Murli de Mamma - gyan-sitar-43
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१९.१०.६२
ज्ञान और योगबल से कर्मातीत अवस्था को पाने वाले ही इज्जत से जाते हैं
ओम् शान्ति । अपनी बुद्धि अभी बहुत दूर निकलती जा रही है। दूर का मतलब है इस पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जहाँ इस पुरानी दुनिया का अंश-मात्र भी नहीं है। ऐसे नहीं कि वहाँ भी माया का थोडा अंश रहता है। नहीं। बाप समझाते हैं कि वहाँ माया का अंश भी नहीं है। प्रकृति है लेकिन माया नहीं है। माया का फिर अपना समय है। इसलिए इस बुद्धि को ५ विकारों से दूर हटाना है। बाप कहते हैं कि अब तुम्हारा काम मेरे से है। इसलिए कर्मातीत अवस्था में आना है। जैसे घर से आत्मा अशरीरी आई ऐसे बनना है। आत्मा ने यह चोला पीछे धारण किया है। आई तो भी अशरीरी, जाना है तो भी अशरीरी । इसलिए देह और देह सहित सब संबंध तोड़ो क्योंकि अब वापस जाना है। तो ज्ञान-योगबल से अशरीरी होने में फायदा है। जाना तो सबको है परन्तु इज्जत से जाने का इजाफा मिलेगा और ऐसे ही जाने से फिर दण्ड के भागी बनेंगे। बाकी उनका इजाफा इतना है जो कहते हैं कि तुम स्वर्ग के मालिक बनेंगे, फिर शरीर स्वर्ग में मिलेगा। अब तो एक-एक प्वाइन्ट की टैम्पटेशन का पता है। हर एक सब्जेक्ट से फायदा अलग-अलग है - ज्ञान से अलग, योग से अलग। और इस करने से टैम्पटेशन यह है कि क्यों न इज्जत से बाप के साथ जायें ? इस शरीर के साथ संस्कार या कर्मबन्धन का खाता लगा हुआ है, उनको काटना है और जैसे कर्मातीत थे वैसे होकर जाना है।
अभी हम सारे ड्रामा को जानते हैं। कहा जाता है कि आत्मा, परमात्मा अलग रहे बहुकाल…। तो जो आत्मा बहुतकाल से अलग रही है उनका मेल और जो थोड़ा समय रही है उनके मेल में भी तो फर्क रहता है। तो अब टोटल रचना और उसमें भी जो मुख्य-मुख्य हैं उनकी बायोग्राफी को जानते हैं। बाकी डिटेल जानने से, हर एक की जन्म-पत्री क्या है- उसकी क्या जरुरत है ? वह कहते हैं कि परमात्मा है तो सब बतावे ना । लेकिन वह सब बताने से क्या फायदा ? पहले सतो, रजो, फिर तमो स्टेज है। माया का भी पहले सुख है। माया आने से कोई झट से दुःख शुरु नहीं होता है। पहले १६ कला, फिर १४, फिर १२, फिर ८, आखिर अब तो कला ही निकल गई है। अब न आत्मा सतो है, न शरीर सतो है। अब बाप आकर फिर सब कलाओं में भरपूर करते हैं। तो आत्मा को शरीर अर्थात् काया भी ऐसी मिलती है । अभी हमारी चढ़ती कला है। यहाँ तो गैरन्टी है कि इतने जन्म बाप द्वारा राजधानी मिलनी है और फिर माया के पहले भाग में अर्थात् द्वापर में भी तुम सुख देखेंगे । तो टोटल सुख बहुत हो गया। तो क्यों न ऐसी नूंध बना दें ? मनुष्य फिर कहते हैं कि अभी कलियुग तो बच्चा है, घोर कलियुग तो पीछे आने वाला है। लेकिन यह नहीं समझते कि अति पीड़ा का थोड़ा टाइम चलता है। अगर बहुत समय चले तो पता नहीं लाइफ क्या हो जाए ! आगे पाकिस्तान, हिन्दुस्तान के बीच में जो झगड़ा चला वह बहुत समय तो नहीं चल सका ना । अब घोर कलियुग भी पीछे ही आना है जो थोड़ा समय ही चलेगा । अब सोचना चाहिए कि हमको तो बाबा मिला है ! दुःखी वह होंगे जिन्हों को कोई सहारा नहीं मिलेगा। यह जन्म अति दुर्लभ है क्योंकि बाबा आकर मिला है। जब दुनिया हाहाकार में होगी तो उस समय हम सुख में होंगे। तो अन्दाजा सुख का लगाया जाता है। तो क्यों न उस लाइफ का सोचें जिसमें गैरन्टी है कि हम तो सुखी रहेंगे लेकिन हमारे बच्चों के बच्चे अर्थात् २१ पीढ़ी सुख पायेंगे ।
हमारा अभी से ही परमात्मा की पालना का खाता शुरु होता है। हमको तो अभी बाबा ही खिला रहे हैं। हम ब्राह्मण तो ईश्वर का ही खाते हैं। फिर जन्म-जन्मान्तर भी उस बाप द्वारा ही पाया हुआ खायेंगे। श्री नारायण का बच्चा भी तो अभी की कमाई का खाते हैं। जन्म-जन्मान्तर माया के राज्य में हम कर्मों के हिसाब से मनुष्यों का खाते हैं। यह ज्ञान भी इस समय है। बाकी सतयुग में थोड़ेही यह ज्ञान रहता है। त्रिकालदर्शी अब हैं। भक्ति मार्ग में तो कहते हैं कि हम परमात्मा के बच्चे हैं, हमको परमात्मा खिलाता है। लेकिन वह तो ठगी है। अब तो हमने परमात्मा से डायरेक्ट संबंध जोड़ा है। वह हमको खिला रहे हैं। कोई पूछते हैं कि तुम्हारे यज्ञ का खर्चा कैसे चलता है ? बोलो - हमारा गुरु तो निराकार परमात्मा है, हमको खिलाने वाला वह है। लेकिन खिलायेंगे तो कोई के थू ना। देखो, हमारा बाबा कैसा है ! वह सर्वशक्तिवान है। हमको वह रुहाब वह नशा रहता है कि हमारा बाबा हर्ता-कर्ता है ? पुरानी दुनिया का हर्ता, नई दुनिया का कर्ता है। हमारे बाप को कोई बाप नहीं, वह सबका बाबा है।