Murli de Mamma - gyan-sitar-47
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१८.७.६३
परमात्मा की शक्ति उनके कर्तव्य पर ही गाई जाती है, उनका कर्तव्य है पतितों को पावन बनाना
ओम् शान्ति । परमपिता परमात्मा को याद तो सब करते हैं, परन्तु हम अभी उनको जानकर के याद करते हैं। भक्ति-मार्ग में भी परमात्मा को इतना तो समझते हैं कि वह जानी-जाननहार, सर्वशक्तिवान है। परन्तु वह कैसे सर्वशक्तिवान, जानी-जाननहार है- यह उनके द्वारा अब हमने समझा है। भक्ति-मार्ग में तो सिर्फ परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखते आये हैं। समझते हैं - “परमात्मा ने उठाया, परमात्मा ने बिठाया, परमात्मा ने खिलाया, परमात्मा ने यह सब दिया है। परमात्मा बिगर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है। जो भी कुछ चलता है, वह परमात्मा चला रहे हैं।" क्या उनका कर्तव्य, उनकी विशालता, उनकी शक्ति यही है ? परन्तु यह कोई यथार्थ ज्ञान नहीं है। अपने पास तो अब रोशनी है। यह कोई परमात्मा के महानता की बातें नहीं हैं। अगर पत्ता भी उनके हुक्म से हिलता है, तो फिर चोर-चोरी भी उनकी शक्ति से करता है ? परमात्मा की शक्ति वा महानता इससे तैलुक नहीं रखती है। ऐसे नहीं कि जो कुछ चल रहा है, यह परमात्मा की शक्ति है। शक्ति में तो फिर कई बुरे काम भी हो रहे हैं, न होने वाली बातें भी हो रही हैं। तो क्यों समझें कि यही परमात्मा की शक्ति है ? परमात्मा की सिर्फ यह शक्ति नहीं है। यह अपनी आत्मा की भी तो शक्ति है ना। जो भी मनुष्य कर्म करता है, तो आत्मा को अपनी समझ है, वह भी तो चैतन्य है। परमात्मा की शक्ति परमात्मा के कर्तव्य से गाई जाती है।
कई समझते हैं -- वृक्ष बढ़ता है तो यह भी परमात्मा की शक्ति है। परन्तु नहीं, वह तो हर चीज को बढ़ना-घटना है। हर चीज की चैतन्यता अपनी है। मनुष्य की शक्ति भी तो गाई जाती है ना। कहते हैं - गांधी में शक्ति थी जो इतना बड़ा काम किया । भूख- हड़ताल आदि द्वारा यह सब किया, जिसको वह अहिंसा समझते हैं। परन्तु अहिंसा यह नहीं है। गांधी ने भारत को स्वतन्त्र बनाया । कर्तव्य पर शक्तिवान समझा गया ना। तो परमात्मा की शक्ति क्या है ? क्या यह सब जो चल रहा है, इसे परमात्मा जानता है ? फिर तो वह सब जानता रहे और वह बातें होती भी रहें। खूनी के अन्दर खून करने का संकल्प है – फिर बाकी परमात्मा के शक्ति की महानता क्या रही ? सब कुछ परमात्मा जानता है - सिर्फ इस जानने से क्या फायदा हुआ ? उनके जानते हुए भी उल्टा काम हो जाता है तो बाकी परमात्मा की महानता क्या हुई ? परन्तु उनकी महिमा कर्तव्य पर है।
हमारे सारे कर्मो की गति को वह जानता है। ऐसे नहीं, जब हम कर्म करते हैं तब जानते हैं, वह तो पहले से ही जानते हैं। परन्तु परमात्मा के कर्तव्य की महिमा तब है जब आकर हमको अपने जानने का फायदा देते हैं। कैसे हम इस चक्र में आते हैं, उनकी नालेज देते हैं। वह डायरेक्टर-क्रियेटर है, सब उनके पास नॉलेज है। परन्तु उनकी महिमा कर्तव्य पर है। परमात्मा तो सब जानता ही है। हम आत्मायें अनेक जन्मों में आती हैं तो हम ही भूल जाती हैं। उनके फोकस में तो सारा ड्रामा है। आगे क्या हो चुका है- वह भी जानते हैं। परन्तु उससे क्या फायदा ? हमको गिरी हुई स्टेज से उठाते हैं, पतित से पावन बनाते हैं - यह उनकी शक्ति है। बाकी सिर्फ जानता है- पतित हुए तो भी उनकी शक्ति, पावन हुए तो भी उनकी शक्ति। उनकी शक्ति में हम पतित भी हो जाते हैं तो इससे क्या फायदा ? यह सब बातें अब बुद्धि में हैं।
परमात्मा की शक्ति उनके कर्तव्य पर गाई जाती है। हमें सारी रोशनी देते हैं कि तुम कितने पावन थे, फिर कैसे पतित बने । फिर पावन बनने के लिए क्या करो – वह भी समझाते हैं। वह सुख-दाता है। ऐसे नहीं कि सिर्फ सुख-दुःख को जानता है। दाता का कर्तव्य है, अगर सुख-दाता है, तो हम सदा सुखी होने चाहिएं। परन्तु हम दुःखी भी होते हैं, उसका क्या कारण है ? यह सब बातें हम जानते हैं। परमात्मा की महानता अथवा उनकी श्रेष्ठता कर्तव्य से गाई जाती है। सृष्टि पर उनका कर्तव्य सबसे महान् और मनुष्यों प्रति हुआ है, तब उनका गायन है। बाकी सब कुछ परमात्मा कराता है - यह कोई बड़ापन नहीं है। सबमें उनका श्रेष्ठ कर्तव्य हुआ है, उसे ही बड़ापन कहेंगे। मनुष्य सृष्टि को सुखी बनाया है। सारी सृष्टि, तत्व आदि जो भी रचना है उनको सतोप्रधान बनाया है, तब ही महिमा है। बाकी सिर्फ हमारे संकल्पों को रीड करे तब शक्ति समझें, वह तो १० वर्ष के पहले के संकल्पों को भी जानता है, फिर क्या हुआ ? यह कोई महानता नहीं हुई । तो बाप की महिमा को भी समझना है।