Mamma's Murli - gyan-sitar-35
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८२ १८.९.६२
निश्चय के अटलता के बल से नई दुनिया की स्थापना
फकीरी में अमीरी याद है ना ? तो यह है फकीरी में, याद करते हैं अमीरी को। हम जो पूज्य थे वह फिर पुजारी बने। सबका यह अन्तिम जन्म है। एक हैं भक्त जो भक्ति-मार्ग वाले हैं और हम फिर वह भक्त हैं जो पुजारी से पूज्य बन रहे हैं। आत्मा भी पुरानी हो गई है तो शरीर भी पुराने हैं। अब फिर परिवर्तन आ रहा है । सतयुग में महाराजा-महारानी, प्रजा आदि सब होंगे । अब अपने को निर्णय करना है कि हमें क्या बनना है ? गुप्त वेष में राजधानी बन रही है। दुनिया नहीं जानती है कि लक्ष्मी-नारायण की राजधानी कैसे बनती है ? एक तो पूर्व में विनाशी धन दान करने से अल्पकाल की राजाई मिलती है, दूसरा लड़ाई से मिलती है। लेकिन यह फिर है सदाकाल के लिए सुख की राजधानी। इसमें न है विनाशी धन का बल, न लड़ाई का बल है, परन्तु सहज राजयोग के बल से राजधानी स्थापन होती है। तो कितनी ऊंच बात है ! अब यह कार्य हो रहा है । यहाँ कई आते हैं लेकिन जो अपने घराने के हैं वह तो चटक जाते हैं, बाकी तो आते-जाते रहते हैं।
अब भारत पर लक्ष्मी-नारायण के राजधानी पाने का समय आकर पहुँचा है। सौभाग्यशाली की बुद्धि में ही यह बात बैठती है। कई तो फिर कह देते हैं कि यह कल्पना का संसार बना बैठे हैं। परन्तु हम फिर समझते हैं कि यह जो सूर्य-चांद में अपना घर बनाने की सोच रहे हैं, वह अभी-अभी कल्पना हो जायेगी। यह दुनिया तो बदलनी है। अपने निश्चय के अटलता के बल से ही स्थापना हो रही है। इस बात को दुनिया नहीं जानती। हम ही सर्व समर्थ बाप द्वारा यह जानते हैं। क्या अकाले मृत्यु, दुःख-रोग आदि ऐसी ही मनुष्य की लाइफ होती है ?
काल को जीतने वाला भी मनुष्य होता है ना। अभी तो अकाले मृत्यु होती रहती है। वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होती है, समय पर ही सब होता है। क्या मनुष्य की लाइफ ऐसी होती है ? लोग तो कहते हैं - ऐसा होता ही आया है। लेकिन उन्होंने देखा ही यही है। परन्तु हमको तो बाबा ने दिखलाया है कि दुःख-अशान्ति का वहाँ नाम-निशान नहीं है। अब तो आत्माओं का खेल ही बिगड़ गया है। यह बाप, टीचर, पति आदि तो सब सम्बन्ध चलते आये हैं। अभी फिर बेहद का बाप कहते हैं कि सब सम्बन्ध मेरे से जोड़ो। नई दुनिया की रचना अब फिर से भगवान रच रहे हैं।
मनुष्य तो कहते हैं – यह सृष्टि अनादि है, सब दुःख आदि भी अनादि हैं। लेकिन भगवान ने नई दुनिया भी कैसे रची ? वह भी समझाते हैं। वह तो कहते हैं – पहले-पहले मिट्टी का पुतला था, फिर ऐसे हुआ, फिर सृष्टि बनी । लेकिन अब बाप समझाते हैं कि नई दुनिया कैसे तुम्हारे द्वारा बनाते हैं। बाप कहते हैं कि "यह कर्मक्षेत्र तुम्हारा है। तुम्हारी ही खेती है। भल लगवाने वाला मैं हूँ, परन्तु तुम अपना करो, मैं अपना करूँ।" अभी तो हद का सब समेटना है। ऐसे नहीं कि छोड़ो, परन्तु बुद्धियोग निकालो। अब तो बुद्धि में ऐसे ही सोचना है कि यह पुरानी दुनिया है, ऊपर जाना है और फिर वापस नई दुनिया में आना है। अब वह पुराना नाता न हो। अब अपने ठिकाने को याद करना है जो अपना निवास-स्थान था। अब वहाँ जाकर विश्राम पाना है। मूलवतन से चक्र लगाए फिर आकर स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अब बनना यहाँ है, सतयुग में तो होकर रहेंगे। लाइफ का मजा कुछ और है। मनुष्य कहते- ईश्वर का भाणा (मर्जी को) मीठा कर भोगना है। लेकिन यह और बात है। जो ईश्वर का भाना था वह तो अब बन रहा है। अब उसको पाना है। बाकी तो दिल खुश कर रहे हैं। यह ईश्वर ने नहीं दिया है, यह अपने कर्मभोग हैं। ईश्वर दुःख थोड़ेही देता है। अब उससे निकल और जो ईश्वर द्वारा मिल रहा है उसको अच्छी तरह लेना है। अच्छा । गुडमार्निन्नग ।