Mamma's Murli - gyan-sitar-38

२५.९.६२

बाप की आज्ञा है - अपवित्रता के खाते को समाप्त कर पवित्र बनो और बनाओ

ओम् शान्ति। भक्त भगवान की शुक्रिया गाते हैं। परन्तु शुक्रिया कहने की तो बात ही नहीं है। हमको तो अब भगवान बाप प्रैक्टिकल में मिला है, उनकी हम सन्तान बने हैं। तो वर्सा पाने का यत्न (पुरुषार्थ) करना है। हमको जो उनका फरमान और आज्ञा है, उस पर कदम-कदम चलना है। जैसे सपूत बच्चे बाप की आज्ञा का पालन करते हैं। आज्ञा भी कौनसी है? पवित्र रहकर पवित्र बनाओ। पवित्रता को भी हम जानते हैं कि पवित्रता कितने तक है ? जैसे अपवित्रता हमको गहराई में ले गई है जिससे कर्म का खाता भी ऐसे ही बन गया है।

अब फिर उस अपवित्रता के खाते को काटना है। पांच विकार जो कर्मों में चले गये हैं उनको निकालना है। विकारों को सिर्फ छोड़ना नहीं है, परन्तु उनसे जो खाता बन चुका है उनको भी साफ करना है।

विकारों ने सारा अपना बना लिया है। विकारों का राज्य है। उसको पलटाना है। सिर्फ ब्रह्मचर्य का पालन करना - यह कोई बड़ी बात नहीं। परन्तु उन विकारों से जो खाता बना है उनको खत्म करना है। सन्यासी भल छोड़कर गये लेकिन पिछला विकर्मों का खाता उनको छोड़ता नहीं। भल जो करते हैं उनका उजूरा मिलता है - जो जन्म लेकर फिर भी सन्यासियों के संग में चले जाते हैं। परन्तु नाते को काटते नहीं हैं। वह तो फिर भी विकारियों के पास जन्म लेते रहते हैं।

परन्तु अब तो हम बाप द्वारा कर्मो की गति को जानते हैं। हमको डबल काम करना है। भविष्य का भी ऐसा खाता बनाना है जो पिछले कर्म का कुछ रहे नहीं। एक तरफ बनाना भी है और फिर पिछले बने हुए को भी साफ भी करना है। हमारी प्रालब्ध इसीलिए ऊंची है। इसलिए इस पुरुषार्थ में समय लगता है। परन्तु सर्व समर्थ बाप मिला है तो सब सहज कर देता है। बाप कहते हैं कि मेरी याद में रहो। याद से भी बल मिलता है, पवित्रता से भी बल मिलता है। फिर जो कुछ मिलता है वह दान भी करना है। तो दान से भी बल मिलता है। इस प्रकार बल को जमा करना है। और फिर जितना हम प्रैक्टिकल में इन सब बातों को लायेंगे तो यह हुई उनकी शुक्रिया। बाकी महिमा की तो कोई बात नहीं है। महिमा भी कर्त्तव्य के ऊपर है। उसने ऐसा ऊंचा पार्ट बजाया है। वह अपना कर्त्तव्य करते हुए बाप, बाप है। ऐसे नहीं कि हम भी वह कर्त्तव्य करते हैं तो हम भी बाप हो गये। नहीं। भल अपने कर्म से हम ऊंचे बनते हैं। बाकी मनुष्य तो इन बातों में मूंझे हैं। उनके गुण और कर्त्तव्य को ही मिला दिया है। ऐसे नहीं कि वह कब बिगड़ता है और फिर बनता है। लेकिन हम ही बिगड़ते और बनते हैं। वह तो सदा बना हुआ है। उनके बिगड़ने की क्या बात है ? अब इन बातों में मूंझना नहीं है।

माया के कभी विघ्न आते हैं - यह भी पिछला खाता है। उसे या तो चुक्तू करना है या तो सहज ज्ञान-बल से काटना है। इसके लिए तो हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। जब तक यह शरीर है, इस शरीर का होना माना हिसाब-किताब है।

फिर यह शरीर नहीं रहेगा। हम कर्म की गति को बहुत विस्तार से जानते हैं कि किस कर्म से अकर्म और विकर्म बनता है। यह हमारा दैवी ब्राह्मणपन का संबंध है। वह हमारा पिछले खाते का संबंध है। ब्राह्मणों का महत्व भी कर्म के ऊपर है कि ऐसे कर्म करने हैं और ऐसी धारणा रखने से पुरुषार्थ अच्छा होता है।

यह भी ख्याल रखना है कि वही धर्मराज है जिसके पास सारे हिसाब-किताब का खाता है। अच्छे कर्म कराकर ऊंची प्रालब्ध बनाना उनका काम है। अच्छे का अच्छा फल देने वाला – चाहे अल्पकाल के लिए, चाहे सदाकाल के लिए – देने वाला वह हो गया। वह चैतन्य रुप में अब उपस्थित है। अभी पिछला खाता माइनस और भविष्य का खाता प्लस हो सकता है। अब कुछ रियायत हो सकती है। लेकिन बाप की हैसियत में भी तो सपूत बनकर अपना फर्ज पालन करना है। अब हम जो भी मन-वचन-कर्म से कदम उठा रहे हैं, तो हम जानते हैं इस कर्म से क्या होगा और उससे क्या होगा ? विस्तार सहित बाप ने हिसाब-किताब बताया है। ५ विकार भी क्या है ? पहला-पहला विकार है देह-अभिमान । वही सर्व शत्रुओं का हेड है। इसलिए कहते हैं देही-अभिमानी होने से और शत्रु नहीं आयेंगे। देही-अभिमानी में विकार हैं नहीं। फिर स्मृति रहेगी कि हम उनकी सन्तान हैं, तो विकार नहीं आयेंगे। शुद्ध अहंकार रहेगा । मनुष्य तो सिर्फ कहते हैं - जैसा कर्म वैसा फल । लेकिन करते नहीं हैं। अब शरीर को कुछ होता है तो हम जानते हैं कि यह देह-अभिमान-वश है। तो हम फिर बॉडी-कॉन्सेस में आकर ऐसे न करें ।

हमारी बुद्धि में है कि यह ड्रामा है। भले गाली देते हैं लेकिन उनका भी यह गाली देने का पार्ट है। हमको फिर उन्हें सही रास्ते पर लाने का पुरुषार्थ करना है। कोई उपद्रव आता है तो भी हम जानते हैं कि यह उपद्रव आना ही है। इसमें 'हाय-हाय !' में आवें, दुःख में आवें - तो विकर्म हो जायेगा। इसलिए हम सदा खुश और सदा हर्षित रहते हैं। तो ऐसी धारणा को बुद्धि में रखना है। यह है कर्म की गति का ज्ञान। एक बात को उठाने से सब बातें आ जाती हैं। किसी व्यक्ति में मोह है तो वह भी पिछले कर्मबन्धन का खाता हो गया । बाप द्वारा कर्मों की गति को जान कर अभी सम्भलते रहना है। अच्छा ।