Murli de Mamma - gyan-sitar-34

१५.९.६२

आत्मा, परमात्मा के कर्त्तव्यों को यथार्थ जानना ही अच्छे कर्मों का आधार है

गीत :- दुःखियों पर कुछ रहम करो… ।

ओम् शान्ति। परमात्मा एक है और वह निराकार है। कई मनुष्य ऐसे मानते हुए भी इस बात में मूंझे हुए हैं। क्योंकि परमात्मा के बारे में ही अनेकानेक विचार हैं। निराकार को मानने वालों के भी अनेक विचार हैं। कोई भी चीज को एक कहा जाए तो उनका वृतान्त भी एक होना चाहिए ना। अनेक बातें तो नहीं होनी चाहिएं। परन्तु इस एक चीज में ही दुनिया मूंझी हुई है। कहते भी हैं -- गॉड इज वन । लेकिन कहने और समझने में कितना फर्क है ! समझो, यह आकाश तत्व है, उनको हर एक अपनी-अपनी भाषा में भल कुछ भी कहे लेकिन चीज तो एक है ना। इस रीति परमात्मा भी एक ही है, तो सबके पास वृतान्त भी एक होना चाहिए। भाषायें भल अनेक हों लेकिन विचार तो अनेक नहीं होने चाहिएं ना । तो एक ही बात में दुनिया कितना मूंझी हुई है ! इसलिए यह भी नहीं जानते हैं कि हम आये कहाँ से हैं, करना क्या है ? सिर्फ कहते हैं अच्छे कर्म करने चाहिएं ।

कई ऐसे भी मनुष्य कह देते हैं कि परमात्मा क्या है, हम क्या हैं, कहाँ से आये, कहाँ जाना है – इन बातों से हमारा क्या मतलब ? बाकी हाँ, अच्छे काम करने चाहिएं । अच्छा, वह अच्छा काम कौनसा है ? तो बतायेंगे - झूठ न बोलो, चोरी न करो, किसको कष्ट न दो। परन्तु हम जानते हैं कि एक दो को कष्ट तो देते ही आये हैं। अपने आपको भी धोखा देना - यह भी आत्मा को कष्ट दे रहे हैं ना । यह भी समझने की बात है। पहले तो अपने को जानना चाहिए कि “मैं हूँ कौन ? मेरा पोजीशन क्या है ? कर्त्तव्य क्या है ?” अपने पोजीशन को जानने से ही कर्त्तव्य कर सकेंगे। जैसे डॉक्टर जब जाने – मैं डॉक्टर हूँ, पेशेन्ट को सफा देनी है, तब ही पूरी सफा दे सकेंगे। अगर कहे कि इनकी आवश्यकता ही क्या है, तो कर्त्तव्य कैसे चले ? अगर डॉक्टर का कर्त्तव्य करे परन्तु यह पता न हो कि हम डॉक्टर हैं- तो क्या करेंगे ? तो यह भी ऐसी बातें हैं। कहते तो हैं -- हम अच्छे कर्म कर रहे हैं, हम देश की सेवा कर रहे हैं। लेकिन सेवा भी सच्ची कौनसी होती है ? दुनिया जो कुछ भी कर रही है उसकी रिजल्ट तो सामने प्रत्यक्ष होती जा रही है।

परमात्मा क्या, हम क्या, हमारा कर्त्तव्य क्या है ? वह यथार्थ रीति जानना है। वह समझते हैं हम वेदों-शास्त्रों के आधार पर जानते हैं। लेकिन शास्त्र की पढ़ी हुई बात को जानना थोड़ेही कहेंगे। जानने की तो प्रैक्टिकल बातें हैं। हम प्रैक्टिकल में अपने अनुभवों के आधार पर सुनाते हैं। ऐसे नहीं, जो होना होगा सो देखा जायेगा। नहीं। हम अपने अनुभव, विवेक, अथॉरिटी के आधार पर कहते हैं। हमारी कहनी और करनी दुनिया से निराली हो गई है। दुनिया जो कहती है, करती है - उसमें कोई एम आबजेक्ट नहीं है। हर एक के अपने-अपने ख्यालात हैं। इसलिए कोई भी बात में स्थिर नहीं हैं। अपनी बुद्धि तो स्थिर है। बुद्धि में एक ही यथार्थ बात है। हमारी कहनी और करनी समान है।