Mamma's Murli - gyan-sitar-18

29/4/1959

याद का आधार ज्ञान है, साक्षात्कार नहीं

अभी हम आत्माओं को परमात्मा के द्वारा परोक्ष और अपरोक्ष साक्षात्कार होता जा रहा है। अपनी आत्मा के स्वदर्शन - चक्र का पता पड़ता जा रहा है। आत्मा के पते के साथ, परमात्मा का भी पता आ जाता है। इसको कहा जाता है आत्मा को स्व का साक्षात्कार। यह है चक्र। आत्मा आदि-मध्य-अन्त का चक्र कैसे लगाती है, वह नालेज से भी जानते और साक्षात्कार द्वारा भी। जो अनुभवी हैं वह कह सकते हैं – नालेज से जान सकते हैं कि आत्मा कैसे अपना चक्र लगाती है। भल साक्षात्कार हो भी परन्तु नालेज नहीं है तो साक्षात्कार कोई काम का नहीं है। मुख्य है नालेज पर। इसलिए यह आश भी नहीं रखना कि जब साक्षात्कार हो तब हम लक्ष्य को पकड़ सकें ।

याद का तैलुक ज्ञान से है। ज्ञान से ही हम उनके सारे कर्त्तव्य को जानते हैं। तो हम जानने से ही याद कर सकते हैं। ऐसे नहीं, सिर्फ साक्षात्कार में देखकर उस मूर्त का ध्यान करना है। उसकी बुद्धि में नॉलेज चाहिए । जितना आत्मा-परमात्मा की नालेज पूरा बुद्धि में बैठती जायेगी उतना याद स्वतः रहेगी । देखने का आधार याद से नहीं है। ध्यान लगाने की बात नहीं। जितना नालेज बुद्धि में घूमेगी उतना वह याद खींचेगी। ध्यान में जाने की बात ही नहीं। सारा स्वदर्शन - चक्र घुमाना है। आत्मा को अपना नालेज भी रहता है, परमात्मा का भी कर्त्तव्य, आक्यूपेशन बुद्धि में रहता है। तो यह है ही बुद्धियोग । जितनी नालेज की धारणा उतना याद की स्थिति कायम रहेगी। बिगर नॉलेज सिर्फ देखने से कुछ नहीं होगा।

बहुतों को रहता है – हम ज्योतिर्बिन्दु परमात्मा का साक्षात्कार करें तो बुद्धियोग में सहज बैठेगा । हम जानते हैं - वह हमारा बाप, टीचर, गुरु है। उनके कर्त्तव्य सहित सारा आक्यूपेशन हमारी बुद्धि में है । यह नालेज नहीं होगी तो याद रहेगी नहीं । साक्षात्कार से कनेक्शन नहीं। मुख्य है ज्ञान । याद अथवा योग भी तब बढ़ता है जब नॉलेज बुद्धि में घूमती है। नॉलेज बुद्धि में है तो याद खींचती रहेगी। याद को खींचना है नालेज की ताकत से । सारा राज बुद्धि में घूमता रहेगा । उसको ही स्वदर्शन चक्र कहा जाता है । नालेज से ही यह चक्र घूमेगा । तैलक इसका है ही नालेज से । तब आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हो ही जाता है। तो सारा मदार है ज्ञान पर। भल साक्षात्कार होता है, ठीक है, परन्तु कोई जरुरी नहीं। हमारी उन्नति ज्ञान और योग से होती है। हमारे पास पूरी नॉलेज है।

समझ न होने से वह चीज जैसे देखी न देखी। हमको सूरत पर ध्यान नहीं लगाना है। उनकी याद में नालेज की ही दरकार रहती है। बुद्धि उनके साथ जुटानी है जो ज्ञान का सागर है। कहा ही जाता है बुद्धियोग ।