सेवा करना। बाप भी कहते हैं - मैं वर्ल्ड की सर्विस पर उपस्थित हूँ।
आगे जो सम्बन्ध था उसमें दुःख देना, दुःख लेना होता था। अब सुख देना है, सुख लेना है। अल्पकाल का सुख तो अनेक जन्म लेते और देते आए, अब हमारी सेवा है सदाकाल सुख देने की। जबकि अनुभव कर रहे हैं तो अनुभवी दूसरों को देने के सिवाए रह नहीं सकते। वह समझेंगे कि और भी लाभ उठावें, पहले घर वालों को मालामाल बनावें । हमारा सम्बन्ध इतना रहेगा, इसमें कर्मबन्धन की बात नहीं है। यह सम्बन्ध तो जोडना है। यह भी तुम देख रहे
हो कि इस नॉलेज में आने से फिर परीक्षायें भी आती हैं। क्योंकि यह नॉलेज भी नई है और उनके चरित्र भी नये हैं। उन्होंने शास्त्रों द्वारा कुछ और बातें सुनी हैं और परमात्मा जो प्रैक्टिकल पार्ट बजाते हैं, इन चरित्रों को तो हम ही जानते हैं। इसलिए इन बातों को समझाने में युक्तियाँ भी रखनी पड़ती हैं। सीधा ही किसको कहेंगे कि हमको परमात्मा ऐसे कहते हैं, तो समझेंगे -- पता नहीं यह किस चक्र में पड़ा है। सबके विचार, संस्कार अपने-अपने हैं ना। तो देखकर चलना है। डॉक्टर सबको एक इलाज तो नहीं देंगे। तो यहाँ भी युक्ति से काम लेना पड़ता है। झट से जोश में नहीं आना है कि हमारा कोई से कनेक्शन नहीं है।
बाबा तो कहते हैं कि पुरानी दुनिया को नई दुनिया बनाना है। बाप ने भी आकर तमोगुणी आत्माओं से संबंध जोड़ा है। तमोगुणी आत्माओं का ही बाप-टीचर-गुरु बना है, उन्हों को सद्गति देने के लिए। दुर्गति वालों का ही तो गुरु बनेंगे ना, जिनको इस नॉलेज की आवश्यकता है। ऐसी आत्माओं से सम्बन्ध जोड़ उन्हों को वर्से का हकदार बनाते हैं। हम भी इस कार्य में निमित्त रहेंगे । यही सर्वोत्तम सेवा है। हरेक लेने के लिए हकदार है, हम देने के लिए हकदार हैं। इन बातों को अच्छी रीति समझना है। न समझने के कारण घबरा जाते हैं। इसलिए बार-बार सावधानी मिलती है। जबकि हाथ में हाथ दिया है, तो वह बतलायेंगे कि कैसे कदम उठाओ। हमारे ईशारे पर चलने से ही तुम्हारा कल्याण होगा। हर एक का पोतामेल उनके पास है। जो पूरा हाथ देते हैं उन्हों का साकार में आकर सब पोतामेल लेते हैं।
यह नॉलेज है ही प्रैक्टिकल की । ५ भूतों का सन्यास करना है। मैली आत्मा को साफ करना है। कर्मबन्धन से छूटने का तरीका रुहानी बाप ही सिखलाते हैं। अटेन्शन देना पड़ता है, तब रोशनी मिलती जायेगी । सन्यास अक्षर पुराना है। परन्तु यह कर्मयोग - सन्यास कोई ने सिखलाया नहीं है। अब हम सीख रहे हैं। उनके डायरेक्शन में ही कल्याण है। इसमें घबराने की ज़रुरत नहीं है। बाकी मंजिल बड़ी है। जीते जी. पूरा मरना है। बाप के पूर्ण ईशारों पर चलना बच्चों का काम है। प्रैक्टिकल की बात है। उनको जीवन दी है तो सब कुछ उनके सामने रखना चाहिए। समझाने वाला बैठा है, यह तो जीवन बनाने की बहुत ऊंची बात है। बाकी किसके भाग्य में नहीं है तो उसकी बात ही नहीं है। अपना काम है पुरुषार्थ करना और कराना।