Mamma's Murli - gyan-sitar-37
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२१.९.६२
हमारी बातों का आधार कोई वेद-शास्त्र नहीं, स्वयं जानी-जाननहार बीजरुप परमात्मा है
इस समय सभी इंसान अन्धेरे में हैं। भगवान ही कहते हैं – सबका उद्धार करने मैं आता हूँ। साधू-सन्त सबका उद्धार करने वाला एक ही है। सबकी गति और सद्गति कब और कैसे आकर करते हैं- यह अब हमारी बुद्धि में है जो हम उनके द्वारा जानते हैं। यह भी जानते हैं कि गति, सद्गति अलग-अलग हैं। जब पार्ट में नहीं हैं तो उनको मुक्ति अथवा गति कहते हैं। ऐसे हो नहीं सकता कि पार्ट में आयें ही नहीं। फिर तो खेल की बात ही नहीं रही। कई तो ऐसे मानते हैं। परन्तु ऐसे हुआ नहीं है। धर्म स्थापन करने वालों को भी फिर पालना करनी है। अगर वे न होते तो उन्हों के धर्म ही न होते ।
अब सबकी कयामत होगी। यह भी पहले ज्ञान चाहिए कि मनुष्य के लिए प्राप्ति क्या है ? वह भी परमात्मा जानी-जाननहार बतलाते हैं कि अब हम उसी धाम में जाते हैं, जो फिर इस कलियुग में लौटते नहीं। बाकी ऐसे नहीं कि ज्योति में जाकर लीन होते हैं, फिर लौटते नहीं। यह संगम की बात है कि इस समय जो मेरे धाम में चलने का पुरुषार्थ करेंगे वह इस दुनिया में नहीं लौटेंगे। अब हम यह पुरुषार्थ कर रहे हैं कि फिर इस तमोप्रधान कलियुगी दुनिया में न लौटें। ऐसे नहीं, कारपोरियल दुनिया नहीं होगी। दुनिया तो रहती है परन्तु तमोप्रधान दुनिया नहीं होगी। तो हमारा इस अन्तिम जन्म में यही पुरुषार्थ है कि इस दुनिया में फिर जन्म न लें, जन्म लें तो नई दुनिया में लें।
अब यह बुद्धि में नॉलेज है कि मनुष्य के लिए वास्तविकता क्या है? परमात्मा संगम पर आकर यह नॉलेज दे रहा है। इस संगम को कोई जानते नहीं, इसलिए मुझते हैं । परमात्मा ने कहाँ से बात की- कलियुग से या सतयुग से ? यह नहीं जानते हैं । इसलिए वही आकर बतलाते हैं कि मैंने संगम पर आकर बात की है ताकि फिर से तमोप्रधान दुनिया में नहीं लौटें। अब हमारे लिए यह सब बातें प्रैक्टिकल हैं। बाबा भी प्रैक्टिकल कहते हैं कि बच्चे, अब मेरे धाम चलेंगे तो इस दुनिया में लौटेंगे नहीं। लोग यह भी नहीं जानते कि यही दुनिया सतोप्रधान थी, अब यही दुनिया तमोप्रधान है। न जानने के कारण कहते हैं – दुनिया में आना ही नहीं है। अब जिस धाम जाना है उस धाम जैसा बनना है। इसलिए वह तैयारी कर रहे हैं। इस दुनिया के संस्कार मिटा रहे हैं। अब हम नहीं कह सकते कि हम अंधकार में हैं। अपने पास रोशनी है। कहाँ से आये हैं, क्या करना है, किसको जीतना है, कैसे जीत पानी है - सब रोशनी है। ऊंचे ते ऊंचे बाप का आधार है। बाकी वेद-शास्त्रों का आधार नहीं है। क्योंकि सबको जानने वाला जानी-जाननहार मिल गया तो फिर आधार किसका ? पूछते हैं ना कि किसके आधार से बोलते हो ? जानी-जाननहार के आधार से । फिर विवेक वा अनुभव में आया हुआ है। मानो न मानो, यह सब सच्ची बातें हैं। जो सृष्टि का बीजरुप निराकार परमात्मा है उसके आधार से बोलते हैं। जिसके पास मनुष्य सृष्टि की नालेज है, वही आकर प्युरीफाइ बनाते हैं। अब सब बातें अपनी बुद्धि में हैं। फिर कोई माने तो जीवन्मुक्त, न माने तो मौत भी सामने है।
अब कोई मूंझने की बात नहीं है। हाँ, कोई बंधन आते हैं तो फिर चिल्लाते हैं। परन्तु यह भी जानते हैं कि अपने कर्मों से बंधन हैं। उसको काटना कैसे है ? यह भी समझकर चलना है । 'बंधन-बंधन' कहते तो अनेक जन्म बिताये। शक्तियों का बल दिखाया है, तो बंधन काटे थे ना। असुरों का विनाश किया था । असुर कोई ऐसे मनुष्य नहीं होते । भंयकर यह विकार भूत हैं जो दुःख करते हैं । दुःख का रुप ऐसे दे दिया है- एक तरफ देवी कहना, दूसरे तरफ इतना भंयकर बनाना। फिर असुरों को भंयकर बनाया है। यह है गुड़ियों का खेल । गुड़ियां बनाकर क्या खेल रच रहे हैं? बाप आकर बतलाते हैं। बाप को तो कहने का हक है कि बच्चे क्या कर रहे हैं? अब नवरात्रि में देवियों के चित्र बहुत बनाते हैं। रचता भी बनते, पालना भी करते और फिर डुबो भी देते हैं।
खर्चे बहुत करते हैं। इसका नतीजा क्या है? कहते हैं - परम्परा से चला आता है। तो इन बातों को सुधारना है। कोटों में कोई आकर सुधरते हैं। बाकी सबका विनाश हो जाता है। यह सारा ड्रामा का कैसा हिसाब-किताब बना हुआ है -- इसको हम जानते हैं। यह कॉमन सत्संग नहीं है, स्कूल है। स्कूल में हर एक स्टूडेन्ट का परिचय रहता कि कहाँ तक पढ़ता और पढ़ाता है, कहाँ तक बुद्धि में धारणा है ? सब रेख-देख रखनी पड़ती है।